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शशांक द्विवेदी का लेख : करंज से बढ़ेगी नौसेना की ताकत

आईएनएस करंज लक्ष्य पर सटीक निशाना लगाकर दुश्मनों को तबाह करने में सक्षम है। इसके साथ ही इस पनडुब्बी में एंटी-सरफेस वॉरफेयर, एंटी-सबमरीन वॉरफेयर, खुफिया जानकारी जुटाने, माइन्स बिछाने और एरिया सर्विलांस जैसे सैन्य अभियानों को अंजाम देने की क्षमता है। स्कॉर्पीन श्रेणी की पनडुब्बी आईएनएस करंज में ऐसी तकनीक का इस्तेमाल किया गया है, जिससे दुश्मन देशों की नौसेनाओं के लिए इसका पता लगाना मुश्किल होगा।

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फाइल फोटो

शशांक द्विवेदी

देश के रक्षा कवच को मजबूत करते हुए स्कॉर्पीन क्लास की सबमरीन आईएनएस करंज को नौसेना में शामिल कर लिया गया है। आईएनएस करंज के जंगी बेड़े में शामिल होने से भारतीय नौसेना की ताकत और क्षमता बढ़ गई है। दुश्मन के लिए आईएनएस करंज घातक अदृष्य हथियार है। दुश्मन के लिए उसे ढूंढ पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है और यह सबमरीन पलक झपकते ही दुश्मन के परखच्चे उड़ा देगी। सबमरीन आईएनएस करंज को साल 2018 में समुद्र में टेस्ट के लिए उतारा गया था। करंज हर टेस्ट में अव्वल रही है। कलवरी क्लास की इस तीसरी सबमरीन की खासियत है कि मिशन के दौरान दुश्मन के इलाके में होने के बावजूद उन्हें इसकी भनक तक नहीं लगेगी। कलवरी क्लास की पहली दो सबमरीन कलवरी और खंडेरी पहले ही नौसेना में शामिल हो चुकी हैं। आईएनएस करंज स्टेल्थ और एयर इंडिपेंडेंट प्रॉपल्शन समेत कई तरह की तकनीकों से लैस है और समुद्र में 50 दिनों तक रह सकती है। यह एक बार में 12000 किमी तक की यात्रा कर सकती है। करंज की लंबाई करीब 70 मीटर, ऊंचाई 12 मीटर और वजन करीब 1600 टन है। जिस तेजी से साउथ चाइना सी में चीन की चालबाजी बढ़ रही है। उस हिसाब से भारतीय नौसेना को समुद्री सुरक्षा के लिए जबरदस्त तैयारी करनी पड़ रही है, क्योंकि चीन का खाड़ी देशों का समुद्री रास्ता मलक्का स्ट्रेट से होकर गुजरता है। ऐसे में अगर साउथ चाइना सी में चीन हेकड़ी दिखाता है तो भारत मलक्का स्ट्रेट में उसका रास्ता रोक सकता है और उस वक्त दुश्मन पर नजर रखने और उस पर अटैक करने मे आईएनएस करंज की क्षमता पर कोई संदेह नहीं है।

कलवरी क्लास की सबमरीन के अलावा भारतीय नौसेना की सभी सबमरीन डीजल-इलेिक्ट्रक हैं और एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन न होने की वजह से इन्हें हर एक-दो दिन में सतह पर आना पड़ता है। इस खामी को आईएनएस करंज में दूर कर लिया गया है। ये समुद्र के अंदर 350 मीटर तक गोता लगा सकती हैं। कलवरी क्लास की सबमरीन समुद्र के अंदर 37 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से चल सकती हैं। खास बात ये कि आईएनएस करंज में दुश्मन के जहाज़ को तबाह करने के लिए टॉरपीडो लगे हैं। इसके अलावा, ये समुद्र में बारूदी सुरंगें भी बिछा सकती हैं। अब आईएनएस करंज देश की आन बान और शान बन गई है।

आईएनएस करंज में सतह और पानी के अंदर से टॉरपीडो और ट्यूब लॉन्च्ड एंटी-शिप मिसाइल दागने की क्षमता है। ऐसा दावा है कि आईएनएस करंज लक्ष्य पर सटीक निशाना लगाकर दुश्मनों को तबाह करने में सक्षम है। इसके साथ ही इस पनडुब्बी में एंटी-सरफेस वॉरफेयर, एंटी-सबमरीन वॉरफेयर, खुफिया जानकारी जुटाने, माइन्स बिछाने और एरिया सर्विलांस जैसे सैन्य अभियानों को अंजाम देने की क्षमता है। स्कॉर्पीन श्रेणी की पनडुब्बी आईएनएस करंज में ऐसी तकनीक का इस्तेमाल किया गया है, जिससे दुश्मन देशों की नौसेनाओं के लिए इसका पता लगाना मुश्किल होगा। ये एक ऐसी सबमरीन है, जिसे लंबी दूरी वाले मिशन में ऑक्सीजन लेने के लिए सतह पर आने की जरूरत नहीं है। इस तकनीक को डीआरडीओ के नेवल मैटेरियल्स रिसर्च लैब ने विकसित किया है। अभी भारतीय नौसेना के पास सिंधु क्लास की 9, शिशुमार क्लास की 3, कलवरी क्लास की 2 और एक न्यूक्लियर सबमरीन आईएनएस चक्र यानी कुल 15 सबमरीन हैं। अरिहंत क्लास की दो सबमरीन यानी आईएनएस अरिहंत और आईएनएस अरिघात 15 पनडुब्बियों से अलग हैं, जो न्यूक्लियर बैलेस्टिक सबमरीन हैं।

फिलहाल नौसेना अपनी क्षमता बढ़ाने के लिये सभी स्कॉर्पीन पनडुब्बियों पर 'एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन' मॉड्यूल स्थापित करना चाह रही है। जिससे लंबी दूरी वाले मिशन में ऑक्सीजन लेने के लिए सतह पर आने की जरूरत नहीं पड़े। आईएनएस करंज के कमीशंड होने के साथ ही भारत ने एक 'सबमरीन बिल्डिंग नेशन' के रूप में अपनी स्थिति को और मज़बूत किया है। मझगांव डॉकयार्ड लिमिटेड की युद्धपोत और पनडुब्बी बिल्डर्स के रूप में अपनी प्रतिष्ठा है। यह पूरी तरह से 'मेक इन इंडिया' और 'आत्मनिर्भर भारत अभियान' के प्रति सरकार की मौजूदा गति के साथ तालमेल है। आईएनएस करंज के नौसेना में शामिल होने के बाद हमारे देश की समुद्री ताकत कई गुना और बढ़ जाएगी। आईएनएस करंज को साइलेंट किलर कहा जाता है क्योंकि ये बिना किसी आवाज के दुश्मन के खेमे में पहुंचकर तबाह करने की क्षमता रखती है।

आईएनएस करंज के नाम के पीछे की कहानी भी काफी दिलचस्प है। आईएनएस करंज के हर अक्षर का एक मतलब है यानी के से किलर इंसटिंक्ट, ए से आत्मनिर्भर भारत, आर से रेडी, ए से एग्रेसिव, एन से निम्बल और जे से जोश। इससे पहले इसी श्रेणी की दो पनडुब्बियां, आईएनएस कलवरी और आईएनएस खंडेरी को नौसेना के बेड़े में शामिल किया जा चुका है। अब चौथी पनडुब्बी आईएनएस वेला का समुद्री ट्रायल किया जा रहा है। यह भी माना जाता है कि इसका नाम (करंज) करंजा द्वीप (जिसे उरण द्वीप भी कहा जाता है) से लिया गया है, जो कि रायगढ़ जिले का एक शहर है तथा मुंबई हार्बर के दक्षिण-पूर्व में स्थित है।

आईएनएस करंज में सतह और पानी के अंदर से टॉरपीडो और ट्यूब लॉन्च्ड एंटी-शिप मिसाइल दागने की क्षमता है। ऐसा दावा है कि आईएनएस करंज में सटीक निशाना लगाकर दुश्मन की हालत खराब करने की क्षमता है। ये पनडुब्बी मिसाइल, टॉरपीडो से लैस है। इसके अलावा समुद्र में माइन्स बिछाकर दुश्मन को तबाह करने की ताकत भी रखती है। स्कॉर्पीन श्रेणी की पनडुब्बी आईएनएस करंज में ऐसी तकनीक का इस्तेमाल किया गया है जिससे दुश्मन देशों की नौसेनाओं के लिए इसकी टोह लेना मुश्किल होगा। इन तकनीकों में अत्याधुनिक अकुस्टिक साइलेंसिंग तकनीक, लो रेडिएटेड नॉइज लेवल, हाइड्रो डायनेमिकली ऑपटिमाइज़्ड शेप शामिल है। पनडुब्बी को बनाते हुए पनडुब्बियों का पता लगाने वाले कारणों को ध्यान में रखा गया है जिससे ये पनडुब्बी ज्यादातर पनडुब्बियों की अपेक्षा सुरक्षित हो गई है।

ये एक ऐसी सबमरीन है जिसे लंबी दूरी वाले मिशन में ऑक्सीजन लेने के लिए सतह पर आने की जरूरत नहीं है। इस तकनीक को डीआरडीओ के नेवल मैटेरियल्स रिसर्च लैब ने विकसित किया है। पुरानी पनडुब्बी करंज के मुकाबले नई करंज में एआईपी को शामिल किया गया है। दरअसल, जब पनडुब्बी को बैटरी से चलाते हैं तो बैटरी को रिचार्ज करने के लिए पनडुब्बी को सतह पर आना पड़ता है। क्योंकि डीजल इंजन से बैटरी को चार्ज करते हैं और डीजल इंजन चलाने के लिए ऑक्सीजन की जरूरत होती है। लेकिन एयर इंडिपेंडेंट प्रॉपल्शन एक ऐसी तकनीक है जिसकी मदद से पनडुब्बी को बैटरी चार्ज करने के लिए सतह पर आने की जरूरत नहीं पड़ती है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)




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