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विश्व पुस्तक मेला 2016: किताबों के महोत्सव का आखिरी दिन, जानिए इसके महत्व को

नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला पहली बार 1972 में विंडसर प्लेस में आयोजित हुआ था।

विश्व पुस्तक मेला 2016: किताबों के महोत्सव का आखिरी दिन, जानिए इसके महत्व को
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नई दिल्ली. दिल्ली के प्रगति मैदान में 9 जनवरी को शुरू हुआ 24वें विश्व पुस्तक मेले का आज आखिरी दिन है। देश-विदेश के सैंकड़ों प्रकाशकों-वितरकों के इस पुस्तक महोत्सव में हर वर्ष लाखों की तादात में पुस्तक प्रेमी जुटते हैं। वर्ष दर वर्ष इसका विस्तारण यह साबित करता है, ज्ञान और अच्छे साहित्य की चाहत लोगों में बढ़ रही है। इस आयोजन का मूल नाम ही नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला रखा गया है और इसका इतिहास 44 साल का हो चुका है। पहली बार यह मेला 1972 में विंडसर प्लेस में आयोजित हुआ था। लगभग आठ हजार स्क्वायर मीटर भू-भाग से शुरू हुए इस मेले में भागीदारी करने वाले प्रकाशक तब महज 200 थे। अब यह संख्या बहुत आगे निकल चुकी है। अब लगभग पैंतालीस हजार स्क्वायर मीटर भू-भाग के क्षेत्रफल में कोई पंद्रह सौ देशी-विदेशी प्रकाशक इसमें भाग लेते हैं। इस पुस्तक मेले की खासियतों और पठनीयता की परंपरा पर एक नजर।

कई देशों के प्रकाशक शामिल
इस साल चीन मेले का अतिथि देश है। चीन की संस्कृति और साहित्य से संबंधित विशेष मंडप, मेले का आकर्षण हैं। भारत सरकार द्वारा स्थापित राष्ट्रीय पुस्तक न्यास (नेशनल बुक ट्रस्ट) और इंडिया ट्रेड प्रमोशन ऑर्गनाइजेशन द्वारा आयोजित यह मेला अब एशिया के सबसे बड़े पुस्तक मेले के रूप में ख्यात हो चुका है और पहले जहां दो वर्ष में एक बार इसका आयोजन होता था, वहीं अब प्रतिवर्ष इसका आयोजन बताता है कि किताबों को पढ़ने में रुचि रखने वाले लोग बढ़ रहे हैं। अमेरिका, फ्रांस, पोलैंड, जर्मनी, स्पेन जैसे यूरोपीय और नेपाल, सिंगापुर, इंडोनेशिया, सउदी अरब, ईरान, तुर्की, पाकिस्तान, मिस्र, मॉरीशस और यु ए ई जैसे एशियाई देश भी इस पुस्तक मेले में भागीदारी कर रहे हैं। 2015 में आयोजित पिछले विश्व-पुस्तक मेले में 2153 स्टाल्स लगे थे, जिनकी संख्या इस बार और बढ़ी है।
सघन होती है सामुदायिकता
नई दिल्ली का पुस्तक मेला इस बात के लिए भी विख्यात है कि तेजी से लोप होती जा रही सामुदायिकता के दर्शन यहां होते हैं। देश भर के अलग-अलग राज्यों-शहरों-गांवों से मेले में केवल प्रकाशक ही नहीं अपितु पाठक भी आते हैं। अंबेडकर विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग के प्रोफेसर गोपाल प्रधान याद करते हैं कि जिन दिनों वे असम में थे, तब मेले में आने का ऐसा उत्साह था कि मित्रों के साथ इस मेले में शरीक होते थे। यह मेला केवल बेचने-खरीदने का स्थल नहीं अपितु लोगों को आपसदारी का नया अहसास करवाने का भी माध्यम बनता है।
भारतीय भाषा
यह एक अल्पज्ञात तथ्य है कि हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में अनेक प्रकाशक बहुत सस्ती किताबें छापते हैं। यह सही है कि पुस्तक प्रकाशन एक उद्योग का रूप ले चुका है लेकिन यह भी सत्य है कि सस्ती और बहुत उपयोगी किताबें अभी भी आसानी से उपलब्ध हैं। छोटी पत्रिकाओं के संपादकों के लिए भी यह मेला एक अवसर जैसा होता है। जब लघु पत्रिकाओं के पाठक और संपादक सहजता से मिलते हैं। ‘अलाव’ पत्रिका के संपादक रामकुमार कृषक बताते हैं कि मेला वह अवसर है, जब जाने-अनजाने सैकड़ों पाठक सहज मिल जाते हैं और यहां आकर लगता है कि पढ़ने वाले लोग बिलकुल भी कम नहीं हुए हैं। हर साल विश्व पुस्तक मेले में पाठकों की भारी संख्या और किताबों की बिक्री में हो रहा लगातार इजाफा इस सवाल की सच्चाई खुद बयान कर देता है।
बरकरार है पुस्तकों का आकर्षण
साक्षरता के प्रसार के साथ पाठकों में ज्ञान की भूख बढ़ी है और वे किसी भी माध्यम से ज्ञान और सूचना प्राप्त करना चाहते हैं। असल समस्या उपलब्धता की है। राष्ट्रीय पुस्तक न्यास के सहयोग से अलग-अलग शहरों तथा कस्बों में पुस्तक प्रदर्शनियां लगाकर किताबों को लोगों तक पहुंचाने के काम में लगे लोकायत प्रकाशन के चंद्रशेखर बताते हैं, 'हम मांग के अनुरूप आपूर्ति ही नहीं कर पाते।’ उन्होंने मुख्यत: राष्ट्रीय पुस्तक न्यास द्वारा जनरुचि की पुस्तकों के संदर्भ में बताया कि अल्प मूल्य पर मिलने वाली और सुंदर साज-सज्जा के साथ प्रकाशित होने वाली ये किताबें पाठकों में अत्यंत लोकप्रिय हैं। अकारण नहीं कि दिल्ली में विश्वविद्यालय और कश्मीरी गेट मेट्रो स्टेशनों पर राष्ट्रीय पुस्तक न्यास के पुस्तक बिक्री केंद्रों पर पाठकों की उपस्थिति और बिक्री इनकी सफलता का स्वयं संदेश है।
सरकारी-निजी प्रकाशक हैं सक्रिय
संयोग से देश में राष्ट्रीय पुस्तक न्यास की तरह अल्प मूल्य में पुस्तकें पाठकों तक पहुंचाने में सूचना प्रसारण मंत्रालय का प्रकाशन विभाग, केंद्रीय हिंदी संस्थान, केंद्रीय हिंदी निदेशालय, पूसा, साहित्य अकादेमी और विभिन्न प्रदेशों की अकादमियां सक्रिय हैं। विश्व पुस्तक मेले में इन सबकी प्रभावी उपस्थिति होती है। प्रकाशन विभाग और राष्ट्रीय पुस्तक न्यास पर महत्त्वपूर्ण विषयों पर अल्पमोली किताबों का आकर्षण पाठकों को खींच लाता है तो हिंदी के बड़े प्रकाशकों यथा राजकमल प्रकाशन, राजपाल एंड संस, वाणी प्रकाशन,भारतीय ज्ञानपीठ, प्रभात प्रकाशन, किताबघर प्रकाशन और साहित्य भंडार पर स्तरीय किताबों का आकर्षण भी पाठकों को भारी संख्या में आकर्षित करता है। इलाहाबाद के प्रकाशक साहित्य भंडार के निदेशक विभोर अग्रवाल कहते हैं, ‘हिंदी की सेवा करना हमारी मां की सेवा करने जैसा है और अगर मुनाफे की चिंता छोड़कर इस काम में लगे हैं तो हजारों नए पाठकों तक हमें पहुंचने का सुख भी मिला है।’ वे कहते हैं कि इस काम में हिंदी के दिग्गज लेखकों जिनमें काशीनाथ सिंह, दूधनाथ सिंह, बिश्वनाथ त्रिपाठी, स्वयं प्रकाश और मृदुला गर्ग जैसे लोकप्रिय लेखक शामिल हैं।
अच्छा साहित्य चाहते हैं पाठक
गांधीजी द्वारा स्थापित सस्ता साहित्य मंडल, मेले में गांधी डायरी, गांधी और नेहरू साहित्य, अज्ञेय साहित्य के साथ हिंदी में संपूर्ण रवींद्रनाथ टैगोर साहित्य कम कीमत में उपलब्ध कराता है। इन पुस्तको में अकादमिक जगत के विद्वानों के साथ सामान्य पाठकों की भी रुचि होती है। पुस्तकों को कम कीमत पर पाठकों तक पहुंचाने के अभियान में हरियाणा के संभव प्रकाशन, राजस्थान के बोधि प्रकाशन, छत्तीसगढ़ के श्री प्रकाशन जैसे कई प्रकाशक गंभीरता से संलग्न हैं। हिंदी पाठकों की अल्प क्रय शक्ति के कारण किताबों की बिक्री कम होने का मिथक तोड़ने के लिए अनेक प्रकाशक अपने-अपने ढंग से प्रयासरत हैं। पिछले पुस्तक मेले में टीवी पत्रकार रवीश कुमार की किताब 'इश्क में शहर होना' की भरपूर बिक्री जैसे अनेक उदाहरण हैं, जो बताते हैं कि नए प्रयोगों से पाठकों का मन जीतना संभव है। यह अकारण नहीं है कि अब प्रकाशक नई पुस्तकों के सजिल्द प्रथम संस्करण के साथ अजिल्द अल्पमोली संस्करण भी साथ साथ निकालने लगे हैं। विश्वनाथ त्रिपाठी की अपने शिष्यों पर लिखी गई अनूठी संस्मराणत्मक पुस्तक 'गुरुजी की खेती बारी' के साथ माधव हाड़ा की मीरां पर आलोचना पुस्तक 'पचरंग चोला पहन सखी री' का अजिल्द अल्पमोली संस्करण आ जाना हिंदी के प्रकाशन जगत की व्यापक होने की आकांक्षा का ही परिचायक है।
पठन-पाठन की महत्ता
अकसर यह सवाल किया जाता है कि इंटरनेट, मोबाइल और टीवी के जमाने में किताब कौन पढ़ता है? गूगल और विकिपीडिया जैसे साधन सब कुछ उपलब्ध करवा रहे हैं। तब भी किताब का महत्त्व इसलिए बरकरार है कि यह मनुष्य के लिए सूचना, ज्ञान और संवेदना का प्राथमिक स्रोत है। नए-नए तकनीकी साधन उपयोगी हैं और इनका महत्त्व भी है लेकिन ये किताब के विकल्प नहीं हो सकते। उधार ली गई किताब पढ़कर कोई गरीब बच्चा अब्राहम लिंकन बन सकता है, भला ऐसी उपलब्धि और किसी साधन से कैसे संभव हो सकती है? दूसरी बात, जो पुस्तकों के पठन-पाठन से जुड़ी है, वह यह है पुस्तक पढ़ने वाला पाठक अपने समय के बारे में सबसे सही जान सकता है। अपने समय के सबसे जरूरी सवालों को जान सकता है और वही निर्णय सक्षम भी हो सकता है। वही पाठक सवाल करना सीखता है, जो किसी भी लोकतंत्र को लोकतंत्र बनाने की अनिवार्य शर्त है।
किताबों की रोशनी
कहा जाता है कि किताब रोशनी देती है तो किस तरह से? यह देखा जाना चाहिए। असल में पढ़ना एक ऐसी क्रिया है, जो आपको विचार के स्तर पर भी सक्रिय करता है। मतलब यह कि किताब पढ़ते हुए आप उस किताब के विषय पर लगातार अपनी ओर से भी चिंतन-मनन करते चले जाते हैं और पढ़ चुकने के बाद आपके भीतर भी कुछ बदल सकने की संभावना बन जाती है। यह अकारण नहीं कि महान किताबों के बारे में लोगों ने कहा कि इस किताब ने मेरी जिंदगी बदल दी या इसे न पढ़ता तो आज मैं यह न होता। एक स्तर पर फिल्म या कोई भी कला माध्यम ऐसा कर सकता है लेकिन किताब इंस्टेंट यानी तत्काल मजा देने वाले उत्तेजक नशे की बजाय धीरे-धीरे गहरा असर करने वाली दवा है, जिसका सेवन गहरे हितकर है। सांस्कृतिक बहुलता से भरे भारत जैसे महादेश में निस्संदेह, पुस्तक मेले जैसे मंच लोगों को सांस्कृतिक जुड़ाव का अवसर देते हैं और लोगों को प्रेरित करते हैं, जिसमें पुस्तकें उत्प्रेरक बनती हैं।
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