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मानसून सत्र 2018: विपक्ष के कारण 2014 से अटके हैं मोदी सरकार के जनकल्याण 40 बिल

आज से शुरू हुए मानसून सत्र 2018 को चलने देने के लिए कांग्रेस समेत सभी विपक्षी दलों ने सर्वदलीय बैठक में सहयोग का वादा जरूर किया है, लेकिन इसी के साथ विपक्ष की सरकार को घेरने की तैयारी स्पष्ट संकेत दे रही है कि मोदी सरकार के पिछले कई सत्रों की भांति यह सत्र भी कहीं हंगामे की भेंट न चढ़ जाए।

मानसून सत्र 2018: विपक्ष के कारण 2014 से अटके हैं मोदी सरकार के जनकल्याण 40 बिल

आज से शुरू हुए मानसून सत्र 2018 को चलने देने के लिए कांग्रेस समेत सभी विपक्षी दलों ने सर्वदलीय बैठक में सहयोग का वादा जरूर किया है, लेकिन इसी के साथ विपक्ष की सरकार को घेरने की तैयारी स्पष्ट संकेत दे रही है कि मोदी सरकार के पिछले कई सत्रों की भांति यह सत्र भी कहीं हंगामे की भेंट न चढ़ जाए।

वर्ष 2014 से मोदी सरकार के करीब 40 बिल संसद में पास होने की बाट जोह रहे हैं। इनमें से करीब 12 विधेयक लोकसभा से पास हैं पर राज्यसभा में अटके पड़े हैं। हर सत्र में इन बिलों को पास कराने की कोशिश होती है, पर राज्यसभा में विपक्ष का पलड़ा भारी होने से वे अटक जाते हैं और सत्र विपक्षी हंगामे की भेंट चढ़ जाता है।

इस बार भी सत्र के बेकार जाने की बिसात बिछ गई प्रतीत हो रही है। संसदीय कार्यमंत्री अनंत कुमार ने कहा है कि पीएम नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई सर्वदलीय बैठक में सभी विपक्षी दलों ने मानसून सत्र के शांतिपूर्ण संचालन में मदद का भरोसा दिया है, जबकि कांग्रेस ने कहा है कि सरकार सभी मोर्चे पर विफल है, वह सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लेकर आएगी।

यह पक्ष-विपक्ष में टकराव के संकेत हैं। पिछले सत्र में भी राजग से अलग हुई टीडीपी व कांग्रेस अविश्वास प्रस्ताव पेश करने की कोशिश की थी। इस बार कांग्रेस की तैयारी अन्य विपक्षी दलों को लामबंद कर सरकार को बैकफुट पर लाने की है। 2019 में लोकसभा चुनाव को देखते हुए कांग्रेस की मंशा अधिक से अधिक से समान विचार वाले विपक्षी दलों को एकजुट करने की है।

इसके लिए वह मानसून सत्र का इसतेमाल करना चाहती है। गत सोमवार को कांग्रेस ने अन्य विपक्षी दलों के साथ बैठक की और उसमें सरकार को बेरोजगारी, किसान, दलित, ओबीसी, अल्पसंख्यकों, महिला सुरक्षा, मॉब लिंचिंग, एससी/एसटी एक्ट, सरकारी संस्थाओं की स्वायत्तता व जम्मू कश्मीर की स्थिति पर घेरने का फैसला किया है।

इस वक्त विपक्ष के पास- पीडीपी-भाजपा सरकार गिरने, आतंकवाद, दलित उत्पीड़न, राम मंदिर, रुपये में गिरावट, स्विस बैंक में भारतीयों का पैसा, पेट्रोलियम की महंगाई आदि जैसे अनेक मसले हैं, जिन पर वह सरकार को घेर सकती है। इधर, इस सत्र में तीन तलाक, लोकपाल, भूमि अधिग्रहण, व्हिसल ब्लोअर संरक्षण, ट्रांसजेंडर के अधिकार, भगोड़ा आर्थिक अपराधी, आपराधिक कानून संशोधन, नागरिकता संशोधन, राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा देने से, नदी विवाद से जुड़े अहम बिल को पास कराना सरकार के प्रमुख एजेंडे में है।

मुस्लिम महिलाओं को साधने के मकसद से भाजपा नीत राजग सरकार लोकसभा से पास तीन तलाक बिल को राज्यसभा से जल्द पास कराना चाहती है, ताकि 2019 में इससे लाभ लिया जा सके, लेकिन भाजपा की इस चुनावी चाल को काउंटर करने के लिए कांग्रेस ने मोदी सरकार को महिला आरक्षण बिल को पास कराने की चुनौती दी है।

यह संकेत है कि इस सत्र में भाजपा व कांग्रेस के बीच महिलाओं से जुड़े इस बिल सियासी संग्राम छिड़ेगा। हालांकि संसद स्वस्थ बहस करने और कानून बनाने के लिए है, लेकिन पिछले दो दशक से वह विपक्षी राजनीति का अखाड़ा बनी हुई है। यहां काम कम और हंगामा ज्यादा हो रहा है। इससे जनता का पैसा तो बर्बाद होता है, संसद की गरिमा भी गिर रही है।

विपक्ष का हर विधेयक में राजनीति करना व संसद को ठप करना दुर्भाग्यपूर्ण है। संसद सत्र के दौरान सत्तारूढ़ दल व सरकार का रुख भी लचीला होना चाहिए। यह चिंता की बात है कि संसद की कमजोरी के चलते आवाम का उच्चतम न्यायालय पर भरोसा बढ़ा है। लोकतंत्र के लिए यह दशा ठीक नहीं है। उम्मीद की जानी चाहिए,

मानसून सत्र में पक्ष और विपक्ष के बीच देश से जुड़े मुद्दों पर स्वस्थ बहस होगी और सभी लंबित बिल पास होंगे। सभी पार्टियों को समझना होगा कि संसद चलाना सबकी जिम्मेदारी है और उनके सांसद जनता के प्रति जवाबदेह हैं, वे संसद में केवल हंगामा करने व अवरोध पैदा करने के लिए चुनकर नहीं आते हैं। मानसून सत्र राजनीति का अखाड़ा नहीं बनना चाहिए।

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