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घुसपैठियों का समर्थन करना कहां तक सही?

यह आशंका पहले से थी कि असम में एनआरसी या नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स यानी नागरिकों के राष्ट्रीय रजिस्टर का मसौदा जारी होने के साथ राजनीतिक हंगामा होगा। यह साफ था कि जब नए सिरे से वास्तविक नागरिकों और विदेशियों की व्यापक स्तर पर छानबीन हो रही है तो काफी लोगों का नाम इस रजिस्टर में नहीं होगा।

घुसपैठियों का समर्थन करना कहां तक सही?

यह आशंका पहले से थी कि असम में एनआरसी या नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स यानी नागरिकों के राष्ट्रीय रजिस्टर का मसौदा जारी होने के साथ राजनीतिक हंगामा होगा। यह साफ था कि जब नए सिरे से वास्तविक नागरिकों और विदेशियों की व्यापक स्तर पर छानबीन हो रही है तो काफी लोगों का नाम इस रजिस्टर में नहीं होगा। वही हुआ है।

3 करोड़ 29 लाख 91 हजार 380 लोगों के आवेदन में से 2 करोड़ 89 लाख 38 हजार 677 का नाम अंतिम मसौदे में आने का अर्थ हुआ कि शेष 40 लाख 52 हजार 708 लोग संदिग्ध हैं। किंतु खड़ा किए जा रहे तूफान के पीछे नैतिकता का आधार नहीं है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इस समय गृहयुद्ध और रक्तपात की धमकी दे रहीं हैं।

जब वो सत्ता में नहीं थी तो उनके लिए विदेशी घुसपैठियों की पहचान बड़ा मुद्दा था। विडम्बना देखिए कि कांग्रेस के ही पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के समझौते के अनुसार यह काम किया जाना था जो पहले नहीं हो पाया। अपनी गलती मानने की बजाय कांग्रेस सरकार पर समुदाय विशेष के खिलाफ काम करने का आरोप लगा रही है।

हालांकि महापंजीयक शैलेश ने साफ किया है कि जिनका नाम नहीं है उन सबको अपना दावा करने और आपत्ति जताने का मौका मिलेगा। किंतु हंगामा किस बात का। क्या राजनीतिक दलों की हमदर्दी विदेशी घुसपैठिओं के लिए है। 1951 में हुई जनगणना के बाद पहला एनआरसी रजिस्टर बना था। सरकार के आदेश पर 1960 में एनसीआर विवरणी को पुलिस को सौंप दिया गया।

पुलिस उस पर कार्रवाई करती तो समस्या का कुछ समाधान होता। लेकिन पुलिस राजनीतिक नेतृत्व के निर्देश पर ही काम कर सकती थी। फलतः इस विवरणी को नए सिरे से अद्यतन करने की मांग जोर पकड़ने लगी। पड़ोसी देश से आने वालों ने असम के अनेक क्षेत्रों में अशांति एवं तनाव पैदा कर दिया। केन्द्र की अनसुनी एवं स्थिति बिगड़ने के बाद 1979 से इनको बाहर निकालने के लिए व्यापक जन आंदोलन आरंभ हो गया।

ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन और ऑल असम गण संग्राम परिषद के बैनर तले चले आंदोलन पता नहीं हमारे नेताओं को याद है भी या नहीं। असम के लोगों की मांग स्पष्ट थी, बहार से आए लोगों को वापस भेजा जाए। 1985 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने आंदोलनरत छात्र नेताओं के साथ समझौता किया। जब राजीव गांधी ने 15 अगस्त को लालकिले से इसकी घोषणा की पूरे देश ने स्वागत किया।

इसमें तीन बातें प्रमुख थीं। एक, 1951 से 1961 के बीच असम आए लोगों को पूर्ण नागरिकता और वोट देने का अधिकार मिलेगा। दो, 1961 से 1971 के बीच आने वालों को नागरिकता और अन्य अधिकार दिए जाएंगे, लेकिन वोट का अधिकार नहीं दिया जाएगा। 24 मार्च 1971 के बाद असम में आए लोगों को वापस भेजा जाएगा। अगले चुनाव में असम गण संग्राम परिषद की सरकार बनी पर समझौते पर काम नहीं हुआ। तबसे स्थिति और बिगड़ी।

वहां भूमिपुत्र आंदोलन भी था, असम की उपराष्ट्रीयतावाद के आंदोलन भी थे, जिनकी चर्चा इस समय करके बताया जा रहा है कि एनआरसी समस्या बढ़ाएगा। उसमें असम के बाहर से आए लोगों का विरोध था, लेकिन यह कभी राज्यव्यापी समर्थन नहीं पा सका। किंतु बंगलादेशी घुसपैठियों के विरुद्ध हुए आंदोलन को व्यापक जनसमर्थन मिला।

कारण साफ था। घुसपैठिए स्थानीय निवासियों के लिए समस्या बन गए। असम पर काम करने वाले जानते हैं कि अनेक जगहों पर घुसपैठियों ने जमीन से लेकर संसाधन तक पर कब्जा कर लिया है। इसके विरुद्ध आदिवासियों जातियों के संगठन खड़े हुए, उनमें हथियारबंद समूह भी हैं। उदाहरण के लिए बोडो स्वायत्त परिषद। 2005 से फिर आसू ने आंदोलन आरंभ किया। उस समय की असम सरकार ने इस पर काम शुरू करने का ऐलान किया लेकिन वही हीला-हवाला। अंततः एक एनजीओ ने 2013 में उच्चतम न्यायालय का दरवाला खटखटाया।

उसमें केंद्र और राज्य सरकार ने दलील थी कि ड्राफ्ट जारी होने से कानून व्यवस्था का मामला उठ सकता है, क्योंकि इसमें लाखों लोगों के नाम नहीं होने से आशंका की स्थिति पैदा हो सकती है कि उनका भविष्य क्या होगा। न्यायालय ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया। एनआरसी कोई छोटा मोटा अभियान नहीं था। इतनी बड़ी प्रक्रिया, जिसमें 52,000 कर्मचारियों को तीन साल से ज्यादा का समय लगा आप कुछ त्रुटियों को इंगित कर खारिज नहीं कर सकते।

अब जरा असम जनसंख्या की कुछ सच्चाइयां देखें। 1951 के बाद ही असम की जनसंख्या देश के दूसरे हिस्सों से ज्यादा अनुपात में बढ़ती रही। 1951 में असम की आबादी 80.3 लाख थी जो 2011 में 3.12 करोड़ हो गई। 1971 से 2011 के बीच करीब सवा करोड़ मतदाता बढ़ गए। 1971 में असम में मतदाताओं की संख्या 62 लाख 68 हजार 273 थी, जबकि 2011 में यह 1 करोड़ 81 लाख 88 हजार 269 हो गई।

1971 से 1991 के 20 वर्षों में 89 प्रतिशत मतदाता बढ़े। आज नौ जिलों में मुस्लिम आबादी 20 से 24 प्रतिशत हो गई है। वे 14 में से 6 लोकसभा सीटों को प्रभावित करने की स्थिति में हैं। 40 विस सीटों पर बंगला भाषी मुस्लिम मतदाता प्रभावी हैं। 24 विधानसभा सीटों पर ये निर्णायक हैं। क्या ये आंकड़े भयभीत नहीं करते। इस तरह से आबादी और वह भी एक समुदाय का बढ़ना क्या साबित करता है।

उच्चतम न्यायालय ने इसके लिए विदेशी हमला जैसा शब्द प्रयोग किया था। फिर न्यायालय ने 17 दिसंबर 2014 को एनआरसी को अद्यतन करने की समय सीमा तक करके इसकी निगरानी अपने हाथों ली। हालांकि इतने समय से आने वाले एक-एक व्यक्ति के बारे में पता करना कठिन है। किंतु जितना संभव है पहचान तो होनी चाहिए। राजनीतिक दलों की समस्या समझ में आने वाली है।

जिन विदेशियों को जीत की लालच में मतदाता बना दिया वे अब मतदान से वंचित हो जाएंगे। ममता बनर्जी को इसकी प्रतिध्वनि प. बंगाल में सुनने का भय पैदा हो रहा है। वहां मुस्लिम आबादी करीब 30 प्रतिशत है जिसमें बांग्लादेशी भी भारी मात्रा में है। बिहार से लेकर दिल्ली, मुंबई आदि सभी राज्यों में इनकी पहचान की प्रक्रिया चलनी चाहिए। अभी जिनकी पहचान हो रही है उनके साथ क्या करना है ये बाद में तय होगा।

बांग्लादेश उनको स्वीकार करने को तैयार नहीं होगा यह भी साफ है। तो वे यहां विदेशी नागरिक के रुप में रहेंगे तब तक रहेंगे जब तक उनकी वापसी नहीं हो जाती। उनको वर्किंग परमिट दिया जाए। स्वास्थ्य व सारे मानवीय सेवाएं प्रदान की जाए लेकिन विदेशी नागरिक मानकर। हालांकि पाक, अफगान और बंग्लादेश से जो हिन्दू, सिख, बौद्ध पीड़ित होकर आए हैं उनके साथ दूसरे तरीके का व्यवहार करना होगा।

इसलिए उनको यहां शरण देकर पूर्व में आए शरणार्थियों की श्रेणी नागरिकता देनी होगी। किंतु केन्द्र सरकार एवं भाजपा स्वयं तो इस मुद्दे पर मुखर स्पष्टता से सामने आए। य ह आशंका पहले से थी कि असम में एनआरसी या नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स यानी नागरिकों के राष्ट्रीय रजिस्टर का मसौदा जारी होने के साथ राजनीतिक हंगामा होगा।

यह साफ था कि जब नए सिरे से वास्तविक नागरिकों और विदेशियों की व्यापक स्तर पर छानबीन हो रही है तो काफी लोगों का नाम इस रजिस्टर में नहीं होगा। वही हुआ है। 3 करोड़ 29 लाख 91 हजार 380 लोगों के आवेदन में से 2 करोड़ 89 लाख 38 हजार 677 का नाम अंतिम मसौदे में आने का अर्थ हुआ कि शेष 40 लाख 52 हजार 708 लोग संदिग्ध हैं।

किंतु खड़ा किए जा रहे तूफान के पीछे नैतिकता का आधार नहीं है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इस समय गृहयुद्ध और रक्तपात की धमकी दे रहीं हैं। जब वो सत्ता में नहीं थी तो उनके लिए विदेशी घुसपैठियों की पहचान बड़ा मुद्दा था। विडम्बना देखिए कि कांग्रेस के ही पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के समझौते के अनुसार यह काम किया जाना था,

जो पहले नहीं हो पाया। अपनी गलती मानने की बजाय कांग्रेस सरकार पर समुदाय विशेष के खिलाफ काम करने का आरोप लगा रही है। हालांकि महापंजीयक शैलेश ने साफ किया है कि जिनका नाम नहीं है उन सबको अपना दावा करने और आपत्ति जताने का मौका मिलेगा। किंतु हंगामा किस बात का। क्या राजनीतिक दलों की हमदर्दी विदेशी घुसपैठिओं के लिए है।

1951 में हुई जनगणना के बाद पहला एनआरसी रजिस्टर बना था। सरकार के आदेश पर 1960 में एनसीआर विवरणी को पुलिस को सौंप दिया गया। पुलिस उस पर कार्रवाई करती तो समस्या का कुछ समाधान होता। लेकिन पुलिस राजनीतिक नेतृत्व के निर्देश पर ही काम कर सकती थी। फलतः इस विवरणी को नए सिरे से अद्यतन करने की मांग जोर पकड़ने लगी।

पड़ोसी देश से आने वालों ने असम के अनेक क्षेत्रों में अशांति एवं तनाव पैदा कर दिया। केन्द्र की अनसुनी एवं स्थिति बिगड़ने के बाद 1979 से इनको बाहर निकालने के लिए व्यापक जन आंदोलन आरंभ हो गया। ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन और ऑल असम गण संग्राम परिषद के बैनर तले चले आंदोलन पता नहीं हमारे नेताओं को याद है भी या नहीं।

असम के लोगों की मांग स्पष्ट थी, बहार से आए लोगों को वापस भेजा जाए। 1985 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने आंदोलनरत छात्र नेताओं के साथ समझौता किया। जब राजीव गांधी ने 15 अगस्त को लालकिले से इसकी घोषणा की पूरे देश ने स्वागत किया। इसमें तीन बातें प्रमुख थीं। एक, 1951 से 1961 के बीच असम आए लोगों को पूर्ण नागरिकता और वोट देने का अधिकार मिलेगा।

दो, 1961 से 1971 के बीच आने वालों को नागरिकता और अन्य अधिकार दिए जाएंगे, लेकिन वोट का अधिकार नहीं दिया जाएगा। 24 मार्च 1971 के बाद असम में आए लोगों को वापस भेजा जाएगा। अगले चुनाव में असम गण संग्राम परिषद की सरकार बनी पर समझौते पर काम नहीं हुआ। तबसे स्थिति और बिगड़ी। वहां भूमिपुत्र आंदोलन भी था,

असम की उपराष्ट्रीयतावाद के आंदोलन भी थे, जिनकी चर्चा इस समय करके बताया जा रहा है कि एनआरसी समस्या बढ़ाएगा। उसमें असम के बाहर से आए लोगों का विरोध था, लेकिन यह कभी राज्यव्यापी समर्थन नहीं पा सका। किंतु बंगलादेशी घुसपैठियों के विरुद्ध हुए आंदोलन को व्यापक जनसमर्थन मिला। कारण साफ था। घुसपैठिए स्थानीय निवासियों के लिए समस्या बन गए।

असम पर काम करने वाले जानते हैं कि अनेक जगहों पर घुसपैठियों ने जमीन से लेकर संसाधन तक पर कब्जा कर लिया है। इसके विरुद्ध आदिवासियों जातियों के संगठन खड़े हुए, उनमें हथियारबंद समूह भी हैं। उदाहरण के लिए बोडो स्वायत्त परिषद। 2005 से फिर आसू ने आंदोलन आरंभ किया। उस समय की असम सरकार ने इस पर काम शुरू करने का ऐलान किया लेकिन वही हीला-हवाला।

अंततः एक एनजीओ ने 2013 में उच्चतम न्यायालय का दरवाला खटखटाया। उसमें केंद्र और राज्य सरकार ने दलील थी कि ड्राफ्ट जारी होने से कानून व्यवस्था का मामला उठ सकता है, क्योंकि इसमें लाखों लोगों के नाम नहीं होने से आशंका की स्थिति पैदा हो सकती है कि उनका भविष्य क्या होगा। न्यायालय ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया।

एनआरसी कोई छोटा मोटा अभियान नहीं था। इतनी बड़ी प्रक्रिया, जिसमें 52,000 कर्मचारियों को तीन साल से ज्यादा का समय लगा आप कुछ त्रुटियों को इंगित कर खारिज नहीं कर सकते। अब जरा असम जनसंख्या की कुछ सच्चाइयां देखें। 1951 के बाद ही असम की जनसंख्या देश के दूसरे हिस्सों से ज्यादा अनुपात में बढ़ती रही।

1951 में असम की आबादी 80.3 लाख थी जो 2011 में 3.12 करोड़ हो गई। 1971 से 2011 के बीच करीब सवा करोड़ मतदाता बढ़ गए। 1971 में असम में मतदाताओं की संख्या 62 लाख 68 हजार 273 थी, जबकि 2011 में यह 1 करोड़ 81 लाख 88 हजार 269 हो गई। 1971 से 1991 के 20 वर्षों में 89 प्रतिशत मतदाता बढ़े। आज नौ जिलों में मुस्लिम आबादी 20 से 24 प्रतिशत हो गई है।

वे 14 में से 6 लोकसभा सीटों को प्रभावित करने की स्थिति में हैं। 40 विस सीटों पर बंगला भाषी मुस्लिम मतदाता प्रभावी हैं। 24 विधानसभा सीटों पर ये निर्णायक हैं। क्या ये आंकड़े भयभीत नहीं करते। इस तरह से आबादी और वह भी एक समुदाय का बढ़ना क्या साबित करता है। उच्चतम न्यायालय ने इसके लिए विदेशी हमला जैसा शब्द प्रयोग किया था।

फिर न्यायालय ने 17 दिसंबर 2014 को एनआरसी को अद्यतन करने की समय सीमा तक करके इसकी निगरानी अपने हाथों ली। हालांकि इतने समय से आने वाले एक-एक व्यक्ति के बारे में पता करना कठिन है। किंतु जितना संभव है पहचान तो होनी चाहिए। राजनीतिक दलों की समस्या समझ में आने वाली है। जिन विदेशियों को जीत की लालच में मतदाता बना दिया वे अब मतदान से वंचित हो जाएंगे।

ममता बनर्जी को इसकी प्रतिध्वनि प. बंगाल में सुनने का भय पैदा हो रहा है। वहां मुस्लिम आबादी करीब 30 प्रतिशत है जिसमें बांग्लादेशी भी भारी मात्रा में है। बिहार से लेकर दिल्ली, मुंबई आदि सभी राज्यों में इनकी पहचान की प्रक्रिया चलनी चाहिए। अभी जिनकी पहचान हो रही है उनके साथ क्या करना है ये बाद में तय होगा। बांग्लादेश उनको स्वीकार करने को तैयार नहीं होगा यह भी साफ है।

तो वे यहां विदेशी नागरिक के रुप में रहेंगे तब तक रहेंगे जब तक उनकी वापसी नहीं हो जाती। उनको वर्किंग परमिट दिया जाए। स्वास्थ्य व सारे मानवीय सेवाएं प्रदान की जाए लेकिन विदेशी नागरिक मानकर।

हालांकि पाक, अफगान और बंग्लादेश से जो हिन्दू, सिख, बौद्ध पीड़ित होकर आए हैं उनके साथ दूसरे तरीके का व्यवहार करना होगा। इसलिए उनको यहां शरण देकर पूर्व में आए शरणार्थियों की श्रेणी नागरिकता देनी होगी। किंतु केन्द्र सरकार एवं भाजपा स्वयं तो इस मुद्दे पर मुखर स्पष्टता से सामने आए।

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