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संसाधनों के आवंटन की नई नीति ने भरी तिजोरी

देश में अब तक की सबसे बड़ी स्पेक्ट्रम नीलामी बुधवार को खत्म हो गई। टेलीकॉम कंपनियों को अपनी मौजूदा सेवाएं जारी रखने के लिए नए सिरे से स्पेक्ट्रम खरीदना जरूरी था।

संसाधनों के आवंटन की नई नीति ने भरी तिजोरी
देश में अब तक की सबसे बड़ी स्पेक्ट्रम नीलामी बुधवार को खत्म हो गई। टेलीकॉम कंपनियों को अपनी मौजूदा सेवाएं जारी रखने के लिए नए सिरे से स्पेक्ट्रम खरीदना जरूरी था। उन्नीस दिनों तक चली इस प्रक्रिया के बाद एक बात पूरी तरह साफ हो गई है कि इस राष्ट्रीय संसाधन की कीमत को लेकर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) ने जो अनुमान लगाए थे, वे लगभग सही ही थे। शुरुआती दौर में स्पेक्ट्रम बिक्री से सरकार ने करीब 80,000 करोड़ रुपए की आमदनी होने का अनुमान लगाया था, जबकि नीलामी पूरी होने के बाद कुल बोली करीब 1.10 लाख करोड़ रुपए की लगी है। इसका एक तिहाई हिस्सा कंपनियों को चालू वित्त वर्ष 2014-15 के दौरान ही देना होगा। इस तरह सरकार को तत्काल करीब 36 हजार करोड़ रुपये राजस्व के रूप में हासिल होगा। इससे राजकोषीय घाटे की स्थिति सुधारने में मदद मिलेगी। कंपनियों को शेष राशि का भुगतान दस से बारह वर्षों में करना है। बहरहाल, नीलामी के बाद जो तथ्य आए हैं उससे साफ है कि पूर्व में 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन के कई मामलों में अपेक्षित पारदर्शिता और ईमानदारी नहीं बरती गई थी।
कोयला खदान आवंटन के साथ भी यही हुआ था। नतीजतन भारी घोटाले हुए। कैग की ऑडिट रिपोर्ट में सामने आया कि 2जी स्पेक्ट्रम के आवंटन से देश को जहां 1.76 लाख करोड़ रुपए का घाटा हुआ। वहीं कोयला खदानों के आवंटन से देश को 1.86 लाख करोड़ रुपए की चपत लगने की बात सामने आई। इन खुलासों के बाद देश में राजनीतिक उथल-पुथल मचनी लाजमी थी। हालांकि कांग्रेस के दिग्गज दोनों मामलों में जीरो लॉस की बात करते रहे। इसके बाद देश में वैधानिक चिंतन-मंथन का दौर चला जिसका परिणाम यह हुआ कि सुप्रीम कोर्ट ने 2जी स्पेक्ट्रम और कोयला खदानों के लाइसेंट रद करते हुए सरकार को निर्देश दिया कि आगे से सार्वजनिक संसाधनों का आवंटन सिर्फ नीलामी के जरिये ही किया जाए। अब उसके परिणाम सामने हैं। केंद्र और राज्य सरकारों को उम्मीद से कहीं अधिक धन मिला है। स्पष्ट है, नीलामी के जरिए आवंटन के पक्ष में जितने तर्क दिए जा रहे थे वे सब सही थे। जाहिर है, बाजार मांग और आपूर्ति के नियम से चलता है। ऐसे में बेहतर यही होता है कि निजी कंपनियां पूरी कीमत अदा करने के बाद ही अपने लिए उपयोगी सार्वजनिक संसाधनों को प्राप्त करें।
इस नीलामी से भारी भरकम धन मिलने से अर्थव्यवस्था में स्थिरता आएगी। राजकोष में पैसा होने से सरकार भी कल्याणकारी योजनाओं को लागू करने की स्थिति में होगी। हालांकि महंगी बोली लगने से यह आशंका अवश्य जताई जा रही है कि कंपनियां अपनी सेवाएं अथवा उत्पादों को भी महंगी कर देंगी। बहरहाल, यह भी सच है कि खुले बाजार के इस दौर में जहां प्रतिस्पर्धा हो, कंपनियों के पास अनियंत्रित तरीके से दाम बढ़ाने की आजादी नहीं होती है। फिर भी सरकार को चाहिए कि उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा के लिए वह नियामक संस्थाओं को मजबूत करे। फिलहाल, नीलामी की प्रक्रिया खत्म होने के बाद इस बात का तो संतोष कर ही सकते हैं कि अब निजी कंपनियां पूरी कीमत देने के बाद ही देश के कीमती और दुर्लभ संसाधनों का उपयोग कर सकेंगी।
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