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डॉ. चंद्र त्रिखा का लेख : बहुत हो चुकी बहस

संकट दोहरा, तिहरा है। एक ओर कोरोना संकट, दूसरी ओर चीन से पंगा थमने में नहीं आ रहा। पाक भी आतंक के निर्यात से गुरेज नहीं कर रहा। नेपाल नाराज है, बांग्लादेश भी ज़्यादा खुश नहीं। ऐसे माहौल में नहीं बदली तो सिर्फ एक बात। टीवी चैनलों की बहस का न अंदाज बदला, न शक्लें, न एंकरों की चीख-चिल्लाहट, न पार्टी-प्रवक्ताओं के पुराने जिद्दी तेवर। वही घिसा पिटा अंदाज, वहीं तयशुदा, पूर्व निर्धारित आरोप, वही बीच बहस में हस्तक्षेप की आदत। कुछ नहीं बदला।

डॉ. चंद्र त्रिखा का लेख : बहुत हो चुकी बहस

डॉ. चंद्र त्रिखा

जीवनशैली नीचे से ऊपर तक बदल गई। व्यापार का ढर्रा बदल गया। खानपान बदल गया। क्लब संस्कृति, महिफलें, मुशायरे, कवि सम्मेलन, पर्व, आस्था, तीज त्यौहार, सभी स्टैच्यू की मुद्रा में या किसी अभिशाप से पत्थर हो गए। सिर्फ चर्चाएं रह गईं। कुछ महीने पहले की बातें फिलहाल बीते जमाने की हो गई। न खेलकूद, न सम्मेलन, न समारोह। जन्म मरण दोनों, सिर्फ पंचायतों या नगरपालिकाओं के रजिस्ट्रों में एंट्री तक सीमित हो गए। लोक नृत्य, शास्त्रीय संगीत, फिल्म संगीत, फिल्म निर्माण, प्रीमियर शो, सभी पिछले लगभग चार महीनों से अवकाश पर, अवकाश भी अनिश्चित काल का।

संसद, विधानसभा, रैलियां, धरने, प्रदर्शन, झंडे, झंडियों की लडिय़ां, चुनाव चिह्नों के बैजों का निर्माण, फिर वितरण, सब कुछ फिलहाल अनिश्चित काल तक के लिए ठप्ा। रैलियों का स्थान वर्चुअल रैलियों ने ले लिया। सेमिनार, वैबिनार में बदल गए। बुक स्टाल या तो बंद हैं या फिर ताज़ा पत्र-पत्रिकाएं गायब हैं। यकीनन आने वाले दिनों में रामलीलाएं, नाट्य मंचन, सब कुछ स्थगित रहेगा। मथुरा, वृंदावन में जन्माष्टमी का पर्व भी औपचारिकता निभाने सरीखा होगा, वैसा जैसा पुरी की जगन्नाथ रथ यात्रा। दशहरा-दीवाली भी तय नहीं है।

संकट दोहरा, तिहरा है। एक ओर कोरोना-संस्कृति का काला संकट, दूसरी ओर चीन से पंगा थमने में नहीं आ रहा। पाक भी आतंक के निर्यात से गुरेज नहीं कर रहा। नेपाल नाराज है, बांगलादेश भी ज़्यादा खुश नहीं।

ऐसे माहौल में नहीं बदली तो सिर्फ एक बात। टीवी चैनलों की बहस का न अंदाज बदला, न शक्लें, न एंकरों की चीख-चिल्लाहट, न पार्टी-प्रवक्ताओं के पुराने जिद्दी तेवर। इनमें से किसी को माहौल के भय ने अपने रंग में नहीं रंगा। अपशब्दों, घिसे पिटे आरोपों/ प्रत्यारोपों/स्तरहीन भाषा-प्रयोग का सिलसिले जारी हैं। एंकरों को लगता है यदि तनाव बनाए रखेंगे तो टीआरपी बढ़ेगी, विज्ञापन मिलेंगे और भारी भरकम वेतन-पैकेज भी बना हरेगा। वरना इन दिनों तो कटौती और छंटनी सभी स्तरों पर जारी है।

पार्टी प्रवक्ताओं के चेहरे-मोहरे भी नहीं बदले। वही घिसा पिटा अंदाज, वहीं तयशुदा, पूर्व निर्धारित आरोप, वही बीच बहस में हस्तक्षेप की आदत। कुछ नहीं बदला। एक अजब बात यह भी है कि आज तक किसी ने इन प्रवक्ताओं को मुस्कराते या हंसते नहीं देखा। एंकरों के चेहरों का तनाव भी वहीं पुराना। विजडम तो गायब थी, धीरे-धीरे विट भी गायब हो गई है। न कोई व्यंग्य, न लतीफा, न दिलचस्प मुहावरे। बस करो भाई।

द्वितीय विश्वयुद्ध की बात याद आती है। जब लखनऊ की बेगमों तक बात पहुंची कि अंग्रेज लोग महीनों से लगातार लड़े जा रहे हैं तो एक बेगम ने हैरत से दूसरी बेगम से पूछा, हाय अल्लाह इन कम्बख्तों की जुबान नहीं थकती लड़ते-लड़ते। बेगमें नहीं रहीं, न वो शाही हरम रहे, वरना यही सवाल इन पार्टी प्रवक्ताओं व एंकरों से भी पूछ लिया जाता। ये लोग न तो ऊबते हैं न थकते हैं। अब धीरे-धीरे हताश श्रोताओं/दर्शकों ने इनसे किनारा करना शुरू कर दिया था। तरुण व युवा पीढ़ी तो वैसे भी ऐसी बहसों के समय टीवी चैनल या तो बदल लेती थी या बंद कर देती थी। अब तो प्रौढ़ व बुज़ुर्ग भी धीरे-धीरे चैनल बदल लेते हैं या बंद कर देते हैं। दर्शकों में निरंतर बढ़ती हुई उदासीनता का एहसास अभी एंकरों या पार्टी प्रवक्ताओं को हो नहीं पा रहा। वे लोग नफरत, हिकारत, विष वमन, कुतर्क और गरिमा विहीन आचरण की अपनी स्थायी आदत को अपनी पहचान बनाने लगे हंै। ये ठीक नहीं। न उनकी अपनी सेहत के लिए न देश की सेहत के लिए। शहादतें भी उनके लिए विपक्षी पर हल्ला बोलने का हथियार बन चली है।

यही स्थिति सरकारी चैनलों पर धीरे-धीरे पसरने लगी है। लोकसभा टीवी, राज्यसभा टीवी, बड़ी आसानी से अपने आर्काइव में से पुरानी दिलचस्प संसदीय बहसों का दोहरा सकते थे। लोगों ने बहुत दिनों से भीमसेन जोशी, बड़े गुलाम अली खान, पंडित ओंकार नाथ ठाकुर या उस्ताद अल्लाह रक्खा खां को न देखा न सुना। नई पीढ़ी के युवाओं व पुरानी पीढ़ी के सुसंस्कृत लोगों को इनसे मिलवा दीजिए। मगर सबका ध्यान एक तरफा कभी कोई ढंग की प्रस्तुति आ भी गई तो उसे भी जल्दी में किसी विज्ञापन की भेंट चढ़ा दिया गया।

यह सिलसिला थमना चाहिए। बढ़ती हुई हताशा और दिशाहीनता व रोज़गार-विहीनता के माहौल में अपराध भी बढ़ेंगे, आत्महत्याएं भी होंगी और 'डिप्रेशन के आंकड़ों व कोरोना के आंकड़ों में होड़ भी लग जाएगी। सबसे गंभीर संकट यह है कि इन्हें चेताने या रोकने वाले लोग भी खामोश हो चले हैं। बकौल दुष्यंत-

अब किसी को भी नजर/आती नहीं कोई दरार

घर की हर दीवार पर/चिपके हैं इतने इश्तिहार

या फिर इस शहर में अब कोई, बारात हो या वारदात

अब किसी भी बात की खुलती नहीं हैं खिडि़कियां

जिंदगी तनावों व चुनौतियों में भी कट जाती है, बशर्ते कि हम लोग संवेदनशीलता का दामन न छोड़ें। लगभग डेढ़ से दो करोड़ मेहनतकश लोग, रोजगार व घरों से उजड़े। हमने चार दिन बहस की, उन्हें हथियार की तरह एक-दूसरे के खिलाफ प्रयोग किया और फिर किसी नए हथियार की तलाश में निकल लिए। यह सिलसिला थम जाना चाहिए। शायद हम भी किसी गोदो की इंतजार में हैं, जो कभी नहीं आता।

पुरानों को याद करना हो या प्रेरणा लेनी हो, चार पल अच्छे बिताने हों या अतीत के गर्भ में बहुत कुछ हमने स्वयं ही सरका दिया था। उसे ले आएं, उसे झाड़ें और बड़े अपनत्व के साथ देखें, पढ़ें, सुनें, जि़ंदगी बेहतर लगेगी और यह मुश्किल वक्त कट जाएगा। मानव-नस्ल अस्तित्ववाद में भरोसा रखती है। यह देश महामारियों से भी जूझा है, आतंकवाद से भी और चार युद्धों से भी, मगर देश टूटा नहीं है। पहले से ज्यादा सुदृढ़ हुआ है। साहिर लुधियानवी का शताब्दी वर्ष है। कोई जश्न तो मुमकिन शायद न हो पाए मगर उसकी बात याद रख लीजिए, वो सुब्ह कभी तो आएगी। चलते-चलते आल्बेयर कामू की बात को भी याद कर लिया जाए। कामू ने लिखा था, खुशियों की खोज करते रहने पर आप कभी खुश नहीं हो सकते, हालांकि इसका मतलब यह भी नहीं है कि अपने अस्तित्व को ही सबसे प्रमुख मान लिया जाए। इस बंधन भरी दुनिया से

निपटने का सबसे अच्छा तरीका यही है कि इतना स्वतंत्र हुआ जाए कि दुनिया को हमारा अस्तित्व ही विद्रोह के रूप में लगे। इसलिए प्रबुद्ध एंकर जन। अपनी दिशा, चेहरा मोहरा और भाषा का कसैलापन व विषैलापन बदलें प्लीज। हालांकि मालूम है कि आप इस अदने से आदमी की तुच्छ व साधारण सी बात को गंभीरता से नहीं लेंगे।

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