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आलोक यात्री का लेख : शारीरिक स्वायत्तता पर बहस जरूरी

संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष की ताज़ा रिपोर्ट माई बॉडी इज माय ओन के अनुसार, महिलाओं के लिए अपने शरीर पर अधिकारहीनता की स्थिति कोरोना महामारी के कारण और बदतर हुई है। संयुक्त राष्ट्र प्रमुख ने एक रिपोर्ट जारी कर कहा है कि महामारी के कारण पिछले वर्ष लिंग आधारित हिंसा में बढ़ोतरी देखी गई और कई देशों में यौन हिंसा को युद्ध की क्रूर युक्ति एवं राजनीतिक दमन के तौर पर इस्तेमाल किया गया है। रिपोर्ट पर यूनाइटेड नेशंस पॉपुलेशन फंड की डायरेक्टर नतालिय कानेम का कहना है कि शारीरिक स्वायत्तता न देना महिलाओं के मानवीय अधिकारों का उल्लंघन है ही, असमानता को भी बढ़ावा देता है।

आलोक यात्री का लेख :  शारीरिक स्वायत्तता पर बहस जरूरी
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आलोक यात्री

आलोक यात्री

सयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष की ताज़ा रिपोर्ट 'माई बॉडी इज माई ओन' के अनुसार, महिलाओं के लिए अपने शरीर पर अधिकारहीनता की स्थिति कोरोना महामारी के कारण और बदतर हुई है। संयुक्त राष्ट्र प्रमुख ने एक रिपोर्ट जारी कर कहा है कि महामारी के कारण पिछले वर्ष लिंग आधारित हिंसा में बढ़ोतरी देखी गई और कई देशों में यौन हिंसा को युद्ध की क्रूर युक्ति एवं राजनीतिक दमन के तौर पर इस्तेमाल किया गया है। इस प्रवृत्ति से दुनिया के आधे देश ग्रसित हैं। रिपोर्ट पर यूनाइटेड नेशंस पॉपुलेशन फंड की डायरेक्टर नतालिय कानेम का कहना है कि शारीरिक स्वायत्तता न देना महिलाओं के मौलिक मानवीय अधिकारों का उल्लंघन तो है ही, असमानता को भी बढ़ावा देता है। इन असमानताओं की वजह से लड़कियों में मानसिक व शारीरिक समस्याएं पैदा हो सकती हैं।

यह परिणाम लाखों महिलाओं और लड़कियों की शारीरिक स्वायत्तता की स्थिति की चिंताजनक तस्वीर सामने रखते हैं, जिन्हें बिना डर या हिंसा के अपनी देह और अपने भविष्य के बारे में चुनाव करने की शक्ति प्राप्त नहीं है। दुनिया के 57 देशों की आधी से अधिक महिलाओं को अपने शरीर, अपने वज़ूद व निजी स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में फैसले लेने का अधिकार हासिल नहीं है। चाहे अंतरंग संबंध बनाना हो, गर्भ निरोधक का इस्तेमाल या स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ लेना हो। रिपोर्ट में दावा करते हुए दुनिया की महिलाओं के चिंताजनक हालात को दर्शाया गया है। गौरतलब है कि यूएनएफपीए ने पहली बार महिलाओं की शारीरिक स्वायत्तता के मुद्दे पर अध्ययन किया है। माई बॉडी इज़ माई ओन शीर्षक से जारी रिपोर्ट में यूएनएफपीए ने खासतौर से दुनिया के सबसे गरीब 57 देशों की महिलाओं पर होने वाले यौन हमलों का जिक्र किया है, जिसमें दुष्कर्म से लेकर जबरन नसबंदी, खतना और कौमार्य परीक्षण शामिल होने के अलावा इन देशों में यौन संबंधों के लिए मना करने तक का अधिकार महिलाओं के पास नहीं है। अध्ययन में शारीरिक मामलों में फैसले लेने को लेकर महिलाओं पर लगाई जाने वाली सभी तरह की पाबंदियों का विश्लेषण किया गया है।

रिपोर्ट के अनुसार इन अधिकांश निर्धन देशों की महिलाएं बीमारी के इलाज या गर्भनिरोधक के उपयोग से लेकर यौन संबंध बनाने से जुड़े निर्णय खुद नहीं ले पाती हैं। उनके निर्णय में किसी और का प्रभाव या डर हमेशा शामिल रहता है। यह निर्णय कोई और ही करता है। यह आंकड़े दुनिया के एक चौथाई देशों के हैं। इनमें आधे से अधिक अफ्रीकी देश हैं। इन देशों की पचपन फीसदी महिलाएं स्वास्थ्य, गर्भ निरोधक या यौन संबंधों पर स्वयं बमुश्किल निर्णय ले पाती हैं। 29 फ़ीसदी देशों में तो महिलाओं के लिए मातृत्व अवकाश तक की भी व्यवस्था नहीं है। रिपोर्ट में सवाल उठाया गया है कि महिलाएं बिना डर और प्रतिबंधों के अपने शरीर को लेकर फैसले क्यों नहीं ले पाती हैं? यह दावा किया गया है कि शारीरिक स्वायत्ता की कमी का असर महिलाओं और लड़कियों पर व्यक्तिगत तौर पर तो होता ही है साथ ही इससे अर्थव्यवस्था पर भी असर पड़ता है। महज़ 56 फ़ीसदी देशों में यौन शिक्षा देने के लिए कानून या नीतियां उपलब्ध हैं। वहीं 20 अन्य देश या क्षेत्र ऐसे हैं जहां के कानून में आपराधिक मुकदमे से बचने के लिए दुष्कर्म के दोषी को पीड़िता से शादी करने का अधिकार दिया गया है। दुनिया के 43 देशों में शादी में रेप से जुड़े मामलों के निस्तारण के लिए कानून नदारद हैं। 30 मुल्कों में महिलाओं के घर से बाहर निकलने पर पाबंदी है।

यूएनएफपीए की डायरेक्टर नतालिया कानेम कहती हैं कि शारीरिक स्वायत्तता की कमी से होने वाला नुकसान सिर्फ महिलाओं और लड़कियों तक सीमित नहीं रहता। कौशल विकास और उत्पादक क्षमता में कमी से पूरे समाज को इसका खामियाजा उठाना पड़ता है। आगे चल कर यह स्वास्थ्य एवं न्यायिक सेवाओं पर अतिरिक्त बोझ का सबब भी बनता है। कानेम के अनुसार दुनिया की करोड़ों महिलाओं को शारीरिक स्वायत्तता हासिल न होना गंभीर चिंता का विषय है। उनकी जिंदगियां किसी और के इशारे पर चलने को लेकर हम सभी में आक्रोश होना चाहिए। करोड़ों महिलाएं और लड़कियां ऐसी हैं जिनका अपने ही शरीर पर अधिकार नहीं हैं। उनका जीवन कोई और चलाता है। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष के अलावा विश्व स्वास्थ्य संगठन भी इस बात का खुलासा कर चुका है कि विश्व में तीन में से एक महिला को अपने जीवनकाल में शारीरिक या यौन हिंसा का सामना करना पड़ता है। विभिन्न स्तरों पर किया गया अध्ययन बताता है कि दुनियाभर में भारत महिलाओं के लिए सबसे खतरनाक देशों की सूची में उच्च स्थान पर है। थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन द्वारा किए गए सर्वे में भारत को महिलाओं के लिए खतरनाक बताया था। इस सर्वे के अनुसार महिलाओं के मुद्दे पर अफगानिस्तान व सीरिया क्रमश: दूसरे और तीसरे, सोमालिया चौथे और सउदी अरब पांचवें स्थान पर हैं। सर्वे में यूरोप, अफ्रीका, अमेरिका, दक्षिण-पूर्व एशिया दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों के करीब साढ़े पांच सौ पेशेवर, शिक्षाविद, स्वास्थ्य देखभाल कर्मचारी व सामाजिक टिप्पणीकार शामिल थे।

करीब एक दशक पूर्व दिल्ली में चलती बस में हुए निर्भया सामूहिक बलात्कार कांड के बाद भी अभी तक महिलाओं की सुरक्षा को लेकर पर्याप्त काम नहीं हुए हैं। आंकड़े बताते हैं कि 2007 से 2016 के बीच महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराध में 83 फीसदी का इजाफा हुआ था।

आंकड़ों के अनुसार मानव तस्करी, यौन हिंसा व महिलाओं को यौन कारोबार में धकेलने के लिहाज से भारत इस सूची में काफी ऊपर है। यही नहीं कुछ और सर्वे के नतीजे यह भी बताते हैं कि मानव तस्करी, यौन उत्पीड़न, यौन तथा घरेलू गुलामी, ज़बरन विवाह और भ्रूणहत्या के आधार पर भी भारत महिलाओं के लिए खतरनाक देशों में शामिल बताया गया है। इस सूची में पाकिस्तान 6ठे और अमेरिका 10वें स्थान पर है। सीरिया और सोमालिया में लंबे समय से चल रहे युद्ध के कारण महिलाओं की स्थिति काफ़ी ख़राब हुई है। सीरिया में स्वास्थ्य सेवाओं तक महिलाओं की पहुंच नहीं है और सोमालिया में सांस्कृतिक व धार्मिक परंपराओं के कारण भी महिलाएं परेशान हैं। पूर्व में आई कई रिपोर्ट में इस बात का संकेत था कि सीरिया में सरकारी बलों द्वारा महिलाओं के साथ यौन हिंसा की जाती है। घरेलू हिंसा और बाल विवाह के मामले वहां भी बढ़े हैंै। सऊदी अरब में भी कार्यस्थल पर महिलाओं के साथ भेदभाव होता है। सांस्कृतिक व धार्मिक परंपराओं के कारण भी महिलाएं असुरक्षित महसूस करती हैं। हालांकि हाल के सालों में कुछ सुधार देखा गया है, लेकिन सूरत बदलनी अभी बाकी है।

यूएनएफपीए की भारत में प्रतिनिधि अजेंटीना मतावेल के अनुसार महिलाओं के मौलिक अधिकार की स्थिति देश में भी चिंताजनक है। महामारी के दौरान जहां महिलाओं के प्रति विभिन्न प्रकार के अपराध बढ़े हैं, वहीं उन्हें उचित चिकित्सा मिलना भी मुश्किल हुआ है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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