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विकेश कुमार बड़ोला का लेख : रक्षा संबंधों पर नया दृष्टिकोण

भारत समेत अन्य एशियाई देशों के साथ वार्ता के सुपरिणाम तब ही मिल सकेंगे, जब अमेरिकी शासन भारत के आंतरिक और निजी प्रसंगों-प्रकरणों को डेमोक्रेट्स के पारंपरिक तंग नजरिये से देखना बंद करेगा। भारत की नीतियों-निर्णयों पर अमेरिकी हस्तक्षेप से यह आशंका भी प्रबल हो गई है कि यूएस निजी स्वार्थों-हितों के लिए कूटनीति से हित साधने के लिए कुचक्र रचेगा। अमेरिकी रक्षा मंत्री का भारत दौरा क्वॉड के पहले अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन के एक सप्ताह बाद शुरू हुआ। भारत, अमेरिका और रूस के साथ अलग-अलग ढंग से अपने संबंधों को पुख्ता करता रहा है, इसलिए रूस को लेकर अमेरिका का भारत पर किसी प्रकार का दबाव बनाना उचित नहीं है।

विकेश कुमार बड़ोला का लेख : रक्षा संबंधों पर नया दृष्टिकोण
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विकेश कुमार बड़ोला

विकेश कुमार बड़ोला

अमेरिका में नई सरकार बनने के ढाई महीने बाद ही नये अमेरिकी रक्षा मंत्री लॉयड ऑस्टिन ने तीन दिवसीय भारतीय दौरा किया। इस यात्रा में उन्होंने भारत और अमेरिका के रक्षा संबंधों को मजबूत करने के उद्देश्य से प्रधानमंत्री मोदी व रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के साथ महत्वपूर्ण विचार-विमर्श किया। वास्तव में नयी अमेरिकी सरकार के रक्षा मंत्री का यह दौरा इसलिये हुआ क्योंकि अमेरिकी सरकार भारत-अमेरिका की उन रक्षा रणनीतियों-कार्यनीतियों की मजबूती का व्यक्तिगत निरीक्षण-परीक्षण करना चाहती थी, जो पूर्ववर्ती ट्रंप शासन में परवान चढ़े थे। जहां अक्टूबर-नवंबर में अमेरिका में नई सरकार बनने के चुनावी घटनाक्रम से लेकर दूसरे कई घटनाक्रम घट रहे थे, वहीं भारत में तत्कालीन अमेरिकी रक्षा व विदेशी मंत्री दोनों देशों के बीच बेका समझौते करने के उद्देश्य से भारत की यात्रा पर थे। दोनों देशों के मध्य निष्पादित किये गये बेका समझौते में जिन बिंदुओं पर सहमति, साझीदारी और कार्यनीतियां तैयार की गईं, वे अमेरिका में सरकार बदलने के बाद अब भी कायम हैं अथवा नहीं, इसी की अभिपुष्टि के लिये जस्टिन ने तीन दिन भारत में गुजारे।

अमेरिकी सत्ता परिवर्तन के बाद अमेरिका, भारत और विश्व में यह अनुमान लगाया जा रहा था कि नई अमेरिकी सरकार पूर्ववर्ती सरकार द्वारा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर किये गये अनुबंधों को निरस्त कर देगी और अन्य देशों के साथ संपन्न द्विपक्षीय समझौतों में अपने राजनीतिक हितों के अनुरूप परिवर्तन करेगी। जो बाइडेन शासन-प्रशासन ने पूर्ववर्ती ट्रंप शासन के कई अंतर्राष्ट्रीय निर्णयों को सत्तारूढ़ होते ही बदल भी दिया था। नई सरकार ने अंतर्राष्ट्रीय ही नहीं, अमेरिका संबंधी नीतियों में भी तत्काल मनचाहे परिवर्तन कर दिये थे। राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय नीतियों और निर्णयों में परिवर्तन के इस क्रम से भला दक्षिण एशिया कैसे छूट सकता था? दक्षिण एशिया में भी भारत नई अमेरिकी सरकार की नीतियों व निर्णयों से कैसे प्रभावित नहीं होता? निस्संदेह भारत भी प्रभावित हुआ। लेकिन तब तक ही हुआ जब तक रक्षा मंत्री लॉयड ऑस्टिन भारत दौरे पर नहीं आये थे। जस्टिन के दौरे के बाद अमेरिकी सरकार आश्वस्त हो चुकी है कि दक्षिण एशिया में भौगोलिक, कूटनीतिक, राजनयिक, व्यापारिक और सर्वोपरि सामरिक संतुलन के लिये पूर्ववर्ती अमेरिकी सरकार ने भारत के साथ जो भी रक्षा समझौते किये हैं, उनकी दशा-दिशा किंचित उचित है।

प्रधानमंत्री से औपचारिक भेंट के बाद रक्षामंत्री राजनाथ सिंह के साथ हुई भेंटवार्ता में ऑस्टिन ने भारत-अमेरिका रणनीतिक सहयोग, रक्षा बिक्री और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के साथ-साथ क्वॉड के रूप में हिन्द-प्रशांत रणनीति पर भी विचार-विमर्श किया। इसके अलावा, जस्टिन के भारत दौरे के एजेंडे में वे अमेरिकी चिंताएंं भी थीं, जो भारत द्वारा रूस से एस-400 मिसाइल रक्षा प्रणाली की पहली खेप लिये जाने से जुड़ी हुयी हैं। उल्लेखनीय है कि भारत अपने सहयोगी मित्र देश रूस से इस वर्ष के मध्य या अंत तक एस-400 मिसाइल रक्षा प्रणाली की पहली खेप प्राप्त करने की योजनायें बना रहा है। हालांकि भारत, अमेरिका और रूस के साथ अलग-अलग ढंग से अपने संबंधों को पुख्ता करता रहा है, लेकिन फिर भी अमेरिका की ओर से भारत को प्रतिबंध अधिनियम द्वारा अमेरिका के शत्रुओं का प्रतिरोध कानून के तहत एस-400 के संबंध में पीछे हटने के लिये बारंबार कहा जाता रहा है।

अमेरिकी रक्षा मंत्री का भारत दौरा क्वॉड के पहले अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन के एक सप्ताह बाद शुरू हुआ। राष्ट्रपति बाइडेन ने भी क्वॉड की पूर्वनिर्धारित भूमिका और कार्यनीतियों को उक्त सम्मेलन में उचित ठहराया था। इससे पहले अलास्का में अमेरिका और चीन के बीच द्विपक्षीय वार्ता शुरू तो हुई पर यह पूरी तरह कटुतापूर्ण रही। इतना ही नहीं, अमेरिका ने टोकियो और सियोल में अपने पदाधिकारियों को भेजकर रणनीतिक चर्चायें भी शुरू कर दी हैं। अमेरिकी पदाधिकारियों द्वारा दक्षिण एशिया के तीन देशों के साथ वार्ता आरंभ किये जाने के क्रम में भारत से रक्षा और रणनीतिक वार्ता करना एक तरह से शुभ संकेत है। लेकिन भारत समेत अन्य एशियाई देशों के साथ वार्ता के सुपरिणाम तब ही मिल सकेंगे, जब अमेरिकी शासन भारत के आंतरिक और निजी प्रसंगों-प्रकरणों को डेमोक्रेट्स के पारंपरिक तंग नजरिये से देखना बंद करेगा।

जो बाइडेन शासन के किसी बड़े पदाधिकारी का यह पहला भारत दौरा है। इसलिये इस दौरे में भारतीय शासन के सम्मुख निर्देशात्मक विवेचनायें प्रस्तुत करने के बदले, अमेरिकी प्रतिनिधि का जोर अनुरोधात्मक नजरिये से नयी अमेरिकी सरकार की चिंतायें दर्शाना था। इसी कड़ी में, अमेरिकी सीनेट विदेश संबंध समिति के नेता सीनेटर रॉबर्ट मेनेंडेज ने ऑस्टिन लॉयड के हाथों एक पत्र भारत सरकार के लिये दिया था, जिसमें किसानों और पत्रकारों पर मोदी सरकार द्वारा की जा रही कानूनी कार्रवाई, जम्मू एवं कश्मीर में अनुच्छेद 370 के संशोधन और नागरिकता संशोधन कानून के संबंध में वर्णन था। वास्तव में ऑस्टिन के हाथों ऐसा आपत्तिजनक पत्र भेजने का आशय डेमोक्रेट अमेरिकी सरकार की उसी कांग्रेस-मानसिकता से है, जिसके कारण भारत में दशकों से किसानों, जम्मू एवं कश्मीर, नागरिकता और दूसरे विषयों से संबंधित तमाम समस्यायें उत्पन्न हुई हैं। अमेरिकी प्रतिनिधि द्वारा भारत के सम्मुख इस प्रकार की बातें इसलिये रखी गईं क्योंकि भारतीय विपक्ष के पहुंचवाले नेताओं, पत्रकारों और दूसरे व्यक्तियों ने अमेरिका में अपनी राजनीतिक शक्तियों का इस्तेमाल करते हुये अमेरिकी सरकार को भारतीय शासन के संबंध में यह सब कुछ कहने के लिये उकसाया। जो भी चिंतायें ऑस्टिन ने दर्शाईं वे कोई आपातिक चिंतायें-समस्यायें नहीं हैं। यह भारत के आंतरिक प्रसंग हैं। यह किसी राष्ट्र (अमेरिका) के शासन की कार्यनीतियां नहीं होनी चाहिये। विशेषकर भारत जैसे राष्ट्र के संदर्भ में तो किंचित नहीं होनी चाहिये।

जिस प्रकार अमेरिकी सरकार के सीनेटर ने भारत के आंतरिक प्रकरणों और सम्प्रभुता संपोषित यथोचित राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय निर्णयों पर अप्रत्यक्ष ढंग से आपत्तियां दर्शाई हैं, उससे पता चलता है कि डेमोक्रेट अमेरिकी शासन भी सत्ता प्राप्ति-संरक्षण के लिये तुष्टिकरण, अल्पसंख्यकवाद और विषदंत बन चुकी तमाम वैश्विक समस्याओं के सर्वथा नये समाधान के प्रति हतोत्साहित था, है एवं निश्चित रूप में हमेशा रहेगा। ट्रंप ने झूठी बुराइयों, आलोचनाओं और अनुचित विरोध के बाद भी ऐसी समस्याओं के समाधान की दिशा में महत्वपूर्ण निर्णय लिये और अपेक्षित कार्य भी किये। इसी प्रकार भारत में मोदी भी इसी दिशा में अग्रसर हैं। लेकिन कांग्रेसी चाहे डेमोक्रेट्स के रूप में अमेरिका में हों, भारत में हों या विश्व के किसी अन्य देश में, उनका स्वार्थपोषित अंतिम लक्ष्य जैसे-तैसे सत्तारूढ़ होना और सत्ता संरक्षण करना ही है। भारत की नीतियों-निर्णयों पर अमेरिकी हस्तक्षेप से यह आशंका भी प्रबल हो गई है कि यूएस निजी स्वार्थों-हितों के लिए कूटनीति से हित साधने के लिए कुचक्र रचेगा।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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