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प्रमोद भार्गव का लेख : मोदी का यूएन को कड़ा संदेश

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्रसंघ महासभा की 76वीं वर्षगांठ के अवसर पर अमेरिका की धरती से जितनी आक्रामकता से यूएन को उसी के मंच से फटकार लगाई है, उतनी बेवाकी से अन्य कोई राष्ट्र प्रमुख नहीं लगा पाया है। संयुक्त राष्ट्र की उम्र 76 वर्ष हो चुकने के बावजूद इसके मानव कल्याण से जुड़े लक्ष्य अधूरे हैं। इसकी निष्पक्षता संदिग्ध है, इसीलिए वैश्विक परिदृश्य में संयुक्त राष्ट्र शांति स्थापित करने और आतंकी संगठनों पर लगाम लगाने में नाकाम रहा है। संयुक्त राष्ट्र को खुद को प्रासंगिक बनाए रखना है तो उसे अपना प्रभाव दिखाना होगा। विश्वसनीयता को बढ़ाना होगा।

प्रमोद भार्गव का लेख : मोदी का यूएन को कड़ा संदेश
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प्रमोद भार्गव 

प्रमोद भार्गव

संयुक्त राष्ट्रसंघ महासभा की 76वीं वर्षगांठ के अवसर पर अमेरिका की धरती से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि यदि संयुक्त राष्ट्र को खुद को प्रासंगिक बनाए रखना है तो उसे अपना प्रभाव दिखाना होगा। विश्वसनीयता को बढ़ाना होगा। आज यूएन पर कई तरह के सवाल उठ रहे हैं। अफगानिस्तान पर संकट, दुनिया पर चल रहे प्रॉक्सी वार और कोरोना वायरस की उत्पत्ति ने इन सवालों को गहरा दिया है। मोदी ने उन देशों को भी नाम लिए बिना चेतावनी दी कि जो देश आतंकवाद को बतौर हथियार इस्तेमाल कर रहे हैं। साफ है, भारतीय प्रधानमंत्री ने जितनी आक्रामकता से यूएन को उसी के मंच से फटकार लगाई है, उतनी बेवाकी से अन्य कोई राष्ट्र प्रमुख नहीं लगा पाया है।

भारत जैसे देश को संयुक्त राष्ट्र की स्थायी सदस्यता से बाहर रखते हुए इस संस्था ने जता दिया है कि वहां चंद अलोकतांत्रिक या तानाशाह की भूमिका में आ चुके देशों की ही तूती बोलती है। संयुक्त राष्ट्र की उम्र 76 वर्ष हो चुकने के बावजूद इसके मानव कल्याण से जुड़े लक्ष्य अधूरे हैं। इसकी निष्पक्षता संदिग्ध है, इसीलिए वैश्विक परिदृश्य में संयुक्त राष्ट्र शांति स्थापित करने और आतंकी संगठनों पर लगाम लगाने में नाकाम रहा है। अब तो आतंकवादी संगठन तालिबान ने पूरे अफगानिस्तान पर कब्जा लिया है। अत: अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन को समझने की जरूरत है कि तालिबान को सही रास्ते पर लाने में कामयाबी तब मिलेगी, जब पाकिस्तान को नियंत्रित किया जाएगा। पाक की मदद से तालिबान अफगानिस्तान पर कब्जा किया है। चीन की विस्तारवादी महत्वाकांक्षाओं पर भी अंकुश नहीं लग पा रहा है।

दूसरे विश्व युद्ध के बाद शांतिप्रिय देशों के संगठन के रूप में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का गठन हुआ था। इसका अहम्ा मकसद भविष्य की पीढ़ियों को युद्ध की विभीषिका और आतंकवाद से सुरक्षित रखना था। इसके सदस्य देशों में अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस और चीन को स्थायी सदस्यता प्राप्त है। याद रहे चीन जवाहरलाल नेहरू की अनुकंपा से ही सुरक्षा परिषद का सदस्य बना था, जबकि उस समय अमेरिका ने सुझाया था कि चीन को संयुक्त राष्ट्र में लिया जाए और भारत को सुरक्षा परिषद की सदस्यता दी जाए, लेकिन अपने उद्देश्य में परिषद को पूर्णतः सफलता नहीं मिली। भारत का दो बार पाकिस्तान और एक बार चीन से युद्ध हो चुका है। इराक और अफगानिस्तान, अमेरिका और रूस के जबरन दखल के चलते युद्ध की ऐसी विभीषिका के शिकार हुए कि आज तक उबर नहीं पाए हैं। तालिबान की आमद के बाद अफगानिस्तान में किस बेरहमी से विरोधियों और स्त्रियों को दंडित किया जा रहा है, यह किसी से छिपा नहीं रह गया है। इजराइल और फिलीस्तीन के बीच युद्ध एक नहीं टूटने वाली कड़ी बन गया है। अनेक इस्लामिक देश गृह-कलह से जूझ रहे हैं। उत्तर कोरिया और पाकिस्तान बेखौफ परमाणु युद्ध की धमकी देते रहते हैं। दुनिया में फैल चुके इस्लामिक आतंकवाद पर अंकुश नहीं लग पा रहा है। भारत विश्व में शांति स्थापित करने के अभियानों में मुख्य भूमिका निभाता रहा है। इसके बावजूद दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाला देश सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य नहीं है। साफ है, संयुक्त राष्ट्र की कार्य-संस्कृति निष्पक्ष नहीं है। कोरोना महामारी के दौर में विश्व स्वास्थ्य संगठन की मानवतावादी केंद्रीय भूमिका दिखनी चाहिए थी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अलबत्ता सुरक्षा परिषद की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है, क्योंकि उसके एजेंडे में प्रतिबंध लगाने और संघर्ष की स्थिति में सैनिक कार्रवाई की अनुमति देने के अधिकार शामिल हैं। इस नाते उसकी मूल कार्यपद्धति में शक्ति-संतुलन बनाए रखने की भावना अंतनिर्हित है, लेकिन वह इन प्रतिबद्धताओं को नजरअंदाज कर रहा है। नतीजतन इसमें सुधार की जरूरत महसूस की जा रही है।

1945 में परिषद के अस्तित्व में आने से लेकर अब तक दुनिया बड़े परिवर्तनों की वाहक बन चुकी है, इसीलिए भारत लंबे समय से परिषद के पुनर्गठन का प्रश्न बैठकों में उठाता रहा है। स्थायी व वीटोधारी देशों में अमेरिका, रूस और ब्रिटेन भी मौखिक समर्थन इस प्रश्न के पक्ष में देते रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र के 193 सदस्य देशों में से दो तिहाई से अधिक देशों ने सुधार और विस्तार के लिखित प्रस्ताव को मंजूरी 2015 में दे दी है। इस मंजूरी के चलते अब यह प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्र के एजेंडे का अहम मुद्दा बन गया है। नतीजतन अब यह मसला एक तो परिषद में सुधार की मांग करने वाले भारत जैसे चंद देशों का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि महासभा के सदस्य देशों की सामूहिक कार्यसूची का प्रश्न बन गया है। अमेरिका ने शायद इसी पुनर्गठन के मुद्दे का ध्यान रखते हुए सुरक्षा परिषद में नई पहल करने के संकेत दिए हैं। यदि पुनर्गठन होता है तो सुरक्षा परिषद के प्रतिनिधित्व को समतामूलक बनाए जाने की उम्मीद बढ़ जाएगी। इस मकसद पूर्ति के लिए परिषद के सदस्य देशों में से नए स्थायी सदस्य देशों की संख्या बढ़ानी होगी। यह संख्या बढ़ती है तो परिषद की असमानता दूर होने के साथ कार्य-संस्कृति में लोकतांत्रिक संभावनाएं स्वतः बढ़ जाएंगी।

परिषद की महासभा में इन प्रस्तावों का शामिल होना, बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि तो थी, लेकिन परिणाम भारत और इसमें बदलाव की अपेक्षा रखने वाले देशों के पक्ष में आएंगे हीे, इसमें संदेह है। स्थायी सदस्यों की संख्या बढ़ाने से जुड़े मामलों पर लंबी चर्चा होगी। इस सभा में बहुमत से पारित होने वाली सहमतियों के आधार पर 'अंतिम अभिलेख' की रूपरेखा तैयार होगी, किंतु यह जरूरी नहीं कि यह अभिलेख किसी देश की इच्छाओं के अनुरूप ही हो, क्योंकि इसमें बहुमत से लाए गए प्रस्तावों को खारिज करने का अधिकार पी-5 देशों को है। ये देश किसी प्रस्ताव को खारिज कर देते हैं तो यथास्थिति और टकराव बरकरार रहेंगे। हालांकि भारत न केवल सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता की हैसियत रखता है, बल्कि वीटो-शक्ति हासिल करने की पात्रता भी है, क्योंकि वह दुनिया का सबसे बड़ा धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक देश है।

संयुक्त राष्ट्र के नेतृत्व में विश्व स्वास्थ्य संगठन, अंतरराष्ट्रीय न्यायालय, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष यूनिसेफ और शांति सेना जैसे संगठन काम करते हैं, लेकिन चंद देशों की ताकत के आगे ये नतमस्तक होते दिखाई देते हैं, इसीलिए शांति सेना की विश्व में बढ़ते सैनिक संघर्षों के बीच कोई निर्णायक भूमिका दिखाई नहीं दे रही है। संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक और सामाजिक संगठन जी-20, जी-8, आसियान और ओपेक जैसे संगठन विभाजित दुनिया के क्रम में लाचारी अनुभव कर रहे हैं। तालिबानी कब्जे के बाद अफगान में शरणर्थियों की संख्या निरंतर बढ़ रही है। इस समय पूरी दुनिया में 8.24 करोड़ लोग विस्थापितों के रूप में शरणार्थी शिविरों में बदतर जिंदगी जी रहे हैं। अमेरिका व अन्य यूरोपीय देशों द्वारा इन्हें दी जाने वाली आर्थिक मदद में कटौती कर दिए जाने के कारण भी इनका भविष्य संकट में है। इन सब खतरों के चलते इस वैश्विक मंच की विश्वसनीयता संकट में है, लिहाजा इसमें पर्याप्त सुधारों की तत्काल जरूरत है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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