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नई तरह की राजनीति का दावा और हकीकत

बुधवार को सामने आए एक कथित टेप ने पूरी कर दी है जिसमें पार्टी प्रमुख अरविंद केजरीवाल अपने ही पूर्व विधायक राजेश गर्ग के साथ जोड़तोड़ कर सत्ता में आने की वकालत करते प्रतीत हो रहे हैं।

नई तरह की राजनीति का दावा और हकीकत

आम आदमी पार्टी (आप) की मौजूदा स्थिति को देखकर शायद ही कोई कहेगा कि यह वही पार्टी है जो देश में नई तरह की राजनीति करने के बड़े-बड़े दावों के साथ सत्ता आई है। इन दिनों आप में भारी अंतर्कलह मचा हुआ है। शीर्ष स्तर पर जिस तरह से आरोप प्रत्यारोप का दौर चल रहा है, उससे कई लोग तो इसके टूटने तक की आशंका जता रहे हैं। रही सही कसर बुधवार को सामने आए एक कथित टेप ने पूरी कर दी है जिसमें पार्टी प्रमुख अरविंद केजरीवाल अपने ही पूर्व विधायक राजेश गर्ग के साथ जोड़तोड़ कर सत्ता में आने की वकालत करते प्रतीत हो रहे हैं।

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जाहिर है कि राजनीति में स्वराज, शुचिता, पारदर्शिता आदि उच्च नैतिक मानदंडों की वकालत करने वाली पार्टी का यह दूसरा चेहरा देखकर इसके सर्मथक, शुभचिंतक व स्वयं पार्टी व्यथित हैं। कहां तो वह देश की परंपरागत राजनीति को बदलने चली थी, लेकिन अब उसी रास्ते पर चलती प्रतीत हो रही है। पार्टी में कलह का अंत कब होगा, कोई नहीं जानता, लेकिन एक बात साफ है कि तूफान शांत होने के बाद इसकी वैसी प्रतिष्ठा नहीं रहेगी जैसी एक माह पूर्व थी।

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यह भी कितने आश्चर्य की बात है कि पार्टी के वरिष्ठ नेता आपस में इस कदर उलझे हुए हैं फिर भी अरविंद केजरीवाल इलाज के नाम पर चुप्पी साधे हुए हैं। उनके मौन से तो यही प्रतीत हो रहा है कि यह लड़ाई उनको रास आ रही है। शायद इससे पार्टी के संस्थापक सदस्य प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव के खिलाफ माहौल बन रहा है। अरविंद केजरीवाल के सर्मथक इन दोनों को पार्टी से निकालने की मुहिम चला रहे हैं।

पार्टी में केजरीवाल की पकड़ को देखते हुए यदि आने वाले कुछ दिनों में दोनों को बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है तो हैरानी नहीं होगी, लेकिन इससे क्या उन प्रश्नों के जवाब मिल जाएंगे जो इन दोनों नेताओं ने उठाए हैं। आज आप में अंदरूनी लोकतंत्र का अभाव साफ दिख रहा है। वह व्यक्ति केंद्रित पार्टी बनती जा रहा है। योगेंद्र यादव ने सवाल उठाया है कि अरविंद केजरीवाल सत्ता के लिए सिद्धांतों से समझौता करने पर आमादा थे।

वहीं जो नया कथित टेप सामने आया है उसमें भी केजरीवाल न सिर्फ कांग्रेस से मिलकर फिर से सरकार बनाने को आतुर दिखते हैं, बल्कि वे अपने ही पूर्व विधायक को कांग्रेसी विधायकों को तोड़ने की भी सलाह देते सुनाई दे रहे हैं। हालांकि इस टेप की असलियत अभी सामने आनी बाकी है, लेकिन उनके विश्वास पात्र नेता यह बात मान रहे हैं कि इसमें कुछ भी अनैतिक नहीं है। यह सच है कि केजरीवाल तब की राजनीतिक परिस्थितियों में सरकार गठन की संभावनाओं को टटोल रहे थे। तब उन्होंने दिल्ली के उप-राज्यपाल को इस बाबत पत्र भी लिखा था।

जाहिर है कि इसके बाद अलग तरह की राजनीति करने और अपने लिए नैतिकता के उच्च मानदंड तय करने का कोई अर्थ नहीं रह जाता है। क्योंकि जिस तरह अन्य राजनीतिक पार्टियां अवसर मिलते ही सभी मूल्यों, र्मयादाओं और सिद्धांतों को ताक पर रख देती हैं! अब आप भी उसी रास्ते पर चलती दिख रहा है। आप के नेताओं को यह समझ लेना होगा कि उनके मौजूदा चाल चलन का भविष्य अंधकारमय है।

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