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समान नागरिकता कानून पर आखिर आपत्ति क्यों

देश के पांच अलग अलग हिस्सों की पांच मुस्लिम महिलाओं ने समानता के अवसर और हकों को लेकर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।

समान नागरिकता कानून पर आखिर आपत्ति क्यों
जिसकी आशंका थी, वही होता हुआ नजर आने लगा है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर केन्द्र सरकार ने तीन तलाक के विरोध में हलफनामा दाखिल किया और लॉ कमीशन को समान नागरिकता कानून पर अपनी राय देने को कहा तो इसका विरोध शुरू हो गया। कोई इसे राजनीति से प्रेरित कदम बता रहा है। कोई यूपी के चुनाव से जोड़कर भाजपा पर साम्प्रदायिक एजेंडे पर लौटने का आरोप लगा रहा है तो मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड के पदाधिकारियों ने लॉ कमीशन की ओर से भेजी गई प्रश्नावली के बायकाट का ही ऐलान कर दिया है।
वह यहीं नहीं रुके, उन्होंने पीएम नरेन्द्र मोदी पर कई दूसरे आरोप भी लगा डाले हैं। यहां तक बयानबाजी कर डाली कि सरहद को तो संभाल नहीं पा रहे हैं, देश में सम्प्रदायवाद को हवा देना शुरू कर दिया है। मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड के बैनर तले इकट्ठा हुए मुसलिम संगठनों के पदाधिकारियों ने प्रेस कांन्फ्रेंस में केन्द्र को परोक्ष रूप से यह धमकी तक दे डाली है कि अगर उनके पर्सनल लॉ से छेड़छाड़ करके कॉमन सिविल कोड जबरन थोपने की कोशिशें की गईं, तो वे चुप नहीं बैठेंगे।
सिखों, इसाइयों, जैन, बौद्ध और दूसरे धर्म के मानने वालों को भी इकट्ठा करेंगे, जिनके अपने रीति रिवाज, तहजीब और पर्सनल लॉ हैं। उनका तर्क था कि जब अमेरिका जैसे देश में अलग-अलग मजहब व सम्प्रदायों को मानने वालों को पर्सनल लॉ के शादी-विवाह और दूसरे कामकाज करने की छूट है, तब भारत में कॉमन सिविल कोड लागू करने की कोशिश क्यों की जा रही है? पिछले 68 साल में जब इसकी जरूरत किसी सरकार ने महसूस नहीं की तो मौजदा मोदी सरकार ऐसा करके एक बड़े समुदाय के अंदरूनी मामलों में दखल क्यों दे रही है?
मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड ही नहीं, कांग्रेस से लेकर जनता दल (यू), सपा और दूसरे राजनीतिक दलों ने भी इस मसले पर लॉ कमीशन की पहल पर सवाल खड़े करने शुरू कर दिए हैं। यानी बाकी मुद्दों की तरह इस पर राजनीतिक रोटियां सेंकने का सिलसिला शुरू हो गया है। भाजपा दरअसल, शुरू से ही इस पक्ष में रही है कि एक देश में एक ही कानून लागू होना चाहिए। किसी को भी पर्सनल लॉ के तहत काम करने की छूट नहीं दी जानी चाहिए। यह मसला वास्तव में केंद्र की मौजूदा सरकार ने अपनी तरफ से शुरू नहीं किया है।
देश के पांच अलग-अलग हिस्सों की पांच मुसलिम महिलाओं ने समानता के अवसर और हकों को लेकर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। वैसे भी इस पर सवाल खड़े होते रहे हैं कि मुसलिम समुदाय महिलाओं को समानता से वंचित क्यों रखे हुए है। तीन तलाक ऐसा ही मुद्दा है। केवल पुरुष को ही महिला को तलाक देने का एकाधिकार है। शाह बानो केस से इस पर सवाल उठने शुरू हुए थे, जब शीर्ष अदालत ने उसके पूर्व पति को गुजारा भत्ता देने के आदेश दिए थे। इसका भी मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड व बाकी संगठनों ने तीखा प्रतिवाद किया था।
घबराकर तब की राजीव गांधी सरकार ने संसद से कानून पारित कर सुप्रीम कोर्ट के आदेश को बेअसर कर दिया था। मौजूदा सरकार पूरे देश में हर नागरिक को समान अधिकार देने के पक्ष में है। वह पुरुष हो या महिला। हिंदू हो या मुसलमान या किसी दूसरे मजहब को मानने वाले नागरिक। समान अधिकारों की पैरवी करने और तीन तलाक जैसी प्रथाओं का विरोध करने वाले बहुत से कानूनविद और चिंतक मानते हैं कि मौजूदा दौर में शरीयत के हिसाब से जबरन फैसलों को महिलाओं पर नहीं थोपा जा सकता।
कम से कम 22 मुसलिम देश भी तीन तलाक जैसी प्रथाओं को कानूनों के जरिए समाप्त कर चुके हैं, जिनमें पाकिस्तान और बंगलादेश भी शामिल हैं। ऐसे में लोकतंत्र और पंथनिरपेक्ष देश भारत में समान नागरिक कानून को लागू करने के प्रयासों पर आपत्ति का आखिर क्या औचित्य है?
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