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इतिहास रचेगी इसरो-नासा की जुगलबंदी

नासा पर नाज करने वाले अमेरिका भारत के इसरो के आगे नतमस्तक है।

इतिहास रचेगी इसरो-नासा की जुगलबंदी
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नासा पर नाज करने वाले अमेरिका भारत के इसरो के आगे नतमस्तक है। 25 साल में ही अमेरिका का नासाई गुरूर टूट गया। अमेरिकी अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन नासा ने भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन इसरो के साथ मिलकर डेढ़ अरब डालर लागत वाले निसार प्रोजेक्ट पर आगे बढ़ने का फैसला किया है। यह संचार प्रोजेक्ट है।

निसार अहम प्रोजेक्ट इसलिए है कि इससे पृथ्वी पर होने वाली प्राकृतिक घटनाओं जैसे पारिस्थितिकी तंत्र में फेरबदल, बर्फ क्षेत्र का घटना, भूकंप, सुनामी, चक्रवात, ज्वालामुखी और भूस्खलन के संबंध में बेहतर जानकारी जुटाई जा सकेगी। इससे पृथ्वी की उपरी परत क्रस्ट की उत्पत्ति, मौसम और पर्यावरण पर विस्तृत शोध हो सकेगा और भविष्य की संसाधनों और खतरों के बारे में पता लगा पाना संभव हो सकेगा।

इसके जरिए जलस्रोतों की भी पुख्ता जानकारी मिल सकेगी। नासा 2007 से पृथ्वी के पारिस्थितकी तंत्र संरचना और बर्फीले स्थानों में होने वाले बदलावों को सिंथेटिक अपर्चर रडार के जरिए मापने की संभावना पर काम कर रहा है। इसी क्रम में नासा ने इसरो से हाथ मिलाया है।

नासा के मुताबिक इसरो से बेहतरीन इस परियोजना में और कोई बेहतर साझीदार नहीं हो सकता है। लेकिन एक समय ऐसा भी था जब 1992 में अमेरिका ने रूस पर दबाव बना कर भारत को क्रायोजनिक इंजन नहीं देने दिया था।

भारत के अंतरिक्ष अनुसंधान कार्यक्रम से अमेरिका इतना खफा था कि 1992 में यूएस के तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने इसरो पर प्रतिबंध लगा दिया था। अमेरिका की हरसंभव कोशिश थी कि भारत को मिसाइल विकसित करने की तकनीक नहीं मिले।

मिसाइल और सैटेलाइट टेक्नोलॉजी में अमेरिका अपनी बादशाहत कायम रखना चाहता था। वह तीसरी दुनिया के विकासशील देशों को अपना बाजार समझता था और इसलिए तकनीक नहीं देना चाहता था। रूस को भी किसी को तकनीक देने से रोकता था।

लेकिन अमेरिकी नीयत में खोट भारत के लिए वरदान साबित हुई। इसरो ने अपने दम पर क्रायोजेनिक इंजन विकसित किया और इस पर चलने वाले जीएसएलवी को बनाने में कामयाब रहा।

इसरो द्वारा 2008 में चंद्रयान, 2014 में बहुत कम खर्च में मंगलयान, 2017 में पीएसएलवी के जरिये एक बार में सबसे अधिक 104 उपग्रह के सफल प्रक्षेपण की क्षमता हासिल करने के बाद अमेरिका को एहसास होने लगा है कि आने वाले समय में अब उसे रूस से ज्यादा चुनौती भारत से मिलेगी।

1988 से 2017 तक भारत 22 रिमोट सेंसिंग उपग्रह लॉन्च कर चुका है। जीएसएलवी मार्क 2 का सफल प्रक्षेपण भी भारत के लिए बड़ी कामयाबी थी, क्योंकि इसमें इसरो ने स्वदेश निर्मित क्रायोजेनिक इंजन लगाया था।

इसके बाद भारत को सैटेलाइट लॉन्च करने के लिए दूसरे देशों पर निर्भर नहीं रहना पड़ा। इसरो ने पिछले साल 28 अप्रैल को अपना नेविगेशन उपग्रह लॉन्च किया। इससे भारत को अमेरिका के जीपीएस सिस्टम के समान अपना खुद का नेविगेशन सिस्टम मिल गया।

इससे पहले अमेरिका और रूस ने ही ये उपलब्धि हासिल की थी। इसरो ने पिछले साल ही अपना नाविक सैटेलाइट नेविगेशन प्रणाली स्थापित किया और दोबारा प्रयोग में आने वाले प्रक्षेपण यान (आरएलवी) और स्क्रैमजेट इंजन का सफल प्रयोग किया।

1962 में स्थापना के बाद शुरूआती दौर में जीएसएलवी व पीएसएलवी सीरीज के कुछ उपग्रहों की असफलताओं के बाद से इसरो लगातार सफलताएं हासिल कर रहा है। उसने अपने कारनामों से चीन को भी पीछे छोड़ दिया है। आज अमेरिकी स्पेस संगठन नासा के बाद इसरो दुनिया का सबसे भरोसेमंद स्पेस शोध संस्थान बन गया है।

इसरो की कामयाबी निश्चित ही भारतीय वैज्ञानिकों की कामयाबी है। आज वह व्यवसायिक प्रक्षेपण में कदम बढ़ा रहा है। पहले स्पेस साइंस में रूस का दबदबा था। फिर अमेरिका ने परचम लहराया। लेकिन 21वीं सदी में तस्वीर बदल चुकी है।

दुनिया इसरो युग का स्वागत कर रही है। सारा अाकाश पलकें बिछाए खड़ा है। इसरो ध्रुवतारा बन गया है। जो अमेरिका पहले भारत के खिलाफ आंखें तरेरता था, उसी अमेरिका की नजर अब झुक गई है। अंतरिक्ष में इसरो व नासा की नई जुगलबंदी सफलता का नया इतिहास लिखेगी।

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