Top
Hari bhoomi hindi news chhattisgarh

आलोक पुराणिक का लेख: हर जेब में पहुंचेगा पैसा

सरकार की मूल कोशिशें लघु उद्यमों को सहारा देने की है, उद्यमों और जनता की जेब में कुछ पैसा डालने की है। पैसा जब सिस्टम में घूमेगा तो अर्थचक्र रफ्तार पकड़ेगा। सरकार यह संदेश देने की कोशिश कर रही है, हम जितना पैसा तुम्हारी जेब में छोड़ सकते हैं, छोड़ रहे हैं, जाकर खर्च करो। खर्च बढ़ेगा तो अर्थव्यवस्था एक नई रफ्तार के साथ आगे जाएगी। गौरतलब यह है कि अभी और घोषणाएं आनी बाकी हैं। सरकार के तरकश में अभी कई तीर हैं।

पैसे से ऐसे कमाए पैसा, इन चीजों को ध्यान में रखकर ही करें इन्वेस्टपैसे से ऐसे कमाए पैसा, इन चीजों को ध्यान में रखकर ही करें इन्वेस्ट

केंद्रीय वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण और वित्त राज्यमंत्री अनुराग ठाकुर ने जो घोषणाएं की हैं, उनसे तीन बातें साफ हैं कि एक यह है कि आत्मनिर्भरता को अब अर्थव्यवस्था में केंद्रीय लक्ष्य के तौर पर चिन्हित किया जा रहा है। दूसरी बात, केंद्र सरकार लघु उद्यमों को बहुत गंभीरता से ले रही है और तीसरी बात यह है कि लघु उद्यमियों की जेब में, आम आदमी की जेब में कुछ रकम लगातार डालने के लिए सरकार लगातार चिंतित है। उद्यमियों की जेब में पैसे रहे, आम आदमी की जेब में पैसे रहे, तरलता रहे, मांग बनी रहेगी और मांग रहेगी तो बिक्री होगी और मुनाफे का सुचक्र घूमता रहेगा। मांग को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 12 मई ने अपने संबोधन में भी चिन्हित किया था, आत्मनिर्भरता के पांच आधारों के तौर पर।

आत्मनिर्भरता भारत के लिए इस अर्थ में खास है कि भारत के पास बड़ा बाजार भी है और बड़ी क्षमताएं भी हैं। पीएम मोदी ने साफ किया कि कोरोना आने से पहले भारत में कोरोना इलाज के लिए प्रयुक्त होने वाली पीपीई किट का कोई उत्पादन नहीं होता था अब कुछ हफ्तों बाद रोज दो लाख पीपीई किट के उत्पादन के साथ भारत दुनिया का नंबर दो देश है, पीपीई किट के मामले में। यह स्तर जनसंख्या के स्तर से आता है, जनसांख्यिकी के लिहाज से भारत एक सकारात्मक स्थिति में है।

तरलता रहे, जेब में पैसे रहें, इसलिए सरकार ने साफ किया कि 18000 करोड़ रुपये का आयकर रिफंड वापस किया लोगों की जेब में। सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग, कुटिर उद्योग और गृह उद्योग मिलकर 12 करोड़ से ज्यादा लोगों को रोजगार देते हैं। इनके लिए 3 लाख करोड़ रुपये का कोलैटरल फ्री यानी गिरवी-मुक्त कर्ज का प्रावधान किया गया है। किसी को अपनी ओर से किसी तरह की गारंटी देने की जरूरत नहीं है। इसकी समय सीमा भी चार वर्ष की होगी। सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों के लिए विभिन्न योजनाओं के लिए तीन लाख सत्तर हजार करोड़ रुपये का प्रावधान रहेगा। तीन लाख सत्तर हजार करोड़ रुपये की रकम खासी बड़ी रकम है, मोटे तौर पर माना जा सकता है कि कोरोना-पूर्व की आर्थिक स्थितियों में यह रकम तीन महीनों के औसत जीएसटी संग्रह से भी ज्यादा बैठती थी। कुल मिलाकर तौर पर यह माना जा सकता है कि छोटे उद्यमों के पहिये पैसे की कमी की वजह से नहीं रुकेंगे।

एक बहुत बड़ा फैसला सूक्ष्म, लघु और मध्यम की परिभाषा को लेकर लिया गया है। एक करोड़ रुपये तक निवेश करके 5 करोड़ तक का व्यापार करने वाले उद्यम अब सूक्ष्म कहलाएंगे। 10 करोड़ तक का निवेश और 50 करोड़ तक व्यापार करने वाले उद्यमों को लघु उद्यम माना जाएगा और 20 करोड़ तक का निवेश और 100 करोड़ रुपये तक का व्यापार करने वाले उद्यम मध्यम मंझोले माने जाएंगे। यानी निवेश सीमाओं में बढ़ोत्तरी की गयी है। देखा गया है कि लघु और सूक्ष्म उद्यम अपने को बढ़ाने में संकोच करते थे कि कहीं बड़े हो गए तो लघु उद्यमों वाली सुविधाएं खत्म न हो जाएं। नई परिभाषा के तहत यह सुनिश्चित किया जाएगा कि लघु उद्यम विकास में घबराएं नहीं और एक सीमा तक निसंकोच अपना विकास करते रहें। यानी कारोबारी अब विकास करते रह सकते हैं और सूक्ष्म, लघु और मंझोले उद्यमों को मिलने वाली छूट भी लेते रह सकते हैं। यह बहुत बड़ी नीतिगत घोषणा है। इसका असर कई सालों तक दिखाई देगा।

200 करोड़ रुपये तक की सरकारी खरीद में ग्लोबल टेंडर नहीं निकाले जाएंगे। यानी घरेलू उद्यमों को मौके मिलेंगे। सरकार को घरेलू कंपनियों से टेंडर मंगवाने की बाध्यता होगी। इससे लोकल के लिए वोकल के मंत्र को मजबूती मिलेगी। 12 मई को पीएम मोदी की घोषणाओं और 13 मई को वित्त मंत्रालय की घोषणाओं से यह साफ होता है कि सरकार अपने उद्यमों को हर कीमत पर मजबूती देने के लिए बहुत तेजी से प्रतिबद्ध हो रही है। बिजली वितरण कंपनियां की वित्तीय हालत सुधारने के लिए भी महत्वपूर्ण घोषणाएं इस पैकेज में हैं। गौरतलब है कि बिजली निर्माता कंपनियों की करीब 94000 करोड़ रुपये की उधारी बिजली वितरण कंपनियों पर है। सरकार ने फैसला किया है कि सरकारी संगठनों के जरिये तमाम बिजली वितरण कंपनियों को 90000 करोड़ रुपये दिए जाएंगे, राज्य सरकारों की गारंटी पर। इससे बिजली वितरण कंपनियां अपनी उधारी चुकाएं और बिजली निर्माता कंपनियों को भी अपनी रकम वापस मिल सके। कुल मिलाकर तरलता प्रबंधन की यह महत्वपूर्ण कोशिश है। सिस्टम में रकम आए, खर्च हो।

करीब 72 लाख कर्मियों के लिए भविष्य निधि में योगदान को 12 प्रतिशत से घटाकर 10 प्रतिशत किया गया है तीन महीनों के लिए, इससे उनके हाथ में 6750 करोड़ रुपये की अतिरिक्त तरलता पहुंचेगी। तर्क साफ है कि बंदे की जेब में पैसे होंगे तो कुछ खर्च करेगा, खर्च करेगा तो बाजार में मांग पैदा होगी और बिक्री और लाभ का सुचक्र अर्थव्यवस्था में चलेगा।

स्त्रोत पर ही कर काटने की नीति में बदलाव किया गया है। स्त्रोत पर कर में 25 प्रतिशत की कमी की घोषणा की गई है। जैसे कोई किसी को फीस मिलती है एक लाख रुपये की और उस पर स्त्रोत पर कटता है दस प्रतिशत यानी 10000 रुपये कटता है अब यह 7500 रुपये कटेगा। आकलन है कि इस तरह की कमी से 50000 करोड़ रुपये की अतिरिक्त तरलता व्यवस्था में आएगी और खर्च और मांग में तेजी आएगी और अर्थव्यवस्था के पहिये ज्यादा तेजी से घूमेंगे।

सूक्ष्म, लघु और मंझोले उद्यमों का बकाया भुगतान केंद्र सरकार और केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों द्वारा 45 दिनों में किया जाएगा। व्यवस्था में तरलता आए, लोगों की जेब में, उद्यमों की जेब में पैसे आएं, यह कोशिश सरकार लगातार करती दिखती है।

कुल मिलाकर सरकार की मूल कोशिशें लघु उद्यमों को सहारा देने की है और उद्यमों और जनता की जेब में कुछ पैसा डालने की है। पैसा जब सिस्टम में घूमेगा, तो अर्थचक्र रफ्तार पकड़ेगा। यही आवश्यक है। इस समय छोटे उद्यमी को सहारा देने की जरुरत है। आम आदमी की जेब में कुछ अतिरिक्त रकम डालने की जरुरत है। क्योंकि कोरोना ने मानसिक स्तर पर एक खौफ का माहौल बना दिया है। लोग डरे हुए हैं। डरे हुए आदमी अपनी जेब का पैसा सहेज कर रखते हैं, खर्च नहीं करते। खर्च अवरुद्ध हो जाए तो अर्थव्यवस्था अवरुद्ध हो जाती है। सरकार यह संदेश देने की कोशिश कर रही है, हम जितना पैसा तुम्हारी जेब में छोड़ सकते हैं, छोड़ रहे हैं, जाकर खर्च करो। खर्च बढ़ेगा तो अर्थव्यवस्था एक नई रफ्तार के साथ आगे जाएगी। गौरतलब यह है कि अभी और घोषणाएं आनी बाकी हैं। यानी सरकार के तरकश में अभी कई तीर बाकी हैं।

Next Story
Top