Top
Hari bhoomi hindi news chhattisgarh

तस्वीर से निकला जिन्ना का जिन, देश में मचा बवाल

अलीगढ़ मुस्लिम विवि छात्रसंघ के हॉल में लगी मुहम्मद अली जिन्ना की तस्वीर के विवाद की रोशनी में हम अपने साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के कुछ स्रोतों को देख सकते हैं। एक दलील है कि जिन्ना की वजह से देश का विभाजन हुआ। स्वतंत्र भारत में उनकी तस्वीर के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए। यह मांग बीजेपी के एक सांसद ने की है, इसलिए एक दूसरा पक्ष भी खड़ा हो गया है। वह कहता है कि तस्वीर नहीं हटेगी।

तस्वीर से निकला जिन्ना का जिन, देश में मचा बवाल
X

अलीगढ़ मुस्लिम विवि छात्रसंघ के हॉल में लगी मुहम्मद अली जिन्ना की तस्वीर के विवाद की रोशनी में हम अपने साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के कुछ स्रोतों को देख सकते हैं। एक दलील है कि जिन्ना की वजह से देश का विभाजन हुआ। स्वतंत्र भारत में उनकी तस्वीर के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए। यह मांग बीजेपी के एक सांसद ने की है, इसलिए एक दूसरा पक्ष भी खड़ा हो गया है। वह कहता है कि तस्वीर नहीं हटेगी। जिन्ना भारतीय इतिहास का हिस्सा हैं। आजादी के बाद से अब तक इस तस्वीर के लगे रहने से भारतीय राष्ट्रवाद को कोई ठेस नहीं लगी, तो अब क्या लगेगी।

इस बीच सोशल मीडिया पर संसद भवन में लगी एक तस्वीर वायरल हुई है। इस तस्वीर में देश के कुछ महत्वपूर्ण राजनेताओं के साथ जिन्ना भी नजर आ रहे हैं। वायरलकर्ताओं का सवाल है कि संसद भवन से भी, क्या जिन्ना की तस्वीर हटाओगे। इस तस्वीर में जिन्ना के साथ जनसंघ के संस्थापक श्यामाप्रसाद मुखर्जी भी नजर आते हैं। जिन्ना की तस्वीर हटे या नहीं हटे, उसकी खबर मीडिया में नहीं आई होती, तो हंगामा नहीं होता। अब हंगामा हो चुका है। अब फैसला कीजिए कि करें क्या और सोचिए कि इस हंगामे से किसका भला हुआ।

संयोग है कि इन दिनों कर्नाटक विधानसभा के चुनाव हो रहे हैं। लोकसभा चुनाव तक चुनावों का क्रम चलेगा। सोचिए कि कहीं जिन्ना विवाद का रिश्ता भी इन चुनावों से तो नहीं है। जरूरी नहीं कि हंगामा खड़ा करने वालों का इरादा चुनाव ही हो। पर यह सच है कि हमारा समाज भावनाओं के वशीभूत है। देखते ही देखते छोटी सी फुलझड़ी बड़ी आग लगा देती है। हम नहीं देख पाते हैं कि कौन-कौन सी ताकतें चुनाव को प्रभावित करना चाहती हैं और क्यों।

इसे भी पढ़ें: AMU में जिन्ना की तस्वीर पर बढ़ा बवाल, कैंपस में कड़ी सुरक्षा, इंटरनेट सेवा बंद

शुक्रवार को पाकिस्तान सरकार के एक हैंडल से टीपू सुल्तान पर एक ट्वीट फेंका गया। इसमें टीपू सुल्तान को वीर योद्धा बताया गया। एक और ट्वीट आया, जिसमें कहा गया कि वे अंग्रेजों के खिलाफ पहले स्वतंत्रता सेनानी थे। ये ट्वीट टीपू सुल्तान की 218वीं पुण्यतिथि के सिलसिले में जारी किए गए थे। उनका निधन 4 मई 1799 को हुआ था। यह तारीख पता नहीं किसी को याद थी या नहीं, पर पाकिस्तान में किसी को याद आ गई। उनका जन्म 20 नवम्बर 1750 को हुआ था। इस सिलसिले में कर्नाटक सरकार नवम्बर में जोरशोर से टीपू जयंती मना चुकी है।

टीपू.जयंती से मुसलमानों के जीवन में कितनी खुशी आई इसका पता नहीं, पर ऐसी परिघटनाएं भारत-पाकिस्तान सीमा के दोनों तरफ असर डालती हैं। दोनों देशों की तमाम अंदरूनी समस्याओं की जड़ में है देश का विभाजन। पाक सरकार ने टीपू जयंती नहीं मनाई तो पुण्यतिथि पर याद कर लिया। पता नहीं पिछले साल याद किया था या नहीं या अगले साल करेगी या नहीं, पर कर्नाटक चुनाव के मौके पर उसके दो ट्वीट अपना काम कर गए।

यह याद दिलाना भी प्रासंगिक होगा कि सन 2007 में जब भारत सरकार 1857 के संग्राम की 150वीं जयंती मना रही थी। पाकिस्तान सरकार ने उसमें साथ देने से इनकार कर दिया था। अंग्रेजों के खिलाफ वह लड़ाई हिन्दुओं और मुसलमानों ने मिलकर लड़ी थी। शायद वह कार्यक्रम सद्भाव पैदा करता, पर क्या पाकिस्तानी व्यवस्था सद्भाव चाहती है। भारत में विभाजन को एक क्रूर घटना के रूप में याद किया जाता है। पाकिस्तान इसे इतिहास की देन मानता है।

इसे भी पढ़ें: AMU विवाद: सीएम योगी ने कहा- जिन्ना ने किया था देश का बंटवारा, भारत में महिमामंडन बर्दाश्त नहीं

अलीगढ़ मुस्लिम विवि ने भारत के मुसलमानों को आधुनिक शिक्षा का तोहफा दिया। इसके साथ ही राष्ट्रीय आंदोलन के विमर्श को भी आगे बढ़ाया। विभाजन की वैचारिक पृष्ठभूमि भी इस विवि से जुड़ी है। इन दिनों चल रहे तस्वीर प्रसंग में उन परिस्थितियों पर भी नजर डालनी चाहिए, जिनमें जिन्ना को छात्रसंघ की मानद सदस्यता दी गई थी। तीस के दशक में अलीगढ़ विवि में राष्ट्रवादी मुसलमानों और मुसलिम लीग समर्थकों के बीच बहस थी। विवि में मुस्लिम लीग का झंडा फहराने की बात उठी, जिसका विरोध राष्ट्रवादी मुसलमानों ने किया।

उस वक्त विवि प्रशासन राष्ट्रवादी मुसलमानों के खिलाफ था। उन्हें या तो विवि में प्रवेश नहीं दिया जाता था या निकाल दिया जाता था। अली सरदार ज़ाफरी, जलील अब्बास,खलीलुलरब, ज़मीनुर सिद्दीकी और मिर्जा सुबेर उस्मान जैसे प्रगतिशील छात्रों को निकाल दिया गया। खवाजा अहमद अब्बास और खवाजा गुलाम सैयदीन जैसे प्रगतिशील लेखकों के लेख विवि की मैगजीन में छापने पर रोक लगी थी। इन परिस्थितियों में 7 फरवरी 1938 को छात्रसंघ के भवन पर मुस्लिम लीग का ध्वज फहराया गया और जिन्ना ने छात्रों को संबोधित किया।

इसे भी पढ़ें: जिन्ना विवादः AMU के बाहर प्रदर्शन कर रहे लोगों पर पुलिस ने किया लाठीचार्ज, यूनिवर्सिटी ने हटाई तस्वीर

इसके बाद 11 दिसम्बर 1938 को स्ट्रैची हॉल में उनका वह पोर्ट्रेट लगाया गया जो आज विवाद का विषय बना है। इस घटना के डेढ़ साल बाद 22 से 24 मार्च 1940 तक चले मुस्लिम लीग के लाहौर सत्र में प्रस्ताव पास हुआ। तस्वीर हटाने से इतिहास बदलेगा नहीं, पर इसकी पृष्ठभूमि को भी समझना चाहिए। संसद भवन में लगी तस्वीर और इस तस्वीर में अंतर है। इस तस्वीर का सीधा रिश्ता विभाजन से है, जो हमारी संवेदना पर चोट करता है।

इसकी तुलना संसद भवन की उस तस्वीर से नहीं की जा सकती, जो सोशल मीडिया में वायरल हुई है। उस तस्वीर को इतिहास का पन्ना मान सकते हैं, जिसमें जिन्ना अपने समकालीन नेताओं के साथ नजर आते हैं। तस्वीर प्रसंग पर कई तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। इनमें जिन्ना के प्रति प्रशंसा भाव भी है। जिन्ना मुसलमानों का अलग देश चाहते थे, इस्लामिक नहीं। वे धर्मनिरपेक्ष देश चाहते थे।

उन्होंने हिन्दू-मुसलमान एकता के लिए काम किया। पश्चिमी संस्कृति में रचे बसे थे, कट्टर मुसलमान नहीं थे वगैरह। हाल के वर्षों में लालकृष्ण आडवाणी से लेकर जसवंत सिंह तक ने उनकी तारीफ की है। शायद उन्होंने विभाजन की भयावहता के बारे में सोचा नहीं। उन्होंने जो परिकल्पना की थी वैसा पाकिस्तान बना नहीं।

जिन्ना ही नहीं, सभी नेताओं का स्वतंत्र देश के नेताओं के रूप में हम सम्मान करते हैं। स्वतंत्रता संग्राम में भी जिन्ना की भूमिका को हम स्वीकार करते हैं। पर वे आधुनिक भारत के हीरो नहीं हैं। ऐसे में उनकी तस्वीर को लगाए रखने पर जिद क्यों। आप चाहते हैं कि उस पर कोई प्रतिक्रिया भी नहीं हो।

और पढ़े: Haryana News | Chhattisgarh News | MP News | Aaj Ka Rashifal | Jokes | Haryana Video News | Haryana News App

Next Story
Top