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प्रमोद भार्गव का लेख : नक्सलवाद का अंत हो

नक्सलियों के हमले में 24 जवान शहीद हो गए। यह घटना चिंताजनक है, क्योंकि एक पखवाड़े के भीतर दूसरी बार सुरक्षा बलों को निशाने पर लिया गया है।पिछले 15 दिन में हुए ये हमले इस बात की तस्दीक हैं कि छत्तीसगढ़ में नक्सली तंत्र मजबूत है और पुलिस व गुप्तचर एजेंसियां इनका सुराग लगाने में नाकाम है। जबकि शांति का पैगाम देकर नक्सली अपने संगठन की ताकत बढ़ाने और हथियार इकट्ठा करने में लगे रहे। इस तथ्य की पुष्टि इन हमलों से हुई है।

छत्तीसगढ़ के बीजापुर में पुलिस और नक्सलियों में मुठभेड़, 5 जवान शहीद, 21 लापता
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नक्सलियों के बीच मुठभेड़ में जवान शहीद। 

प्रमोद भार्गव

छत्तीसगढ़ के बीजापुर में नक्सलियों से मुठभेड़ में 24 जवान शहीद हो गए। ये जवान एसटीएफ और जिला आरक्षित गार्ड (डीआरजी) के सैनिक थे। डीआरजी के एक साथ इतने जवान पहली बार हताहत हुए हैं। नक्सली जवानों से हथियार भी लूटकर ले गए। यह बलिदान इसलिए चिंताजनक है, क्योंकि एक पखवाड़े के भीतर दूसरी बार सुरक्षा बलों को निशाने पर लिया गया है। इसके पहले नारायणपुर में नक्सलियों ने सुरक्षाबलों की एक बस को बारूदी सुरंग में विस्फोट कर उड़ा दिया था। इस हमले में पांच जवान शहीद हुए थे। लगातार हुई इन दो घटनाओं से पता चलता है कि नक्सलियों का दुस्साहस कितना बढ़ गया है। उनकी तरफ से हिंसा से मुक्ति के जो संकेत दिए गए थे, वे महज सुरक्षा बलों की आंखों में धूल झोंकने के लिए थे। पिछले 15 दिन में हुए ये हमले इस बात की तस्दीक हैं कि छत्तीसगढ़ में नक्सली तंत्र मजबूत है और पुलिस व गुप्तचर एजेंसियां इनका सुराग लगाने में नाकाम है। जबकि शांति का पैगाम देकर नक्सली अपने संगठन की ताकत बढ़ाने और हथियार इकट्ठा करने में लगे रहे। इस तथ्य की पुष्टि इन हमलों से हुई है। हालांकि इसमें कोई दो राय नहीं कि नक्सलियों की शक्ति व हमले कम हुए हैं, लेकिन उनके पास सूचनाएं हासिल करने का मुखबिर तंत्र अब भी बरकरार हैं। हमला करके बच निकलने की रणनीति बनाने में भी वे सक्षम हैं, इसीलिए वे अपनी कामयाबी का झंडा फहराए हुए हैं।

बस्तर के इस जंगली क्षेत्र में नक्सली नेता हिडमा का बोलबाला है। वह सरकार और सुरक्षाबलों को लगातार चुनौती दे रहा है, जबकि राज्य एवं केंद्र सरकार के पास रणनीति की कमी है। यही वजह है कि नक्सली क्षेत्र में जब भी कोई विकास कार्य या चुनाव प्रक्रिया संपन्न होती है तो नक्सली उसमें रोड़ा अटकाते हैं। नक्सली समस्या से निपटने के लिए राज्य व केंद्र सरकार दावा कर रही हैं कि विकास इस समस्या का निदान है। यदि छत्तीसगढ़ सरकार के विकास संबंधी विज्ञापनों में दिए जा रहे आंकड़ों पर भरोसा करें तो छत्तीसगढ़ की तस्वीर विकास के मानदंडों को छूती दिख रही हैं, लेकिन इस अनुपात में यह दावा बेमानी है कि समस्या पर अंकुश लग रहा है, बल्कि अब छत्तीसगढ़ नक्सली हिंसा से सबसे ज्यादा प्रभावित राज्य बन गया है। अब बड़ी संख्या में महिलाओं को नक्सली बनाए जाने के प्रमाण भी मिल रहे हैं। बावजूद कांग्रेस के इन्हीं नक्सली क्षेत्रों से ज्यादा विधायक जीतकर आए हैं। हालांकि नक्सलियों ने कांग्रेस पर 2013 में बड़ा हमला बोलकर लगभग उसका सफाया कर दिया था। कांग्रेस नेता महेन्द्र कर्मा ने नक्सलियों के विरुद्ध सलवा जुडूम को 2005 में खड़ा किया था। सबसे पहले बीजापुर जिले के ही कुर्तु विकास खंड के आदिवासी ग्राम अंबेली के लोग नक्सलियों के खिलाफ खड़े होने लगे थे। नतीजतन नक्सलियों की महेन्द्र कर्मा से दुश्मनी ठन गई। इस हमले में महेंद्र कर्मा के साथ पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल, तत्कालीन अध्यक्ष नंदकुमार पटेल और हरिप्रसाद समेत एक दर्जन नेता मारे गए थे। कांग्रेस ने 2018 के विधानसभा चुनाव में खोई शक्ति फिर से हासिल कर ली, लेकिन नक्सलियों पर पूरी तरह लगाम नहीं लग पाई।

व्यवस्था बदलने के बहाने 1967 में पश्चिम बंगाल के उत्तरी छोर पर नक्सलवाड़ी ग्राम से यह खूनी आंदोलन शुरू हुआ था। तब इसे नए विचार और राजनीति का वाहक कुछ साम्यवादी नेता, समाजशास्त्री, अर्थशास्त्री और मानवाधिकारवादियों ने माना था, लेकिन अंततः माओवादी नक्सलवाद में बदला यह तथाकथित आंदोलन खून से इबारत लिखने का ही पर्याय बना हुआ है। इसके मूल उद्दश्यों में नौजवानों की बेकारी, बिहार में जाति तथा भूमि के सवाल पर कमजोर व निर्बलों का उत्थान, आंध्रप्रदेश और अविभाजित मध्य-प्रदेश के आदिवासियों का कल्याण तथा राजस्थान के श्रीनाथ मंदिर में आदिवासियों के प्रवेश शामिल थे, किंतु विषमता और शोषण से जुड़ी भूमंडलीय आर्थिक उदारवादी नीतियों को जबरन अमल में लाने की प्रक्रिया ने देश में एक बड़े लाल गलियारे का निर्माण कर दिया है, जो पशुपति (नेपाल से तिरुपति आंध्रप्रदेश) तक जाता है। इस पूरे क्षेत्र में माओवादी वाम चरमपंथ पसरा हुआ है। इसने नेपाल, पश्चिम बंगाल, झारखंड, बिहार, ओडिशा, मध्य-प्रदेश छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, तेलांगना और आंध्रप्रदेश समेत देश के पचास जिलों में फैला हुआ है। ये जिले बेशकीमती जंगलों और खनिजों से भरे हैं। छत्तीसगढ़ के बैलाडीला में लौह अयस्क के उत्खनन से हुई यह शुरुआत ओडिशा की नियमगिरी पहाड़ियों में मौजूद बॉक्साइट के खनन तक पहुंच गई है। यहां आदिवासियों की जमीनें वेदांता समूह ने अवैध हथकंडे अपनाकर जिस तरीके से छीनी थीं, उसे गैरकानूनी खुद सर्वोच्च न्यायालय ने ठहराया था। इतने बड़े भू-भाग में नक्सलियों का असर इस बात का संकेत है कि उन्हें स्थानीय लोगों से लेकर राजनीतिकों से समर्थन मिल रहा है।

हमारी खुफिया एजेंसियां नगरों से चलने वाले हथियारों और रशद की सप्लाई चेन का पर्दाफाश करने में कमोबेश नाकाम रही हैं। जब किसी भी किस्म का चरमपंथ राष्ट्र-राज्य की परिकल्पना को चुनौती बन जाए तो जरूरी हो जाता है, कि उसे नेस्तनाबूद करने के लिए जो भी उपाय उचित हों, किए जाएं, किंतु इसे देश की आंतरिक समस्या मानते हुए न तो इसका बातचीत से हल खोजा जा रहा है और न ही समस्या की तह में जाकर इससे निपटाने की कोशिश की जा रही है। इसके उपाय कई स्तर पर तलाशने की जरूरत है। यहां सीआरपीएफ की तैनाती स्थाई रूप में बदल जाने के कारण पुलिस ने लगभग दूरी बना ली है, जबकि पुलिस सुधार के साथ उसे इस लड़ाई का अनिवार्य हिस्सा बनाने की जरूरत है। अर्द्धसैनिक बल के जवान एक तो स्थानीय भूगोल से अपरिचित हैं, दूसरे वे आदिवासियों की स्थानीय बोलियों और भाषाओं से भी अनजान हैं। ऐसे में कोई सूचना उन्हें टेलीफोन या मोबाइल से मिलती भी है, तो वे वास्तविक स्थिति को समझ नहीं पाते।

हालांकि देश में तथाकथित शहरी बुद्धिजीवियों का एक तबका ऐसा भी है, जो माओवादी हिंसा को सही ठहराकर संवैधानिक लोकतंत्र को मुखर चुनौती देकर नक्सलियों का हिमायती बना हुआ है। यह न केवल उनको वैचारिक खुराक देकर उन्हें उकसाने का काम करता है, बल्कि उनके लिए धन और हथियार जुटाने के माध्यम भी खोलता है। इसके बावजूद इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि जब ये राष्ट्रघाती बुद्धिजीवी पुख्ता सबूतों के आधार पर गिरफ्तार किए गए तो बौद्धिकों और वकीलों के एक गुट ने देश के सर्वोच्च न्यायलय को भी प्रभाव में लेने की कोशिश की और गिरफ्तारियों को गलत ठहराया था। माओवादी किसी भी प्रकार की लोकतांत्रिक प्रक्रिया और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को पसंद नहीं करते हैं, इसलिए जो भी उनके खिलाफ जाता है, उसकी बोलती बंद कर दी जाती है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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