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संपादकीय लेख : जनसंख्या नियंत्रण के लिए राष्ट्रीय कानून पर हो विचार

विश्व जनसंख्या दिवस पर भारत में आबादी नियंत्रण पर सार्थक चिंतन होना चाहिए। चीन के बाद भारत दूसरा सर्वाधिक आबादी वाला देश है। यूनाइटेड नेशन्स पॉपुलेशन फंड 2019 की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2010 से 2019 के बीच भारत में जनसंख्या 1.2 फीसदी की सालाना दर से बढ़़ी है, जबकि इसी समयकाल में चीन की आबादी वृद्धि दर 0.5 फीसदी रही है। अभी भारत की आबादी 136 करोड़ के करीब है, जबकि चीन की आबादी 142 करोड़ है।

संपादकीय लेख : जनसंख्या नियंत्रण के लिए राष्ट्रीय कानून पर हो विचार
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संपादकीय लेख

Haribhoomi Editorial : विश्व जनसंख्या दिवस पर भारत में आबादी नियंत्रण पर सार्थक चिंतन होना चाहिए। चीन के बाद भारत दूसरा सर्वाधिक आबादी वाला देश है। यूनाइटेड नेशन्स पॉपुलेशन फंड 2019 की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2010 से 2019 के बीच भारत में जनसंख्या 1.2 फीसदी की सालाना दर से बढ़़ी है, जबकि इसी समयकाल में चीन की आबादी वृद्धि दर 0.5 फीसदी रही है। अभी भारत की आबादी 136 करोड़ के करीब है, जबकि चीन की आबादी 142 करोड़ है। इसी रफ्तार से आबादी बढ़ी तो भारत 2030 तक चीन को लांघ देगा। तब भारत नंबर एक पर होगा। 2040 तक भारत की जनसंख्या 157 करोड़ तो 2050 तक 165 करोड़ होगा। बेहिसाब जनसंख्या वृद्धि से व्यापक बेरोजगारी और राजनीतिक अस्थिरता पैदा होंगी। उत्तर प्रदेश सरकार ने नई जनसंख्या नीति लागू किया है, जिसमें सरकारी सुविधाओं को दो बच्चे तक सीमित किया है। निश्चित रूप से यह व्यवस्था कानून लागू होने के बाद की स्थिति पर लागू होगी, उससे पहले पर नहीं। लेकिन जनसंख्या नियंत्रण के किसी भी प्रयास का स्वागत किया जाना चाहिए।

भारत में कुछ राजनीतिक दलों को लगता है कि हिंदुओं की अपेक्षा मुस्लिमों की आबादी तेजी से बढ़ रही है, जबकि नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के मुताबिक 20 फीसदी से ज्यादा मुस्लिम आबादी वाले राज्य लक्षद्वीप (96%), जम्मू-कश्मीर (68%), असम (34%), पश्चिम बंगाल (27%) और केरल (26%) में प्रजनन दर राष्ट्रीय दर 1.8 फीसदी से कम है। लक्षद्वीप व जम्मू-कश्मीर में 1.4 फीसदी, असम में 1.7 फीसदी, पश्चिम बंगाल में 1.6 फीसदी व केरल में 1.8 फीसदी प्रजनन दर है। बिहार की प्रजनन दर सर्वाधिक 3 फीसदी है, उसके बाद मेघालय में 2.9%, यूपी में 2.4%, झारखंड में 2.3% और राजस्थान में 2.1% है। इन सरकारी आंकड़ों से साफ है आबादी बढ़ने का संबंध मजहब से नहीं है। यह सबको समझना होगा। पॉपुलेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया के मुताबिक, प्रजनन दर का सीधा संबंध धर्म से नहीं बल्कि, शिक्षा, सामाजिक-आर्थिक स्थिति, स्वास्थ्य सुविधा से है। सांसद सुब्रमण्यम स्वामी, हरनाथ सिंह यादव व अनिल अग्रवाल ने आगे मानसून सत्र में पेश करने के मकसद से जनसंख्या नियंत्रण पर एक निजी बिल का मसौदा तैयार किया है। केंद्रीय स्तर पर जनसंख्या नियंत्रण पर कोई कानून बनता है तो यह देश के लिए बेहतर होगा। ऐसा नहीं है कि देश में जनसंख्या नियंत्रण के लिए पूर्व में प्रयास नहीं हुआ है।

इंदिरा गांधी ने नसबंदी लागू करने का प्रयास किया था, लेकिन उसका राजनीतिक नुकसान कांग्रेस को भुगतना पड़ा था। उसके बाद से किसी सरकार ने हिम्मत नहीं दिखाई। सरकार ने जनसंख्या नियंत्रण के लिए 'हम दो हमारे दो' नारे के साथ राष्ट्रीय जागरूकता अभियान चलाया, इसका असर भी देखने को मिला कि हमारी आबादी की रफ्तार धीमी हुई। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे की रिपोर्ट के मुताबिक ज्यादातर राज्यों में प्रजनन दर गिरकर रिप्लेसमेंट रेट (2.1) के बराबर या नीचे आ गया है। रिप्लेसमेंट रेट वह है, जब आबादी नहीं बढ़ती, यानी जितने लोगों की मृत्यु होती है, लगभग उतने पैदा होते हैं। साल 1971 में यह 5 थी, जो अब 2.1 है। इसके बावजूद भारत में आबादी वृद्धि की रफ्तार घटाने के लिए अभी बहुत कुछ किए जाने की जरूरत है। चीन ने जिस तरह एक बच्चे के नियम को सख्ती से लागू किया, रूस व कई यूरोपीय देशों ने सघन जागरूकता से जनसंख्या नियंत्रण किया, वैसे ही भारत में भी जनसंख्या नियंत्रण के लिए सख्त कानून पर विचार के साथ जागरूकता के संयुक्त प्रयास किए जाने की जरूरत है। इस अभियान में धार्मिक भावना से किसी को लक्षित करने से नुकसान होगा। ­सामूहिक जिम्मेदारी परिवार सीमित रखने की है।

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