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निरंकार सिंह का लेख : संस्कृति के मूलाधार राम

राम हमारी सनातन संस्कृति के नैतिक मूल्यों और आचार विचार के सर्वोच्च मानदंड हैं। उनके बिना हम भारतीय समाज के आदर्श की कल्पना भी नहीं कर सकते, क्योंकि वही हमारी संस्कृति के मूलाधार हैं। युगों-युगों से राम भारतीय जनमानस के आराध्य हैं। मनुष्य के जीवन में जो भी श्रेष्ठ और सुन्दर है उसकी उत्पत्ति तो राम चरित्र से ही बताई जाती है। दुनिया में कई प्राचीन सभ्यताओं का जन्म हुआ जो समय के साथ इतिहास के गर्त में खो गई, किन्तु राम का गौरव कायम है।

निरंकार सिंह का लेख : संस्कृति के मूलाधार राम
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निरंकार सिंह

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 5 अगस्त को अयोध्या में राम जन्मभूमि पर मंदिर निर्माण के लिए भूमि पूजन करके भारतीय गौरव गरिमा का इतिहास रच दिया है। 500 वर्षों के लंबे संघर्ष के बाद अब हर भारतीय के मन की आकांक्षा पूरी होती हुई दिखाई दे रही है। दरअसल राम हमारी सनातन संस्कृति के नैतिक मूल्यों और आचार विचार के सर्वोच्च मानदंड हैं। उनके बिना हम भारतीय समाज के आदर्श की कल्पना भी नहीं कर सकते, क्योंकि वही हमारी संस्कृति के मूलाधार हैं। युगों-युगों से राम भारतीय जनमानस के आराध्य हैं। मनुष्य के जीवन में जो भी श्रेष्ठ और सुन्दर है उसकी उत्पत्ति तो राम चरित्र से ही बताई जाती है। दुनिया में कई प्राचीन सम्भ्यताओं का जन्म हुआ जो समय के साथ इतिहास के गर्त में खो गयी, किन्तु राम का गौरव कायम है। रामकथा और उनका चरित्र अमर है क्योंकि वे कालजयी हैं।

यदि भारत में आज कोई ईमानदारी, अतिथि सत्कार, सतीत्व, परोपकार, मूक पशुओं के प्रति दया भाव, पाप से घृणा तथा भलाई की भावना है तो वह जनमानस में रामचरित्र के प्रति आस्था के ही कारण है। पुरानी आस्था तथा संस्कृति केवल हिन्दुओं या भारतीयों के लिए नहीं बल्कि समूचे संसार के लिए सार्थक है। भारत की धार्मिक स्वतंत्रता तथा सहनशीलता की परम्परा अद्वितीय है। इस परम्परा का जन्म उस चेतना के फलस्वरूप हुआ था जिसमें सत्य पर किसी जाति या सम्प्रदाय विशेष का अधिकार नहीं होता।

भगवान राम की ऐतिहासिकता के बारे में पश्चिमी विचारक सवाल उठाते रहे हैं और उनकी इस जिज्ञासा को समझा जा सकता है। पर कांग्रेस के शासन काल में जिस तरह सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल करके रामसेतु को काल्पनिक बताया गया था वह समझ से परे की बात है। राम और उनसे सम्बन्धित स्थानों तक वर्तमान इतिहास की कोई पहुंच नहीं हो सकती है क्योंकि उसका इतिहास सिर्फ पांच छह हजार वर्ष का ही है। इस धरती पर मानव का अवतरण 40 लाख वर्ष पहले हुआ था। इस दौरान कितनी सभ्यताओं का उत्थान-पतन लोप हुआ इसका कोई विवरण हमारे इतिहासकारों के पास नहीं है। इसलिए राम के बारे में सम्पूर्ण जानकारी वाल्मीकि रामायण से ही प्राप्त हो सकती है। वेद, उपनिषद महाभारत तथा पुराणों, तन्त्रों और आगमों से ही राम-रावण चरित्रों का बोध हो सकता है। रामायण एवं पुराणों के अनुसार राम का प्रादुर्भाव लाखों वर्ष पूर्व चैबीसवें त्रेता युग में हुआ था।

पुराणांे के अनुसार राम का जन्म 28वें मन्वन्तर के 24वें त्रेता में हुआ है फिर भी पाश्चात्यों ने अपनी अटकल से उनका जन्म ईसा पूर्व कुछ शदियों या सहस्त्राब्दियों में ही माना है। जोन्स नामक अंग्रेज इतिहासज्ञ राम का जन्म काल ई0पूर्व 2029 वर्ष मानता है। टाॅड ने ई .पूर्व 1100 वर्ष राम का जन्म समय माना है। वैन्थली ने ई. पूर्व 950 वर्ष ही स्वीकार किया है। विल्फर्ड नामक इतिहासज्ञ ने ई. पूर्व 1360 वर्ष राम का जन्म काल माना है। भौतिक विज्ञानी डा. पुष्कर भटनागर ने वाल्मीकि रामायण में राम जन्म के समय वर्णित नक्षत्रों की स्थिति के आधार पर नासा द्वारा विकसित साफ्टवेयर प्लेनेटोरियम के जरिये गणना करके यह पता लगाया है कि राम का जन्म 10 जनवरी 5114 ईसा पूर्व हुआ था। महर्षि वाल्मीकि के अनुसार दशरथ के पुत्रेष्टियज्ञ की समाप्ति के 12 मास बीतने पर चैत्र शु नवमी पुनर्वसु नक्षत्र कर्क लग्न मंे तथा जब पांच ग्रह अपनी उच्च राशि में स्थित थे एवं गुरू चन्द्र के साथ थे उस समय राम का अवतार हुआ।

हिन्दुओं के धार्मिक, सांस्कृतिक एवं पारिवारिक जीवन पर मर्यादा पुरूषोत्तम राम का अमिट प्रभाव है। हिन्दू परिवार में जन्म एवं विवाह के अवसरों पर रामजन्म एवं राम विवाह संबंधी गीत गाए जाते हैं। शरीर की अन्तिम यात्रा रामनाम सत्य है की ध्वनि के साथ होती है। भारत के कोने-कोने मंे राम और उनके भक्त हनुमान के मन्दिर हैं। भारत के बच्चे-बच्चे की जबान पर राम नाम रहता है। जीवन के हर सुख दु:ख में हम राम का ही स्मरण करते हैं। काशी में जीवों की मुक्ति के लिए शिवजी राम-नाम का उपदेश करते हैं। फिर भी राम की ऐतिहासिकता पर शंका करना केवल मतिविभ्रम ही है।

महर्षि मार्कण्डेय ने वनवास के समय युधिष्ठिर से कहा था, आपकी यह विपत्ति मुझे रामचन्द्र का स्मरण हो आया। पिता की आज्ञा से धनुष हाथ में लेकर घूमते हुए उन्हें ऋष्यमूक पर्वत पर मैंने देखा था। उन्होंने यह नहीं कहा कि मैंने केवल सुना है। गीता के कृष्ण कहते हैं कि शस्त्रधारियों में मैं राम हूं। शंकराचार्य की रामपद की व्याख्या में दाशरथ राम कहा गया है। लगभग सभी पुराणों तथा काव्यों में श्रीमद्भागवत भागवतों का परमादरणीय ग्रन्थ है। प्रतिवर्ष जिसके हजारों सप्ताह होते हैं, उनमें भी रामायण एवं राम की चर्चा है। ऐसे बहुचर्चित राम को अनैतिहासिक कहना अनभिज्ञता का ही परिचय देना है।

इतिहास तथा जीवनवृत्त सम्बन्धी प्रामाणिक पुस्तकें तथा तत्कालीन या कालान्तरवर्ती पुस्तकों में तत्संबंधी चर्चाएं, उनके द्वारा लिखित पुस्तकें या निर्मित मन्दिर, सेतु तथा तत्सम्बन्धी शिलालेख, ताम्रलेख या मुद्राएं किसी के ऐतिहासिक होने में प्रमाण कही जाती हैं। इस दृष्टि से देखने पर राम की भी ऐतिहासिकता सिद्ध है। राम के जीवन की प्रमुख घटनाएं लोकपरंपरा में अत्यन्त प्रसिद्ध है। संसार में ऐसी प्रसिद्धि किसी की भी नहीं है। भारत में ही नहीं सुदूर देशों में भी राम के चरित्रों के आधार पर अनेक लीलाएं तथा नाटक होते हैं।

दरअसल हमारे जीवन का आधार ही राम नाम है। हर जगह राम नाम की महिमा का गुणगान है। शास्त्रों के अनुसार राम नाम में ही पूरा ब्रह्मांड समाया है और सभी देवता भी इसी में समाए हैं जिसने राम नाम का जाप कर लिया वह अपने जीवन में तर जाता है। इस साधारण से नाम में असीम शक्ति छिपी हुई है। हमारे ऋषि-मुनियों ने एक सार्थक नाम के रूप में राम नाम के महत्व को पहचाना। उन्होंने इस पूजनीय नाम की परख की और नामों के आगे लगाने का चलन प्रारंभ किया। प्रत्येक हिंदू परिवार में देखा जा सकता है कि बच्चे का जन्म राम के नाम के स्वर से होता है। राम में शिव और शिव में राम विद्यमान है। राम को शिव का महामंत्र माना गया है। राम सर्वमुक्त है राम सभी की चेतना का सजीव नाम है। कुख्यात डाकू रत्नाकर राम नाम से प्रभावित हुए और अंततः महार्षि वाल्मिकी नाम से विख्यात हुए। राम नाम की चैतन्य धारा से मनुष्य की प्रत्येक आवश्यकता स्वत ही पूरी हो जाती है। यह नाम सर्व समर्थ है। राम अपने भक्त को उसके हृदय में वास कर सौभाग्य प्रदान करते हैं। तुलसीदास जी ने रामचरित मानस में लिखा है। प्रभु के जितने भी नाम प्रचलित है, उनमें सर्वाधिक श्री फल देने वाला नाम राम का ही है। इससे बधिक, पशु, पक्षी, मनुष्य आदि तक तर जाते हैं। सारी जिंदगी भगवान श्री कृष्ण की भक्ति में लीन रहने वाली मीराबाई ने अंततः यही गाया। पायो जी मैने राम रत्न धन पायो। उन्होंने कृष्ण रत्न धन क्यों नहीं कहा क्योंकि राम नाम की महिमा अपरमपार है अन्य देवी देवताओं की तुलना में राम सबको आसानी से प्राप्त हो जाते हैं। राम नाम में रा अग्नि स्वरूप है जो हमारे दुष्कर्मों का दाह करता है। वहीं म जल तत्व का घोतक है। जल आत्मा की जीवात्मा पर जीत का कारक है। इस तरह श्री राम का अर्थ है। शक्ति से परमात्मा पर विजय।

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