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डॉ. मोनिका शर्मा का लेख: सार्थक सोच की नई मिसाल

कोरोना संक्रमण की आपदा से जूझते हुए सामने आए ऐसे अनूठी मिसाल पेश करने वाले उदाहरण सकारात्मक ऊर्जा देने वाले हैं। सुखद है कि देशभर में फिजिकल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए घरों में बंद बहुत से लोग खुद को व्यस्त रखने और मददगार बनने के लिए कई तरह से अपना सहयोग दे रहे हैं। संकटकालीन समय में भी खुद को सहयोगी साबित करने की जिजीविषा लिए है। यह व्यक्तिगत मोर्चे पर लड़ते हुए समाज के लिए भी कुछ सार्थक करने की सोच लिए है।

डॉ. मोनिका शर्मा का लेख: सार्थक सोच की नई मिसाल

कोरोना संक्रमण के चलते देशभर में जारी लॉकडाउन में जो जहां था वहीं ठहर गया। कितने ही प्रवासी मजदूर जहां रोजी-रोटी के लिए गए थे वहीं फंस गए हैं। ऐसे में राजस्थान के सीकर जिले में कोरोना संकट के चलते लॉकडाउन में रुके मजदूरों ने एक मिसाल पेश की है। सरकारी स्कूल में बनाए गए पलायन सेंटर में ठहरे मजदूरों ने लॉकडाउन का समय काटने के लिए अनूठी पहल करते हुए इस सेंटर की रंगाई-पुताई का काम कर डाला। यहां रुके प्रवासी मजदूरों में पहले इस पलायन केंद्र की साफ़-सफाई का काम किया और फिर पूरे स्कूल का रंग-रोगन कर डाला। इसके लिए स्थानीय सरपंच ने प्रशासन से अनुमति ली और इन मजदूरों को सामान उपलब्ध करवाया गया।

गौरतलब है कि इस क्वारंटीन सेंटर में हरियाणा, राजस्थान, मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश, के करीब 54 मजदूर ठहरे हुए थे। अब ये सभी लोग पूर्ण रूप से स्वस्थ हैं और इनका क्वारंटीन समय भी पूरा हो गया है। कुछ इसी तरह महाराष्ट्र में भी एक दंपति ने लॉकडाउन के दौरान घर में बैठे कुछ नया करने की सोची। इस सोच के तहत उन्होंने अपनी एक समस्या का हल निकालने की योजना बना डाली। गौरतलब है कि महाराष्ट्र के वाशिम जिले के कर्खेदा गांव में पति-पत्नी ने मिलकर अपने घर के आंगन में 25 फीट गहरा कुआं खोद डाला। स्थानीय जल सेवा के उचित प्रबंधन की कमी के चलते उनके इलाके में पानी की समस्या रहती है, इसलिए घर बैठे-बैठे दोनों ने कुआं खोदने का विचार किया। कुएं की खुदाई में दोनों को 21 दिन का समय लगा। उनका कहना है कि कोरोना वायरस की वजह से हुए लॉकडाउन में हमें घर में रहना पड़ा, इसीलिए यह तय किया कि हम दोनों मिलकर कुछ करेंगे। हमारे पड़ोसियों ने हमारा मजाक उड़ाया, लेकिन हमने कुआं खोदना नहीं छोड़ा। 21 दिन बाद हमारे घर के लिए 25 फीट गहरा कुआं तैयार हो गया। हमने जो सोचा, वो कर दिखाया और हमारी पानी की समस्या भी खत्म हो गई |

दरअसल, ऐसे उदाहरण शिकायतों से परे संकट के दौर में जहां हैं, वहीं खुद को उपयोगी, सहयोगी बनाने की सोच की बानगी है। तभी तो क्वारंटीन के समय का सार्थक इस्तेमाल कर प्रवासी मजदूरों ने ग्रामीणों के सहयोग से क्वारंटीन सेंटर स्कूल की पूरी तस्वीर बदल डाली। यह उदहारण पेश किया कि समय का सार्थक इस्तेमाल करते हुए हर स्थिति में खुद को अपने परिवेश के लिए सहयोगी और उपयोगी बनाया जा सकता है। इतना ही नहीं राजस्थान के दूर-दराज के गांव में की गई मजदूरों की यह पहल एकजुट होकर इस महामारी से लड़ने का भाव भी लिए है। साथ ही इस पीड़ादायी दौर में उनका साथ दे रहे समाज को कुछ लौटाने की सोच की भी बानगी है। अपनी संभाल-देखभाल के बदले कुछ कर जाने का विचार सह-अस्तित्व की सोच लिए है। विचारणीय है कि सुख हो या दुःख सह-अस्तित्व का यह भाव हर परिस्थिति में जुड़ाव का काम करता है। आपदा में सहजता और साथ जूझने की सोच को रेखांकित करता है। गौरतलब है कि यहां रुके इन मजदूरों का भी कहना था कि गांव के लोग इतने दिनों से हमारी अच्छी खातिरदारी कर रहे हैं तो दिनभर खाली बैठने से अच्छा है, गांव के लिए कुछ करके जाएं। सुखद है कि इस संकटकालीन समय में गांव के लिए कुछ करने की यह सोच कहीं न कहीं अपने समाज और देश के लिए अपनी भागीदारी निभाने का सार्थक उदाहरण है।

दरअसल, कोरोना संक्रमण को विस्तार पाने से रोकने के लिए लोगों को अपने गांव-घर लौटने से पहले 14 दिन एक लिए क्वारंटीन केन्द्रों में रखा जाता है। इसके लिए उन्हें जहां हैं, वहीं यह अवधि बिताकर अपने प्रदेश वापस जाना होता है, ताकि उनके साथ उनके अपनों तक यह संक्रमण न पहुंचे। इतना ही नहीं अपने राज्य पहुंचने पर भी लोगों को क्वारंटाइन केन्द्रों में समय बिताकर ही घर भेजा जाता है। ऐसे में अपनों से दूर और इन बंधनों के बीच खाली समय बिताना वाकई मुश्किल है। देखने में भी आ रहा है कि कई लोग तनाव और अवसाद का शिकार बन रहे हैं। क्वारंटीन के समय को काटते हुए अकेलेपन के चलते मन-मस्तिष्क के मोर्चे पर और थका हुआ महसूस कर रहे हैं। यहां तक कि आत्महत्या के मामले भी सामने आए हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि लोगों में लॉकडाउन के चलते व्यवसाय, नौकरी, बचत और यहां तक कि मूलभूत संसाधन खोने तक का भय बढ़ा है। एक अध्ययन के मुताबिक लॉकडाउन व कोरोना वायरस संक्रमण के चलते हर पांच में से एक भारतीय तनाव का शिकार है। यकीनन, इस महामारी फैलाव को रोकने के लिए लागू किए गए लॉकडाउन में अकेलापन तेजी से दस्तक दे रहा है। इन दिनों हर उम्र के लोग अपने सामाजिक नेटवर्क से कट गए हैं। करीबी रिश्तेदारों से दूर हो गए हैं। कोविड-19 की वजह से हुई घरबंदी के हालातों में अकेलेपन के चलते डिप्रेशन और डिमेंशिया जैसी समस्याएं दस्तक दे रही हैं। इंडियन सायकायट्री सोसायटी के ताजा सर्वे के मुताबिक मानसिक रोगों की शिकायत वाले लोगों की संख्या में अचानक 20 फीसदी इजाफा हुआ है। लॉकडाउन के बाद के पहले एक सप्ताह में ही सामने आए आंकड़े बताते हैं कि हर पल घर में बंद रहना अकेलेपन को बढ़ा रहा है। ऐसे में अपनों से दूर क्वारंटीन केन्द्रों में समय बिता रहे लोगों की मनःस्थिति आसानी से समझी जा सकती है। जब अपनों के साथ और सहयोग भी अवसाद से नहीं बचा पा रहे तो अपने गांव-घर से दूर इन मजदूरों के लिए इस तकलीफदेह समय को काटना कितना मुश्किल है। ऐसे में खुद को व्यस्त रखने और कुछ सार्थक करने की सोच वाकई सराहनीय और अनुकरणीय है। आपदा में हिम्मत रखने और कुछ बेहतर कर जाने का उदहारण हैं।

कोरोना संक्रमण की आपदा से जूझते हुए सामने आए ऐसे अनूठी मिसाल पेश करने वाले उदाहरण सकारात्मक ऊर्जा देने वाले हैं। सुखद है कि देशभर में सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए घरों में बंद बहुत से लोग खुद को व्यस्त रखने और मददगार बनने के लिए कई तरह से अपना सहयोग दे रहे हैं। बहुत सी महिलाएं मास्क सिलकर लोगों तक पहुंचा रही हैं। कुछ लोग दूसरों को जागरूक करने के काम में जुटे हैं। गरीब परिवारों की सहायता करने के लिए भी आम लोग आगे आए हैं। कोरोना वायरस के संक्रमण की चुनौती से जूझते हुए आमजन की यह भागीदारी वाकई बहुत मायने रखती है। आपदा से मिल-जुलकर लड़ने का हौसला देती है। संकटकालीन समय में भी खुद को सहयोगी साबित करने की जिजीविषा लिए है। यह व्यक्तिगत मोर्चे पर लड़ते हुए समाज के लिए भी कुछ सार्थक करने की सोच लिए है।

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