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राजनीतिक संकट से नेपाल का जल्द ही उबरना जरूरी

नेपाल में राजनीतिक अस्थिरता भारत के लिए हमेशा परेशानी का सबब रहा है।

राजनीतिक संकट से नेपाल का जल्द ही उबरना जरूरी
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नेपाल में एकबार फिर राजनीतिक संकट उत्पन्न होने से भारत की चिंता बढ़ गई है। इस हिंदू बहुल पड़ोसी देश में राजनीतिक अस्थिरता भारत के लिए हमेशा परेशानी का सबब रहा है। ताजा-ताजा प्रधानमंत्री केपी ओली के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार से सीपीएन माओवादी सेंटर के प्रमुख व पूर्व पीएम पुष्प कमल दहाल उर्फ 'प्रचंड' ने अपना सर्मथन वापस ले लिया है। इसके बाद कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (यूनाइटेड मार्क्‍सवादी-लेनिनवादी) के नेता पीएम केपी ओली के लिए मुसीबत बढ़ गई है। अभी ओली 15 दलों के गठबंधन की सरकार के मुखिया हैं। इस गठबंधन से प्रचंड की पार्टी सीपीएन मोओवादी सेंटर के हट जाने से अब देश की चौथी बड़ी पार्टी राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी ही ओली के साथ बड़ी ताकत रह गई है। बाकी दो चार सीटों वाली ही पार्टियां साथ हैं।

प्रचंड ने ओली पर वादा पूरा नहीं करने का आरोप लगाते हुए सर्मथन वापस लिया है। प्रचंड ने आरोप लगाया है कि नया कानून लागू करने, मधेसियों, जनजातियों और थारुओं द्वारा उठाए गए मुद्दों को सुलझाने और लोगों को राहत पहुंचाने की दिशा में ओली सरकार ने गंभीरता नहीं दिखाई है। प्रचंड खुद फिर से पीएम बनना चाहते थे, इसके लिए सरकार बनाते वक्त ओली से मौखिक वादा भी लिया था। नेपाल में नवंबर 2013 में आम चुनाव हुआ था, जिसमें नेपाली कांग्रेस 196 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी थी। 175 सीटों के साथ सीपीएन यूएमएल दूसरी व 80 सीटों के साथ सीपीएन माओवादी सेंटर तीसरी बड़ी पार्टी बनी थी। उस समय सुशील कोइराला के नेतृत्व में नेपाली कांग्रेस ने गठबंधन की सरकार बनाई थी।
लेकिन पिछले साल 2015 के अक्टूबर में ओली और प्रचंड ने एक दर्जन से अधिक छोटी पार्टियों के सर्मथन से कोइराला सरकार को विस्थापित कर दिया था। तब 12 अक्टूबर को वामदलों के गठबंधन के मुखिया के तौर पर ओली प्रधानमंत्री बने थे। उस समय ओली ने एक साल बाद प्रचंड के लिए पीएम पद छोड़ने का वादा किया था और सीपीएन माओवादी सेंटर की कुछ मांगों को लागू करने का वचन भी दिया था। लेकिन नौ महीने बीतने के बाद भी ओली ने न ही पद छोड़ने का संकित दिया और न ही उन मांगों को लागू करने में कोई रुचि दिखाई। इसके बाद प्रचंड अंदरखाने नेपाली कांग्रेस के साथ खिचड़ी पकाई और ओली को मझधार में छोड़ दिया। प्रचंड और नेपाली कांग्रेस के प्रमुख शेर बहादुर देउबा के बीच सात बिंदुओं पर सहमति बन जाने की भी खबर है।
हालांकि प्रचंड की राह आसान नहीं है। सत्ताधारी गठबंधन ने ओली के इस्तीफा नहीं देने का फैसला किया है। लेकिन अल्पमत की सरकार बहुत दिन सत्ता में नहीं रह पाएगी। देर सबेर यदि प्रचंड नेपाली कांग्रेस के साथ सत्ता में आते हैं, तो भारत के लिए यह अच्छी खबर नहीं होगी। प्रचंड का चीन प्रेम जगजाहिर है। वे सोच से भारत विरोधी रहे हैं। भारत विरोध को हवा देकर ही उन्होंने अपनी पार्टी का जनाधार बढ़ाया है। इधर दो साल में नेपाल के साथ भारत के संबंध तल्ख भी रहे हैं। नेपाल ने कई बार बेजा नाखुशी जाहर की है। एनएसजी के बाद चीन के साथ भी भारत के संबंध बहुत अच्छे नहीं कहे जा सकते हैं। ऐसे में नेपाल में चीन सर्मथक नेता की अगुवाई में सरकार का फिर से बनना भारत की कूटनीति के लिहाज से अच्छी बात नहीं होगी।
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