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Editorial : अस्पतालों में लापरवाही अक्षम्य, दोषी को सजा हो

सरकार को चाहिए कि देश में सरकारी स्वास्थ्य सिस्टम को ऐसा बनाएं, जहां लोग खुद को सुरक्षित महसूस करें, सरकार अस्पताल पर लोगों का भरोसा जगे। नासिक जैसी जानलेवा स्थिति देश के किसी अस्पताल में ना बने, अस्पतालों में कर्मियों की जिम्मेदारी तय हो, दोषी को सजा मिले, न कि हादसा बता कर किसी प्रकार की लीपापोती हो।

Editorial : अस्पतालों में लापरवाही अक्षम्य, दोषी को सजा हो
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संपादकीय लेख

Haribhoomi Editorial : सरकार कितने भी दावे करे कि देश में मेडिकल ऑक्सीजन की कमी नहीं है, लेकिन ऑक्सीजन की कमी से हो रही मौतें सरकारी दावों का साथ नहीं दे रही हैं। जब से कोरोना संक्रमितों के नए मामलों में तेजी आई है, नागरिक अस्पतालों में बदइंतजामी सामने आ रही है। कहीं अस्पताल में बेड नहीं है, कहीं एंबुलेंस की सुविधा नहीं है, कहीं लाइफ सेविंग दवा की कमी है, कहीं वेंटिलेटर नहीं है तो कहीं मेडिकल ऑक्सीजन की कमी है। नासिक के सरकारी अस्पताल में ऑक्सीजन टैंक लीक होने से 22 मरीजों की मौत हमारे समूचे स्वास्थ्य रक्षा सिस्टम पर सवाल खड़े करती है।

आखिर जिस अस्पताल में 238 मरीज ऑक्सीजन सपोर्ट पर हो, उस अस्पताल का प्रबंधन इतनी बड़ी लापरवाही कैसे कर सकता है कि ऑक्सीजन का टैँक लीक करने लगे और वह 30 मिनट तक लीक करता रहे। कोरोना महामारी के दौर में सरकारी अस्पताल की कार्यप्रणाली में इस तरह की खामियां कैसे हो सकती हैं? क्या हम मौत दर मौत से सबक नहीं ले रहे हैं। देश में अगर देखें तो पिछले एक सप्ताह में अलग-अलग अस्पतालों में ऑक्सीजन की कमी से कई मौतें हो चुकी हैं। जबलपुर के दो नागरिक अस्पतालों में 5, मुंबई के नालासोपारा में 7, शहडोल में कथित रूप से 12, कन्नौज में 4 मरीजों की मौत ऑक्सीजन की कमी से हो चुकी है। अब नासिक में ऑक्सीजन की आपूर्ति बाधित होने से एक साथ 22 की मौत, 35 की हालत नाजुक होना अस्पताल के प्रबंधन की कमी को दर्शाता है। यह निश्चित रूप से मानवीय गलती की श्रेणी में है, इसे हादसा नहीं माना जा सकता। अस्पताल में जिस वक्त ऑक्सीजन सप्लाई रोकी गई, उस वक्त 171 मरीज ऑक्सीजन पर और 67 मरीज वेंटिलेटर पर थे। अस्पताल के पास अल्टरनेटिव उपाय होना चाहिए था। जब तक आम लोगों की जिंदगी की कीमत नहीं समझेंगे, तब तक हम प्रशासनिक स्तर पर संजीदा नहीं होंगे। नागरिकों के जीवन को उनके अमीर होने या गरीब होने के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए।

चौंकाने वाला आंकड़ा है कि अप्रैल 2020 से जनवरी 2021 के बीच भारत से ऑक्सीजन का निर्यात दोगुना होकर 9,301 मीट्रिक टन तक पहुंच गया है। 2019-20 के बीच भारत ने करीब 4,514 मीट्रिक टन ऑक्सीजन का निर्यात किया था। जनवरी 2020 में 352 मीट्रिक टन ऑक्सीजन का निर्यात किया गया था, जबकि जनवरी 2021 में ऑक्सीजन का निर्यात 734 मीट्रिक टन तक बढ़ गया था। ये निर्यात उस वक्त हुआ जब देश में खुद ऑक्सीजन की कमी थी और कोरोना संक्रमित मामलों की तुलना में भारत तीसरे नंबर पर था। हालांकि सरकार की ओर से ऑक्सीजन निर्यात को लेकर स्पष्टीकरण दिया गया है कि अप्रैल 2020 से फरवरी 2021 तक 9884 मीट्रिक टन औद्योगिक ऑक्सीजन का निर्यात किया गया है, भारत ने 2020-21 के बीच केवल 12 मीट्रिक टन दुर्लभ मेडिकल ऑक्सीजन का ही निर्यात किया है।

यह मान भी लिया जाय कि मेडिकल ऑक्सीजन का निर्यात कम हुआ है, इसके बावजूद देश में इसकी कमी से मौतें आत्मनिर्भर भारत, पिछले बजट में हेल्थ पर फोकस, पिछले साल के 20 लाख करोड़ रुपये के आर्थिक पैकेज आदि सब पर सवाल तो हैं ही। स्वास्थ्य मंत्रालय, देश के तीन दिग्गज चिकित्सक बेशक कहें कि कोरोना से घबराएं नहीं, दवा की कमी नहीं, लेकिन 24 घंटे में दो हजार से अधिक मौतें, करीब तीन लाख नए संक्रमित केस और ऑक्सीजन की कमी से हो रही मौतें जब तक नहीं रुकेंगे, तब तक लोगों में कोरोना को लेकर डर तो बना ही रहेगा। सरकार को चाहिए कि देश में सरकारी स्वास्थ्य सिस्टम को ऐसा बनाएं, जहां लोग खुद को सुरक्षित महसूस करें, सरकार अस्पताल पर लोगों का भरोसा जगे। नासिक जैसी जानलेवा स्थिति देश के किसी अस्पताल में ना बने, अस्पतालों में कर्मियों की जिम्मेदारी तय हो, दोषी को सजा मिले, न कि हादसा बता कर किसी प्रकार की लीपापोती हो। अस्पतालों में लापरवाही अक्षम्य होना चाहिए, इसे किसी भी रूप में बर्दाश्त नहीं की जानी चाहिए।

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