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भारत के लिए नासूर बना नक्सलवाद, जानिए कहां जमी है नक्सलियों की जड़

नक्सलवाद नासूर की तरह है। मलेरिया के बुखार की तरह तापरहित दिखाई देता है लेकिन सरकारी तंत्र पर बुखार बदस्तूर रहता है। नक्सली हिंसा के बरक्स राज्य की हिंसा भी है। सरकारें बंदूक की गोली के दम पर नक्सलवाद को खत्म करने का शिगूफा छेड़ती रहती हैं। बुद्धिजीवी, मानव अधिकार कार्यकर्ता, लेखक और कलाकार किसी कौम, वंश या प्रतिबद्धता के नहीं होते।

भारत के लिए नासूर बना नक्सलवाद, जानिए कहां जमी है नक्सलियों की जड़
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नक्सलवाद नासूर की तरह है। मलेरिया के बुखार की तरह तापरहित दिखाई देता है लेकिन सरकारी तंत्र पर बुखार बदस्तूर रहता है। नक्सली हिंसा के बरक्स राज्य की हिंसा भी है। सरकारें बंदूक की गोली के दम पर नक्सलवाद को खत्म करने का शिगूफा छेड़ती रहती हैं। बुद्धिजीवी, मानव अधिकार कार्यकर्ता, लेखक और कलाकार किसी कौम, वंश या प्रतिबद्धता के नहीं होते।

सरकारों ने कभी बुद्धिजीवियों से सहकार करने की कोशिशें नहीं की हैं। सभ्य समाज, निरंतरता और विकास का स्थायी आधार स्तंभ होता है। नक्सल समस्या एक प्रदूषण है। छत्तीसगढ़ के जीवन को तकलीफदेह बना रही है। इसमें शक नहीं समाज के श्रेष्ठि वर्ग में नपुंसकता भी रही है। विवेकानंद और गांधी ने, तल्ख भाषा में इसका उद्घाटन किया है।

उन्होंने संस्कृति, सभ्यता और भारतीयता का आधार किसानों, मजदूरों और गरीबों को माना है। साथ साथ महिलाओं और युवकों को भी। इन्हीं वर्गों पर श्रेष्ठि वर्ग का हमला भी तो एक तरह का नक्सलवाद है। आईएएस और आईपीएस की नौकरशाही अंग्रेजी हुकूमत की देन है। ‘हिंद स्वराज‘ में तत्कालीन भारत की खस्ता हालत का उस ऐतिहासिक, परेशान दिमाग गांधी ने खाका खींचा था।

भविष्य के भारत के बीजाणु भी छितराए। संसदीय पद्धति में चुनाव जीतकर कुर्सियों पर फिट होना, दुर्घटना और भाग्योदय का संयोग है। नागरिकों को महज मतदाता समझा जाता है। जनता टैक्स दे। भुखमरी झेले। महंगाई से कराहे। आत्महत्या करे। राजनीतिक क्षय में पीली पड़ जाए। अगर उफ करें तो उसे बगावत समझ लिया जाता है।

अंग्रेजियत बुद्धि के नौकरशाह अपेक्षाकृत अल्पशिक्षित राजनीतिज्ञों को कंधे की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। कार्यपालिका को नौकरशाही को निर्देश देने के अधिकार हैं, उनसे निर्दे​​​​षत होने के नहीं। मंत्रिपरिषदें नौकरशाही पर निर्भर हो जाती हैं जिस तरह किसी भवन का प्रथम तल भूतल पर निर्भर होता है। समाज सांस्कृतिक समास है। क्या नागरिक इस अर्थ में सरकार का अंग नहीं है?

उनकी केवल तमाशबीन की भूमिका है? नक्सल समस्या की सरकारी फाइलों में भरमार होगी। केवल क्रियान्वयन नहीं, सलाह देने के। नक्सली विचारधारा भारतीय परंपराओं और संविधान के विपरीत है। जनता को कुबूल नहीं होती। इसलिए नक्सली बंदूक उठाते हैं। सरकारें मुकाबिल होने नुमाइंदों द्वारा तैयार प्रेस विज्ञप्तियां जारी करती हैं। नुमाइंदे इलेक्ट्रानिक मीडिया भी संभालते हैं।

सरकारें नक्सलियों से संवाद करना चाहती हैं, लेकिन नागर समाज से नहीं। विज्ञप्तियां बुद्धिजीवियों को नहीं भेजी जातीं। नक्सली संपर्क करते हैं। किसी के पास नक्सली साहित्य, चिट्ठियां, पर्चें, सीडी संयोगवश मिल गए (जिनको बुद्धि विलास की खुशफहमी में रहने के कारण नष्ट नहीं किया गया) तो नक्सलियों के हमदर्द बतौर पकड़ लिए जाएंगे।

छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद से निपटने के नाम पर देश का सबसे खतरनाक जन-विरोधी कानून है। नक्सल गतिविधियां कम नहीं हो रहीं। हिंसा के खिलाफ जन प्रतिरोध बेहतर सामाजिक लक्षण है। गांधी ने अंग्रेजों की हिंसा के खिलाफ यही हवा दी और सफल रहे। जनता में हिंसा का प्रतिरोध करने की नीयत, कूबत और शक्ति खत्म नहीं हुई है?

‘मीडियाॅकर‘ बुद्धिजीवी समझे जाते हैं। विधानसभा अध्यक्ष और मंत्री सत्कार उनके ग्रहण करते हैं। कसीदे पढ़वाते हैं। संस्कृति मंत्री पुरस्कार, अनुग्रह राशि और अनुदान देते हैं। सरकारी नुमाइंदे अकबर और बुद्धिजीवी बीरबलों की भूमिका में होते हैं। ‘आईन-ए-अकबरी‘ में तुलसीदास के नाम का उल्लेख तक नहीं है। आज अकबर के नवरत्न कहां हैं?

तुलसीदास की रामचरित मानस मुफलिसों की झोपड़ियों में प्राणपद वायु की तरह शाश्वत प्रवाहित है। मंत्रिपरिषदें, नौकरशाह आएंगे और जाएंगे। सत्ताविहीन प्रज्ञा पुरुष इतिहास में दर्ज हैं। रविशंकर शुक्ल जैसे मुख्यमंत्री और नरोन्हा जैसे कुछ अपवादों को छोड़कर छत्तीसगढ़ में सरकारें विस्मृति के तहखानों में हैं।

‘छत्तीसगढ़िया सबसे बढ़िया‘ के मुहावरे के गुरु घासीदास, माधवराव सप्रे, गुंडा धूर, सुंदरलाल त्रिपाठी, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, मिनीमाता, ठाकुर प्यारे लाल सिंह, डाॅ. खूबचंद बघेल, कामरेड प्रकाश राय, कुंजबिहारी लाल अग्निहोत्री, स्वामी आत्मानंद, मुकुटधर पांडेय, देवकीनंदन दीक्षित, राजमोहिनी देवी, सुंदरलाल त्रिपाठी, रामदयाल तिवारी, कामरेड रूइकर, हबीब तनवीर, रामचंद्र देशमुख, पंढरी राव कृदत्त, नरसिंह प्रसाद अग्रवाल, शंकर गुहा नियोगी, मदन तिवारी, शानी, हरि ठाकुर जैसे चुनिंदा जननायक और बौद्धिक सदैव रहेंगे।

समाज को वैचारिक मनुष्य के रूप में तब्दील किया जाए। छत्तीसगढ़ के निरीह, अशिक्षित और बेहद गरीब आदिवासियों को जरूरी समझाइश, आर्थिक उन्नयन, कानूनी सहायता और सामाजिक स्वीकार्यता के आयामों को सुदृढ़ करके नक्सलवाद से बचाया जा सकता है। सुरक्षा बल और पुलिस अतिरिक्तताएं है। वे समाज का अंतर्भूत अवयव नहीं है।

सेना और पुलिस में जितनी कमी होगी, समाज में उतनी ही सुदृढ़ता होगी। नक्सलवाद का नेतृत्व तो पड़ोसी राज्यों बंगाल, बिहार, आंध्रप्रदेश और ओडिशा आदि से आया है। छत्तीसगढ़ में जनयुद्ध की आड़ में नक्सली गृहयुद्ध चाहते हैं। दोनों तरफ आदिवासी हैं। पेट भरने की लाचारी है। उनके हक और हिस्से की पूंजी से राजनीतिक चौथ वसूली जा रही है।

नक्सलवाद की तो परिभाषा तक बहस मांगती है। जिनके हिंसक कृत्य हैं वे तो नक्सलवादी हैं। जो पूरी तौर पर निरक्षर हैं। छत्तीसगढ़ी तक नहीं जानते। नेता को नहीं पहचानते। तन ढकने को वस्त्र नहीं हैं। जिनके जंगल टाटा और एस्सार समूह के आने वाले उद्योग छीन रहे हैं। जिनकी संस्कृति विदेशों में बिकाऊ माल की तरह खपाई जा रही है।

जिनका करमा नृत्य राज दरबार की वस्तु बनाया जा रहा है। जिन आदिवासियों के चेहरे की मुस्कान और भोलापन भारतीय संस्कृति का उत्स रहा है। वे कैसे नक्सलवादी हैं? छत्तीसगढ़ के बुद्धिजीवी सरकारी प्रचारतंत्र में भी हैं। जरूरत है जनता की बौद्धिक सचेष्टता को तटस्थ, निष्पक्ष, भविष्यमूलक और गहरे सरोकारों के साथ समझा जाए।

बंद कमरों में महज हथियारों की रणनीति को अंजाम दिया जा सकता है। नक्सलवाद खूरेंजी का खुला खेल है। वैचारिक जन आंदोलन राजनीतिक वातावरण को ज्यादा विषाक्त होने से बचा सकता है। जिन्हें इसी धरती में दफ्न होना है। उनके लिए यह कर्तव्यगत सरोकार है। छत्तीसगढ़ को खनिज संपदा, वन, पानी, बोली, संस्कृति कुदरत ने दी है।

उन्हें भविष्य की पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखना है। राजनीतिक भ्रष्टाचार, नौकरशाही के अत्याचार, प्रदूषण, शराब के ठेके, पुलिसिया जुल्म, नेताओं के चोचले, बुद्धिजीवियों की निराशा, योजनागत अदूरदर्शिता, दफ्तरी लालफीताशाही, तरह तरह के घोटाले, सामाजिक हिंसा, बौद्धिक बौनापन, असंवेदनशीलता, संकुचित दृष्टिकोण, वगैरह मानव उत्पाद हैं।

उन्हें खासतौर पर छत्तीसगढ़ की विश्वप्रणम्य, आदिवासी संस्कृति पर लाद दिया गया है। छत्तीसगढ़ उस दौर में हैं जब ये सभी आरोप काल उस पर थोप रहा है। संविधान में राज्य व्यवस्था को इन सबसे निपटने की जिम्मेदारियां सौंपी तो गई हैं। साथ ही दूसरी तरफ कंधे से कंधा लगा कर भविष्य को अनुकूल बनाने की चुनौतियों से पार पाना देश के हर नागरिक का भी फर्ज बनता है।

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