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आतंक पर भारी पड़ेगी मोदी-ट्रंप की शिखर वार्ता

ऐसे ही संकल्प जॉर्ज बुश और बराक ओबामा के कार्यकाल में भी लिए गए थे।

आतंक पर भारी पड़ेगी मोदी-ट्रंप की शिखर वार्ता
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भारत और अमेरिका ने एक बार फिर आतंकवाद के खात्मे के लिए मिलकर काम करने का संकल्प दोहराया है। ऐसे ही संकल्प जॉर्ज बुश और बराक ओबामा के कार्यकाल में भी लिए गए थे। अब डोनाल्ड ट्रंप का शासन है।

अमेरिका ने इसके प्रति फिर से प्रतिबद्धता जाहिर की है, परंतु इस बार एक अंतर है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ शिखर वार्ता के बाद साझे पत्रकार सम्मेलन में कहा गया है कि आतंकी ठिकानों को ध्वस्त किया जाएगा।

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हालांकि फिलहाल पाकिस्तान से कहा गया है कि वह अपनी जमीन का इस्तेमाल आतंकियों को नहीं करने दे। कुछ ही दिन पहले अमेरिका ने घोषणा की थी कि जरूरत पड़ी तो वह पाकिस्तान में उन ठिकानों पर अटैक करेगा,

जहां आतंकवादी शरण पाए हुए हैं। प्रधानमंत्री मोदी के अमेरिका पहुंचने के कुछ ही समय बाद अमेरिका के विदेश मंत्रालय द्वारा शेख सलाहुद्दीन को वैश्विक आतंकवादी घोषित करने से जाहिर है कि डोनाल्ड ट्रंप शासन भारत की चिंताओं को समझ रहा है।

फोन पर भले ही तीन बार दोनों नेताओं की वार्ता हो चुकी थीं, आमने-सामने ये दोनों पहली बार मिल रहे थे। दुनिया की निगाहें इस पर टिकी थीं कि दोनों की शारीरिक भाषा कैसी रहती है। गर्मजोशी कितनी दिखेगी।

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जितनी बराक ओबामा के जमाने में थी, उतनी या कम-ज्यादा। समीक्षकों को निराशा नहीं हुई। शुरू में ट्रंप थोड़े संकोच में दिखे। मोदी एकदम बेबाक और जोश से भरपूर।

शिखर वार्ता के बाद दोनों प्रेस के सामने आए तो ट्रंप भी मोदी के साथ खुश और सहज दिखाई दिए। यह प्रधानमंत्री मोदी की खूबी है कि वह जल्दी ही राष्ट्रप्रमुखों के साथ बहुत बेहतर संवाद और विश्वास के रिश्ते कायम कर लेते हैं।

प्रेस कान्फ्रेंस के बाद दोनों नेता जिस तरह गले मिले, उससे साफ है कि भारत का भरोसे का रिश्ता उसी तरह आगे बढ़ने वाला है, जैसा ओबामा के समय था। बहुत से क्षेत्रों में दोनों ने तेज गति से आगे बढ़ने का ऐलान किया है।

अगले महीने हिंद महासागर में भारत, अमेरिका और जापान की नौसेना का संयुक्त अभ्यास होने वाला है, जिसकी जानकारी खुद ट्रंप ने पत्रकारों को दी। दक्षिण चीन सागर और पूर्वी एशिया में जिस तरह का माहौल बना हुआ है, उसमें यह संयुक्त युद्धाभ्यास बेहद महत्वपूर्ण है।

कुछ ही दिन पहले चीन की तरफ से एक बयान जारी कर कहा गया था कि इस तरह की कार्रवाई से इस क्षेत्र में तनाव बढ़ सकता है। दरअसल, चीन भारत, अमेरिका और जापान की परस्पर निकटता और कई क्षेत्रों में सहयोग से कहीं न कहीं भयभीत है।

जिस समय प्रधानमंत्री वाशिंगटन में थे और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से पहली बार मिलने की तैयारी कर रहे थे, ठीक उसी समय दो सूचनाएं आईं। नाथूला दर्रे से होकर मानसरोवर तक जाने वाली भारतीय तीर्थयात्रियों को चीन ने रोक दिया और सिक्किम की सरहद पर उसके कुछ सैनिकों ने तीन भारतीय बंकरों को ध्वस्त कर दिया।

यह घटनाएं चीन की बौखलाहट को दर्शाती हैं। उसकी ओर से धमकी भी दी गई है कि सिक्किम की सरहद से फौज नहीं हटाई गई तो वह मानसरोवर यात्रा को आगे नहीं बढ़ने देगा।

इससे पता चलता है कि चीन भारत-अमेरिका सहयोग से किस हद तक बौखला गया है। एक और घटना हुई है। ईरान के धार्मिक नेता अयातुल्ला अली खामेनेई ने कश्मीर की तुलना बहरीन और यमन से करते हुए भारत को दमनकारी बताने की हिमाकत की है और सभी मुस्लिम देशों से कहा है कि वह कश्मीर में भारत की कार्रवाई का विरोध करें।

सब जानते हैं कि अमेरिका ईरान पर कई तरह के प्रतिबंध लगा चुका है। इसके बावजूद पुराने संबंधों का लिहाज करते हुए भारत ने हमेशा ईरान का साथ दिया है, परंतु खमेनेई ने जिस तरह का बयान जारी किया है, वह उनकी बौखलाहट का परिचय देता है।

जाहिर है, नई दिल्ली ईरान के इस बयान को स्वीकार व बर्दाश्त नहीं करेगा। मोदी और ट्रंप की मुलाकात का सबसे बड़ा हासिल क्या रहा है, यह कुछ दिन या कुछ महीने बाद सामने आएगा,

जब अमेरिका बड़े पैमाने पर पाक में वैसी ही कार्रवाई को अंजाम देगा, जैसी उसने अफगानिस्तान में पिछले दिनों मदर ऑफ आल बम गिराकर की थी। इसके वह स्पष्ट संकेत दे चुका है।

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