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बढ़ते कार्बन उत्सर्जन को नियंत्रित करना जरूरी

कई लोगों का कहना है कि सीरिया आदि देशों में गृहयुद्ध जलवायु परिवर्तन की ही देन है।

बढ़ते कार्बन उत्सर्जन को नियंत्रित करना जरूरी
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दुनिया के सामने प्राकृतिक आपदाओं की संख्या में वृद्धि, आतंकवाद की बढ़ती घटनाएं, सीरिया में गृहयुद्ध और इस्लामिक स्टेट का विस्तार एक चुनौती के रूप में प्रकट हुए हैं। देखा जाए तो यह पूरा साल कमोबेश इन्हीं से जुड़ी घटनाओं का गवाह रहा है। इस मुश्किल घड़ी में विश्व जगत ने छिटपुट विवादों के बावजूद एकजुटता दिखाई है।

सितंबर में न्यूयॉर्क में सभी देशों के नेता आपसी मतभेदों को परे रख सतत विकास लक्ष्यों पर सहमति से हस्ताक्षर करने में सफल रहे थे। माना जा रहा है कि कुछ उसी तरह का नजारा पेरिस में हो रहे जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में भी देखने को मिल सकता है। यहां दुनिया के करीब सभी देश 11 दिसंबर तक चलने वाले सम्मेलन में जलवायु परिवर्तन से लड़ने के लिए ठोस योजना बनाने पर चर्चा कर रहे हैं।

सम्मेलन के अंत में सभी देशों द्वारा संयुक्त रूप से एक वैश्विक और कानूनी तौर पर बाध्यकारी समझौते पर हस्ताक्षर करने की योजना है, जिसका मकसद ग्लोबल वार्मिंग को औद्योगिक क्रांति के पहले के स्तर से दो डिग्री सेल्सियस तक कम करना है। इस लिहाज से इस सम्मेलन को काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को नियंत्रण में रखने के वर्तमान समझौते की समय सीमा 2020 में समाप्त हो रही है।

उधर वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि यदि कार्बन उत्सर्जन इसी तरह जारी रहा तो ग्लोबल वार्मिंग की स्थिति नियंत्रण से बाहर हो जाएगी। हालांकि भारत सहित कई देशों ने संकल्प लिया है कि वे कार्बन उत्सर्जन में 2005 के स्तर के मुकाबले 35 फीसदी तक कमी लाएंगे। हाल में आए विश्व मौसम संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक 2015 सबसे गर्म साल रहेगा और अल नीनो के प्रभाव के कारण 2016 के भी गर्म रहने की संभावना है।

2015 में वैश्विक औसत तापमान औद्योगिक क्रांति के काल 1880-99 से पूर्व की तुलना में एक डिग्री सेल्सियस और 1961-1990 के औसत तापमान की तुलना में 0.73 डिग्री सेल्सियस अधिक है। जलवायु परिवर्तन पर चर्चा दुनिया 20 वर्षों से कर रही है, लेकिन तब इसे ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया गया। हाल में जिस तरह से मौसम चक्र में उलट-पुलट सामने आया है। प्राकृतिक आपदाओं का न केवल रूप बदला है बल्कि आवृत्ति भी तेज हो गई है।

इसने मानव जीवन को भी संकटों में डाल दिया है। कई लोगों का कहना है कि सीरिया आदि देशों में गृहयुद्ध जलवायु परिवर्तन की ही देन है। इसे देखते हुए ही सभी देश एक स्वर में इससे लड़ने की बात कर रहे हैं, लेकिन इसमें कुछ विवाद भी हैं। भारत सहित विकासशील देशों का कहना है कि कार्बन उत्सर्जन में कटौती के प्रति उनकी जिम्मेदारियां विकसित देशों से अलग होनी चाहिए, क्योंकि वे देश सदियों से सबसे ज्यादा प्रदूषण फैला रहे हैं।

जलवायु को सबसे ज्यादा नुकसान उन्होंने ही किया है, लिहाजा उन्हें ग्लोबल वार्मिंग से निपटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभानी चाहिए। इसके लिए उन्हें ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में सबसे ज्यादा कटौती और विकासशील देशों को आर्थिक सहायता देने के साथ-साथ स्वच्छ तकनीक भी हस्तांतरित करनी चाहिए। विकासशील देशों का तर्क है कि वे समृद्धि की अवस्था को प्राप्त नहीं कर पाए हैं, लिहाजा उन्हें जनहित में विकास करने का अधिकार है। ऐसे में अब देखने वाली बात होगी कि जलवायु परिवर्तन से लड़ने के लिए पेरिस सम्मेलन कितना फलदायी होता है।

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