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मोदी की इंडोनेशिया यात्रा: आखिर क्यों है मुस्लिम आबादी वाले देश में हिंदू धर्म का बोलबाला ?

भारत और इंडोनेशिया के मध्य सहयोग का ठोस आधार है दोनों देशों के बीच दो हजार साल पुराने ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक सम्बन्ध। इंडोनेशिया की भाषा, संस्कृति, धर्म, कला व पारिवारिक मूल्यों पर भारतीय संस्कृति की गहरी छाप है। रामायण और महाभारत आज भी यहां उतने ही लोकप्रिय है जितने की भारत में।

मोदी की इंडोनेशिया यात्रा: आखिर क्यों है मुस्लिम आबादी वाले देश में हिंदू धर्म का बोलबाला ?
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अमेरिका अपनी वैश्विक जिम्मेदारियों एवं समझौतों से पीछे हट रहा है और चीन हिंद-प्रशांत क्षेत्र के देशों के साथ कनेक्टिविटी बढ़ाने के नाम पर उन्हें कर्जदार बनाकर अपने प्रभाव में समेटने की कोशिश में लगा है। चीन द्वारा विवादित दक्षिण चीन सागर में मिसाइलों की तैनाती और वायु सैन्य अड्डे स्थापित करने की खबरें क्षेत्र में असुरक्षा और अस्थिरता को हवा दे रही है। ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इंडोनेशिया यात्रा संबंधों को प्रगाढ़ करने के साथ-साथ सुरक्षा की दृष्टि से भी अहम है।

शीत युद्ध के अंत के बाद से ही लुक ईस्ट पाॅलिसी के तहत आसियान देशों के साथ साझेदारी भारतीय विदेश नीति का अहम हिस्सा रहा है। सत्ता में आने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे एक्ट ईस्ट पाॅलिसी का नाम देकर भारत, आसियान सामरिक संबधों में नवीन उर्जा लाने की पहल की है। इसी कडी में वे 29 मई से पांच दिवसीय यात्रा पर इंडोनेशिया व सिंगापुर जा रहे हैं। प्रधानमंत्री के रूप में इंडोनेशिया की उनकी यह पहली यात्रा है जबकी सिंगापुर वे पहले भी दो बार जा चुके हैं।

भारत और इंडोनेशिया के बीच ऐसी कई समानताएं एवं साझा हित हैं जो दोनों देशों को नजदीक लाने का काम करते हैं। भौगोलिक रुप से इंडोनेशिया हमारा निकटतम सामुद्रिक पड़ोसी है। निकोबार द्वीपसमूह का दक्षिणी छोर इंडोनेशिया के सुमात्रा द्वीप के उत्तरी छोर से महज 70 मील की दूरी पर है। मलक्का जलडमरू मध्य जो कि प्रशांत महासागर को हिंद महासागर से जोड़ने का काम करता है।

इंडोनेशिया की भू-सामरिक स्थिति भारत के लिए बहुत खास हैं क्योंकि हमारेे कुल व्यापार का 55 फीसदी हिस्सा इसी सामुद्रिक मार्ग से ही गुजरता है। यही नहीं सखालीन से तेल की आपूर्ति के अलावा भारत के नौसेनिक पोत नियमित आवाजाही करते है। इन अंतरराष्ट्रीय सामुद्रिक मार्गांे की सुरक्षा और नौवहन की स्वतंत्रता का प्रश्न भारत और इंडोनेशिया दोनों को समान रूप से प्रभावित करता है।

मोदी की इस यात्रा के दौरान द्विपक्षीय सुरक्षा एवं सामुद्रिक संबंधो को बदलते क्षेत्रीय भू-सामरिक समीकरणों के अनुरूप मजबूती देने का प्रयास किया जाएगा। संयुक्त नौसैनिक युद्याभ्यास, रक्षा उपकरणों के संयुक्त उत्पादन उपक्रम एवं ज्वाइंट पेटोलिगं जैसे मुद्दों पर आपसी समझ एवं सहयोग को सुदृढ करने पर विचार किया जा सकता है। इसके अलावा सुमात्रा के सबांग तक भारत की नावल पहुंच पर भी विचार करने की संभावनाएं हैं।

अडंमान और निकोबार संयुक्त कमांड के एक महत्वपूर्ण सामरिक प्लेटफाॅर्म के रुप में उदय के कारण इंडोनेशिया से साझेदारी बढ़ाना भारत की प्राथमिकता बन गई है, वहीं इंडोनेशिया भी अपनी सैन्य क्षमता बढाने के लिए भारत का सहयोग पाने की मंशा रखता है, खासकर नौसैनिक जहाजों के कलपुर्जे व मरम्मत के लिए भारत का सहयोग बेजोड़ है।

इसके अलावा क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव से उत्पन्न चुनातियों ने भी दोनों देशों को एक व्यापक सामरिक साझेदारी विकसित करने की दिशा में सोचने को मजबूर कर दिया है ताकि हिंद महासागर व मल्लका जलडमरु मध्य को बाहरी ताकतों के अवांछित दखल से मुक्त रखा जा सके। जिस रफ्तार से चीन अपनी सैन्य और आर्थिक शक्ति के सहारे हिंद-प्रशांत क्षेत्र में एकपक्षीय वर्चस्व स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है यह न केवल दक्षिण-पूर्वी एशिया के तटवर्ती देशों बल्कि भारत के लिए भी चिंता का विषय है।

रक्षा एवं सामद्रिक सुरक्षा के अलावा व्यापार एवं निवेश के क्षेत्र में भी भारत और इंडोनेशिया के मध्य सहयोग की अपार संभावनाएं है। लगभग एक खरब डाॅलर के सकल घरेलू उत्पादन के साथ इंडोनेशिया दक्षिण-पूर्वी एशिया की सबसे बड़ी एवं तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है तथा आसियान में भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। दोनों देशों के मध्य मौजूदा व्यापार 18 अरब डाॅलर का आंकड़ा पार कर चुका है।

वस्तुओं एवं सेवा क्षेत्र में भारत-आसियान मुक्त व्यापार समझौता लागू होने के बाद से पारस्परिक व्यापार एवं निवेश में वृद्धि की संभावनाएं और बढ गई हैं। लेकिन व्यापार घाटे को पाटना एवं एफडीआई आकर्षित करना अभी भी भारत के लिए चुनौती बना हुआ है। भारत दुनिया की चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था है, वहीं इंडोनेशिया का लक्ष्य 2045 तक यह मुकाम हासिल कर लेना है।

आधारभूत ढांचे का विकास, विदेशी निवेश में वृद्धि एवं विनिर्माण क्षेत्र को बढ़ाना दोनों देशों के लिए समान जरूरत है इसलिए आपसी सहयोग के साथसाथ प्रतिस्पर्धा भी है। व्यापार के साथ-साथ उर्जा क्षेत्र में भी दोनों देश महत्वपूर्ण साझेदारी रखते हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था को उंची विकास दर हासिल करने के लिए उर्जा की सख्त जरुरत है और इंडोनेशिया भारत के लिए फायदेमन्द हो सकता है, जिसके पास कोयले, तेल और गैस के अकूत भंडार हैं।

आज भी भारत में कोयले का एक बड़ा हिस्सा इंडोनेशिया से आता है। वहीं इंडोनेशिया के लिए भी पेट्रोलियम उत्यादों एवं खनन क्षेत्र में भारत की विशेषज्ञता लाभ का सौदा है। पारस्परिक हितों एवं जरूरतों के अलावा भारत और इंडोनेशिया के मध्य सहयोग का ठोस आधार है दोनों देशों के बीच दो हजार साल पुराने ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक सम्बन्ध। इंडोनेशिया की भाषा, संस्कृति, धर्म, कला व पारिवारिक मूल्यों पर भारतीय संस्कृति की गहरी छाप है।

रामायण और महाभारत आज भी यहां उतने ही लोकप्रिय है जितने की भारत में। वर्तमान में लगभग एक लाख भारतवंशी एवं सात हजार से अधिक अप्रवासी भारतीय यहां रहते हैं। सालों से अपने मूल वतन से दूर रहकर भी यहां बसे प्रवासी भारतीयो ने न केवल अपने सांस्कृतिक मूल्यों को जीवित रखा है बल्कि अपनी मेहनत और लगन से यहां की राजनीति और व्यापार-व्यवसाय में मुकाम भी हासिल किया है।

भारत की सकारात्मक छवि पेश कर दक्षिण पूर्व एशियाई लोगों का समर्थन जुटाने और भारत-आसियान संबंधों को प्रगाढ़ करने में इन प्रवासियों की क्षमताओं को भुनाने की अपार संभावनाएं हैं। इसी साल 6-7 जनवरी को सिंगापुर में आसियान-भारत क्षेत्रीय प्रवासी भारतीय सम्मेलन इस कड़ी में किया गया एक अहम प्रयास था, मौजूदा हाल में जहां वैश्विक राजनीति अटकलों और अनिश्चतताओं के दौर से गुजर रही है,

अमेरिका अपनी वैश्विक जिम्मेदारियों एवं समक्षौतों से पीछे हट रहा है और शी जिनपिंग के अधीन चीन सामूहिक नेतृत्व से एकल अधिनायकवाद की ओर बढ़ रहा है तथा अपने महत्वाकांक्षी बेल्ट एंड रोड इनीशियटिव के जरिए वह हिंद-प्रशांत क्षेत्र के देशों के साथ कनेक्टिविटी बढ़ाने के नाम पर उन्हें कर्जदार बनाकर अपने प्रभाव में समेटने की कोशिश कर रहा है।

विवादित दक्षिण चीन सागर में चीन द्वारा मिसाइलों की तैनाती और वायु सैन्य अड्डे स्थापित करने की खबरें क्षेत्र में असुरक्षा और अस्थिरता को हवा दे रही है। ऐसे हालात में हिंद-प्रशांत में शक्ति-संतुलन बनाए रखने तथा संवेदनशील सामुद्रिक मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए समान हितों वाले देशों के साथ मिलकर सहयोग बढ़ाने की भारत की रणनीति क्या होगी इसी विषय पर बोलने के लिए प्रधानमंत्री को सिंगापुर में आयोजित हो रहे शांगरीला-डायलाॅग में आमंत्रित किया गया है।

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