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चिंतन : महिलाओं को हर क्षेत्र में सशक्त बनाना जरूरी

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने महिला आरक्षण बिल को पास किए जाने की बात कही

चिंतन : महिलाओं को हर क्षेत्र में सशक्त बनाना जरूरी
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लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन की पहल पर देश भर की महिला जन प्रतिनिधियों का संसद के सेंट्रल हॉल में दो दिवसीय सम्मेलन निश्चित रूप से आधी आबादी के सशक्तिकरण की दिशा में सराहनीय कदम है। खास बात ये रही कि इस सम्मेलन को राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और प्रधानमंत्री तीनों ने संबोधित किया। पहले दिन शनिवार को राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने संसद और विधानसभाओं में महिलाओं का जनप्रतिनिधित्व बढ़ाए जाने की जरूरत पर बल दिया और इसके लिए जल्द से जल्द महिला आरक्षण बिल को पास किए जाने की बात कही, तो उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने बेहतर सुझाव दिया कि जब तक महिला आरक्षण बिल पास नहीं होता है, तब तक राजनीतिक दल स्वेच्छा से अधिक से अधिक महिलाओं को चुनावों में टिकट देकर विधायिका में उनका प्रतिनिधित्व बढ़ाएं। दूसरे दिन रविवार को सम्मेलन के समापन संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महिला सशक्तिकरण के मुद्दे पर कहा कि 'पुरुष होता कौन है कि वह उनका सशक्तिकरण कर सके, वे स्वयं सशक्त हैं। महिलाएं अपने अवसरों का पुरुषों से बेहतर इस्तेमाल करती हैं।'

प्रधानमंत्री ने महिला जनप्रतिनिधियों को सशक्त बनने के लिए कई सुझाव भी दिए। कहा कि खुद विषयों-मुद्दों का ज्ञान बढ़ाएं, लेटेस्ट तकनीक का इस्तेमाल करें, नेतृत्व क्षमता विकसित करें, विधायिका के कामकाज के प्रति गंभीर रहें। लोकतंत्र में महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए राष्ट्र के शीर्ष पदों पर आसीन तीनों ही नेताओं की बात निस्संदेह अहम है, लेकिन जमीनी धरातल पर महिलाओं को उनका हक देने के लिए बात ही काफी नहीं है, उस पर अमल ज्यादा जरूरी है। करीब चार दशक से अधिक समय से राजनीतिक दलों के ही विरोध के कारण महिला आरक्षण बिल पास नहीं हो पा रहा है। इसे बिल के पास होने से संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की 33 फीसदी प्रतिनिधित्व सुनिश्चित हो सकेगी। मजेदार यह है कि सभी दलों के अधिकांश नेता भाषणों में महिला आरक्षण की वकालत करते हैं, लेकिन संसद में बिल का विरोध करते हैं।
जबकि पंचायतों व नगर निकायों में कहीं 33 फीसदी, कहीं 50 फीसदी आरक्षण दिए जाने से महिलाओं ने अपने नेतृत्व का लोहा मनवाया है। निचले स्तर पर तेजी से उनका सशक्तिकरण हुआ है। लेकिन उनके अधिकार की सीमा है, सांसद विधायक के पास ज्यादा अधिकार है, इसलिए विधायिका में जल्द से जल्द आरक्षण सुनिश्चित किए जाने से वूमन एम्पावरमेंट और तेजी से होगा। आज अगर देखें तो देश में महिलाओं को संवैधानिक समानताएं जरूर हैं, लेकिन समाज के हर क्षेत्र में उनके साथ भेदभाव बदस्तूर जारी है। घर से लेकर स्कूल, कालेज, वर्कप्लेस, स्ट्रीट तक हिंसा और यौन अपराध की सबसे अधिक शिकार महिलाएं ही होती हैं। देवी का दर्ज देकर भी महिलाओं की स्वतंत्रता, उनके व्यक्तित्व व उनकी अलग सोच के प्रति समाज उदार व निष्पक्ष नहीं है।
पुरुषवादी मानसिकता सदा महिलाओं की प्रगति की राह की रोड़ा रही है। इसके बावजूद, विज्ञान, खेल, राजनीति, कला समेत सभी क्षेत्रों में महिलाओं ने अपनी प्रतिभा व क्षमता को सिद्ध किया है। लेकिन अभी भी हम सामाजिक आडंबरों में इस कदर जकड़े हुए हैं कि महिला सशक्तिकरण के लिए स्वस्थ माहौल ही तैयार नहीं होने दे पा रहे हैं। अब जरूरत है राजनीतिक में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाई जाए और सामाजिक स्तर पर उन्हें बराबरी का मौका दिया जाए। इसके साथ ही महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाए बिना सशक्तिकरण अधूरा ही रहेगा।
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