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बैंकों का कर्ज ना चुकाने वालों के लिए खोजने होंगे नए रास्ते

लोकसभा में दी जानकारी के अनुसार दिसंबर 2016 तक जानबूझ कर कर्ज न लौटाने वाले लोगों की संख्या 9,130 थी और उन पर 91,155 करोड़ रुपये का कर्ज बकाया था।

बैंकों का कर्ज ना चुकाने वालों के लिए खोजने होंगे नए रास्ते
बैंकों की नान परफोर्मिंग अस्सेट्स (एनपीए) में लगातार इजाफे का असर अब नए कर्जों पर पड़ने लगा है, इसीलिए वित्त मंत्री अरुण जेटली इसका इलाज जल्दी से जल्दी खोजना चाहते हैं। भारतीय रिजर्व बैंक के साथ सरकार इस मुद्दे पर गहन विचार कर रही है। वित्त मंत्री के अनुसार एनपीए की समस्या मुख्यतः बड़ी पचास कंपनियों और उनसे जुड़े 40-50 खातों तक सीमित है।
समस्या से निपटने के लिए सरकार और केंद्रीय बैंक (आरबीआई) कई विकल्पों पर विचार कर रहे हैं, जिनमें बैड लोन किसी निजी संस्था (प्राइवेट एसेट मैनेजमेंट कंपनी) को सौंपे जाने का विचार भी है। वित्त मंत्रालय के अनुसार वित्त वर्ष 2016-17 की तीसरी तिमाही की समाप्ति (31 दिसंबर 2016) तक बैकों का एनपीए बढ़कर 9.64 लाख करोड़ रुपये हो चुका था।
पिछले साल अप्रैल से दिसंबर के बीच सार्वजनिक बैंकों के एनपीए में एक लाख करोड़ रुपये की वृद्धि हुई। चंद बड़े कर्जों के कारण आज अधिकांश सार्वजनिक बैंक लहूलुहान हैं। बैंकों का करीब 5.5 लाख करोड़ रुपया अकेले पौन सैकड़ा उद्योंगों के पास फंसा पड़ा है। वैसे भी बैंक बड़े बैड लोन समय-समय पर माफ करते रहते हैं। पीछे उन्होंने 1.4 लाख करोड़ रुपये के बड़े कर्ज बट्टे खाते में डाले थे।
बैंकिंग शब्दकोष में जब कोई कर्ज लेने वाला तीन माह से ज्यादा समय तक अपनी किश्त नहीं चुकाता तो उसका ऋण एनपीए घोषित कर दिया जाता है। बैलेंस शीट सेहतमंद दिखाने और एनपीए के दाग से बचने के लिए बैंक अक्सर मोटे कर्जे रिस्ट्रक्चर कर देते हैं। मोटा-मोटी एनपीए और रिस्ट्रक्चर्ड लोन को जोड़कर जो रकम बनती है उसे स्ट्रेस लोन या बैड लोन कहा जाता है। जब उधार दी रकम और उसका ब्याज वापस मिलने की कोई संभावना नहीं रहती, तब बैंक ऐसा ऋण बट्टे खाते में डाल देते हैं।
सत्तारूढ़ दल के नेता सरकारी बैंकों पर दबाव डालकर कार्पोरेट और औद्योगिक घरानों को नाजायज़ ऋण दिलवा देते हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार आज मात्र दस बड़ी कंपनियों के पास बैंकों का 7.32 लाख करोड़ रुपया फंसा हुआ है। मज़े की बात है कि सरकार और बैंक, पैसा मारने वाले बड़े लोगों और कार्पोरेट के नाम बताने को राजी नहीं हैं। जनता के अरबों-खरबों रुपये की लूट की सारी साजिश पर्दे के पीछे चल रही है। दिवालिया बैंकों को बचाने के लिए सरकार अक्सर पैसा देती है।
इस प्रकार आम जनता पर दोहरी मार पड़ती है। एक ओर बैंकों में जमा उनका धन डूब जाता है तथा दूसरी तरफ उनसे बतौर टैक्स वसूली रकम सरकार संकट में फंसे बैंकों को देती है। फंसे कर्जों में वृद्धि और वसूली में विलंब का मुख्य कारण उद्योगों की बदनीयती और शासन का ढीला रवैया है। जानबूझ कर ऋण न लौटाने वालों या फर्जी बिल बनाकर धोखाधड़ी करने वालों के खिलाफ बैंक कोई कड़ा कदम नहीं उठाते।
यदि कर्ज न लौटाने वाले चुनिंदा बड़े लोगों को जेल में डाल दिया जाए तो काफी कसूरवार खुद-ब-खुद सुधर जाएंगे। एक कंसल्टेंसी कंपनी के अनुसार वर्ष 2011 और 2015 के बीच भारत में ख़राब कर्ज के मर्ज में पांच गुना वृद्धि हो गई। लोकसभा में दी जानकारी के अनुसार दिसंबर 2016 तक देश में जानबूझ कर कर्ज न लौटाने वाले लोगों की संख्या 9,130 थी और उन पर 91,155 करोड़ रुपये का कर्ज बकाया था।
इस साल के आर्थिक सर्वे में भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार ने बैड बैंक का आइडिया उछाला है। सरकार को सलाह दी गई है कि एक बैड बैंक खोला जाना चाहिए, जिसे फंसी पड़ी सारी रकम से निपटने की जिम्मेदारी सौंपी जाए। लोकसभा में दी जानकारी के अनुसार दिसंबर 2016 तक जानबूझ कर कर्ज न लौटाने वाले लोगों की संख्या 9,130 थी और उन पर 91,155 करोड़ रुपये का कर्ज बकाया था। इस साल के आर्थिक सर्वे में मुख्य आर्थिक सलाहकार ने बैड बैंक का आइडिया उछाला है। सरकार को सलाह दी गई है कि एक बैड बैंक खोला जाना चाहिए, जिसे फंसी पड़ी सारी रकम से निपटने की जिम्मेदारी सौंपी जाए।
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