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प्रशासनिक जड़ताओं को जल्द तोड़ने की जरूरत

तकनीक में बदलाव हो रहे हैं और देश और आवाम की जरूरतें बदल रही हैं

प्रशासनिक जड़ताओं को जल्द तोड़ने की जरूरत
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जड़ता कोई भी हो प्रगति की राह की बड़ी बाधा होती है। चाहे प्रशासनिक जड़ता हो या कानूनी जड़ता, या फिर व्यवस्थागत जड़ता हो या राजनीतिक-सामाजिक-आर्थिक जड़ता, सभी देश के विकास में रोड़े हैं, सभी लोकतंत्र के प्रवाह में बाधक हैं, सभी सुशासन के मार्ग के अवरोधक हैं। जिस तेजी से तकनीक में बदलाव हो रहे हैं और देश और आवाम की जरूरतें बदल रही हैं, उसमें वर्षों पहले बनाए गए नियम-कानून पुराने पड़ रहे हैं और आज के संदर्भ में निर्थक साबित हो रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत की इन्हीं सभी प्रकार की जड़ताओं को तोड़ने की ओर समूचे प्रशासनतंत्र का ध्यान खींचा है।

पश्चिमी विश्वविद्यालयों व थिंक टैंकों की तर्ज पर नीति आयोग की ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया सीरीज में प्रधानमंत्री ने कहा कि देश में तीव्र परिवर्तन लाने के लिए कानूनों में बदलाव, गैरजरूरी औपचारिकताओं को खत्म करने और निर्णय प्रक्रियाओं को तेज करने की आवश्यकता है। उन्होंने सही कहा कि रत्ती-रत्ती धीमी निर्णय प्रक्रिया से अब न ही विशाल युवा आकांक्षाओं की पूर्ति की जा सकती है और न ही तेजी से बदल रही वैश्विक चुनौतियों का सामना किया जा सकता है। आतंकवाद के साथ-साथ वैचारिक व आर्थिक खतरे बढ़े हैं। सही है कि एक-दूसरे से जुड़े विश्व में विकास की जरूरतों को पूरा करने के लिए देश के शासनतंत्र में व्यापक बदलाव जरूरी है।
आज भारत में अंग्रेजों के जमाने में बनाए कई कोलोनियल कानून मौजूद हैं, नौकरशाही भी अंग्रेजों के जमाने की ही है। हमारा समूचा प्रशानिक ढांचा पब्लिक के प्रति जवाबदेह वाला नहीं है, बल्कि शासन प्रक्रिया में अवरोध पैदा करने वाला है। हमारी प्रशासनिक निर्णय प्रक्रिया बेहद बोझिल और उबाऊ है। चाहे नागरिक प्रशासन हो या पुलिस प्रशासन दोनों पुराने पड़ चुके तंत्र पर ही काम कर रहे हैं। इसलिए जरूरत है कि देश में जल्द से जल्द प्रशासनिक सुधार हो और पुलिस तंत्र में भी सुधार हो। इतना ही नहीं हमें ज्यूडिशियल रिफॉर्म भी तेजी से करना होगा। यह भी सही है कि ये सभी सुधार केंद्र सरकार ही करेगी, जिसके मुखिया खुद पीएम मोदी हैं। अब जब उन्होंने तेज सुधार की जरूरतों पर बल दिया है, तो देखने वाली बात होगी कि उनकी सरकार इस दिशा में कितना तेज और कितने सार्थक कदम उठाती है।
लोकतंत्र प्रगतिशील रहे, इसके लिए केवल तीन सुधारों से ही काम नहीं चलेगा, बल्कि राजनीतिक सुधार की भी जरूरत होगी। दो दशकों में राजनीति का स्तर जिस तेजी से गिरा है और राजनीतिक केवल वोट की सियासत तक सिमट कर रह गई है, उससे समाज में कटुता बढ़ी है, लोगों के बीच वैमनष्यता बढ़ी है और सामुदायिक टकराव बढ़ा है। हालांकि यह दुनिया के स्तर पर हुआ है, केवल भारत में ही नहीं हुआ है। लेकिन यह प्रगतिशील लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है। येनकेन प्रकारेण केवल सत्ता पाने की राजनीति भी देश के विकास और शांति में बाधक ही है। इसलिए प्रधानमंत्री को राजनीति सुधार पर भी गंभीरता से ध्यान देना चाहिए। यह चुनाव सुधार से शुरू किया जा सकता है।
इन सभी सुधारों से ही हम देश में व्यवस्थागत परिवर्तन ला सकते हैं। प्रधानमंत्री का यह कहना कि अलग-थलग रहकर कोई भी देश विकास नहीं कर सकता है, ग्लोबल हो चुके विश्व में भारत के बदलने का आह्वान ही है। इस समय सभी देश एक-दूसरे से जुड़े और एक-दूसरे पर निर्भर हैं। हम प्रौद्योगिकी अपनाकर अपनी निर्णय प्रक्रियों में तेजी ला सकते हैं। आज विकास केवल पूंजी व र्शम पर ही निर्भर नहीं है, बल्कि उसमें नई सोच और नई प्रौद्योगिकी की भूमिका अधिक हो गई है। इसलिए हमें नए विचारों का स्वागत करना होगा और नई प्रौद्योगिकी को अपनाना होगा।
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