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Editorial : राजद्रोह कानून को तर्कपूर्ण बनाने पर विचार जरूरी

सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस एनवी रमना की तीन जजों वाली बेंच की टिप्प्णी गौर करने लायक है, जिसमें बेंच ने कहा है कि ‘राजद्रोह की धारा 124 ए का बहुत ज्यादा गलत इस्तेमाल हो रहा है। ये ऐसा है कि किसी बढ़ई को लकड़ी काटने के लिए कुल्हाड़ी दी गई हो और वो इसका इस्तेमाल पूरा जंगल काटने के लिए ही कर रहा हो। इस कानून का ऐसा असर पड़ रहा है।

Editorial : राजद्रोह कानून को तर्कपूर्ण बनाने पर विचार जरूरी
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संपादकीय लेख

Haribhoomi Editorial : नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में 2014 में जब केंद्र में भाजपा नीत राजग की सरकार आई थी तो उसके बाद पीएम ने कई मंचों पर ऐलान किया कि उनकी सरकार ने देश में पुराने पड़ चुके अंग्रेजों के जमाने के एक हजार से अधिक कानूनों को खत्म कर दिया है। इसके लिए पूर्व की कांग्रेस सरकारों की आलोचना भी की गई थी कि उसने अंग्रेज जमाने के भारतीयों को सताने के लिए बनाए गए बेकार कानूनों को खत्म नहीं किया। उस वक्त मोदी सरकार की मुक्त कंठ से तारीफ हुई। आज करीब सात साल बाद मोदी सरकार के सामने यक्ष प्रश्न खड़ा है कि अंग्रेज जमाने के राजद्रोह कानून अस्तित्व में क्यों है? राजद्रोह कानून (सेडिशन लॉ) को देश के सर्वोच्च न्यायालय ने अंग्रेजों के जमाने का कॉलोनियल कानून बताते हुए केंद्र सरकार से सवाल किया है आखिर आजादी के 75 साल बाद भी देश में इस कानून की क्या जरूरत है? इसे खत्म क्यों नहीं करते। अदालत ने यह भी कहा कि संस्थानों के संचालन के लिए ये कानून बहुत गंभीर खतरा है। ये अधिकारियों को कानून के गलत इस्तेमाल की बड़ी ताकत देता है और इसमें उनकी कोई जवाबदेही भी नहीं होती।

सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस एनवी रमना की तीन जजों वाली बेंच की टिप्प्णी गौर करने लायक है, जिसमें बेंच ने कहा है कि 'राजद्रोह की धारा 124 ए का बहुत ज्यादा गलत इस्तेमाल हो रहा है। ये ऐसा है कि किसी बढ़ई को लकड़ी काटने के लिए कुल्हाड़ी दी गई हो और वो इसका इस्तेमाल पूरा जंगल काटने के लिए ही कर रहा हो। इस कानून का ऐसा असर पड़ रहा है। अगर कोई पुलिसवाला किसी गांव में किसी को फंसाना चाहता है तो वो इस कानून का इस्तेमाल करता है। लोग डरे हुए हैं।' दरअसल, स्वतंत्रता संग्राम के दौरान भारतीयों को दबाने के लिए भी ऐसा ही कानून इस्तेमाल हुआ था। विवाद यह है कि क्या ये कॉलोनियल है, तो इसी तरह का कानून महात्मा गांधी को चुप कराने के लिए अंग्रेजों ने इस्तेमाल किया था। इसी कानून के जरिए आजादी के आंदोलन को दबाने की कोशिश की गई थी। जायज सवाल है कि क्या आजादी के 75 साल बाद भी इसे हमारे देश के कानून की किताब में होना चाहिए? इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने 2015 में ही रद के बावजूद आईटी एक्ट की धारा 66ए के इस्तेमाल जारी रहने व लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज होने के लिए भी पुलिस तंत्र पर भी नाराजगी जताई थी।

कोर्ट ने कहा कि हम किसी राज्य सरकार या केंद्र सरकार पर आरोप नहीं लगा रहे हैं, लेकिन देखिए कि आईटी एक्ट की धारा 66ए से कितने ही दुर्भाग्यशाली लोग परेशान हो रहे हैं और इसके लिए किसी की भी जवाबदेही तय नहीं की गई है। जहां तक राजद्रोह कानून की बात है तो इसका इतिहास बताता है कि इसके तहत दोष तय होने की दर बहुत कम है। हाल के वर्षों में राजद्रोह कानून के दुरुपयोग के अनेक मामले सामने आए, जिसमें पुलिस अपराध सिद्ध नहीं कर पाई, आरोपित अदालत से बरी हो गए। एनसीआरबी के 2014 से 2019 तक के डाटा के मुताबिक आईपीसी 124 ए के तहत 326 केस दर्ज हुए, जिनमें 559 लोगों को गिरफ्तार किया गया, केवल 10 आरोपित ही दोषी साबित हो सके। शीर्ष अदालत ने राजद्रोह कानून की वैधता को परखने की बात कह कर नई उम्मीद जताई है।

कोर्ट की चिंता इस कानून के गलत इस्तेमाल और अधिकारियों की जवाबदेही तय न होने को लेकर है। इस कानून का अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और बोलने की आजादी बुरा प्रभाव पड़ रहा है। केंद्र ने इस कानून को खत्म न करने व इसके लिए गाइडलाइन तय करने की मांग की है। मतलब साफ है कि केंद्र इसे खत्म नहीं करना चाहता। वर्तमान में लोकतंत्र व संविधान की मजबूती और सरकार के लोकतांत्रिक चरित्र के लिए जरूरी है कि देश में नागरिकों को किसी कानून का भय न हो। हालांकि सही मायने में राष्ट्र के खिलाफ कोई जाता है तो, उसे सजा का प्रावधान होना चाहिए, पर वह जन आवाज दबाने के लिए दुरुपयोग ना हो। शीर्ष अदालत व सरकार को इस पर ध्यान देना चाहिए।

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