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मोदी सरकार की आतंकवाद पर नकेल, वोटबैंक से जोड़कर ना देखें राजनीतिक दल

एनआईए विधेयक पर बहस के दौरान भी कई राजनीतिक दलों ने ऐसे ही सवाल उठाए तो गृहमंत्री अमित शाह ने स्पष्ट करते हुए कहा कि सरकार की एनआईए कानून के दुरुपयोग की मंशा नहीं है।

मोदी सरकार की आतंकवाद पर नकेल, वोटबैंक से जोड़कर ना देखें राजनीतिक दल
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Modi Government Strong Action Against Terrorism

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार आतंकवाद पर काफी हद तक नकेल कसने में कामयाब रही है। सरकार की सख्ती का ही परिणाम है कि आतंकी कोई बड़ी वारदात करने में कामयाब नहीं हो पाए। जिसके चलते दहशतगर्दों के आकाओं में बौखलाहट का माहौल है। इसी बौखलाहट का नतीजा था कि वे पठानकोट, उरी और पुलवामा जैसे हमले करके खुद की मौजूदगी का अहसास करवाने के प्रयास करते रहे हैं। मोदी सरकार के कड़े सुरक्षा प्रबंधनों के कारण ही आतंकवाद घाटी के केवल दो जिलों तक ही सिमटकर रह गया है, लेकिन अभी भी बहुत कुछ किया जाना शेष है ताकि इस नासूर का समूल नाश किया जा सके।

इसके लिए सरकार ने लोकसभा में राष्ट्रीय जांच एजेंसी विधेयक (एनआईए विधेयक) रखा, जिसके पक्ष में 278 और विरोध में मात्र 6 वोट पड़ने से पारित कर दिया गया। इस विधेयक में एनआईए को शक्तिशाली बनाने का प्रयास है। यह विधेयक राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण संशोधन विधेयक 2019 उपबंध करता है कि अधिनियम की धारा 1 की उपधारा 2 में नया खंड ऐसे व्यक्तियों पर अधिनियम के उपबंध लागू करने के लिए है जो भारत के बाहर भारतीय नागरिकों के विरुद्ध या भारत के हितों को प्रभावित करने वाला कोई अनुसूचित अपराध करते हैं।

इससे साफ है कि अब एनआईए आतंकवाद से जुड़े किसी भी मामले में दुनिया में किसी भी हिस्से में जांच कर सकेगी। इसके अलावा जजों का ट्रांसफर या प्रमोशन हो जाने पर एनआईए से जुड़े मामले प्रभावित नहीं होंगे। पहले इसके लिए दोबारा से अधिसूचना जारी करनी पड़ती थी, जिसमें दो से तीन माह का समय बर्बाद हो जाता था। इसके अलावा जांच एजेंसी को मानव तस्करी और साइबर अपराध से जुड़े विषयों की जांच का अधिकार भी दिया गया है। यह बेहतर कदम कहा जा सकता है।

क्योंकि 21वीं सदी के तकनीकी युग में आतंकी आधुनिक तकनीक से युवाओं को भ्रमित करके अपने साथ जोड़ने की कोशिशों में जुटे हैं। बीते दिनों एसई से जुड़े कई संदेश पकड़े भी गए थे। अब ऐसे मामलों की जांच के लिए एनआईए को किसी से इजाजत की जरूरत नहीं होगी। इसमें शक की कोई गुंजाइश नहीं है कि सरकार आतंकवाद के खिलाफ कड़े से कड़े कदम उठाने में लगी हुई है, उसके सार्थक नतीजे भी सामने आ रहे हैं, लेकिन कुछ विपक्षी दल सरकार के इन प्रयासों में भी अपनी राजनीति रोटियां सेकने की कोशिशों में लगे हैं।

वे इस विधेयक को मजहब विशेष के साथ जोड़कर उसे अपना वोटबैंक बनाने के प्रयास में हैं। हैरत की बात है कि जब दिसम्बर, 2008 में भारतीय लोकसभा में राष्ट्रीय जांच एजेंसी विधेयक (एनआईए विधेयक) विधेयक पारित हुआ था तभी जांच एजेंसी को यह अधिकार देने की बात की गई थी। यूपीए सरकार ने वोट बैंक नाराज होने के डर से अपने कदम पीछे खींच लिए। अब जब नरेंद्र मोदी सरकार राष्ट्रहित में ऐसा कर रही है तो कुछ दल इस पर राजनीति विरोध में जुटे हैं।

ऐसा ही आतंक के खिलाफ पोटा कानून के साथ हुआ था। केंद्र में अटलबिहारी वाजपेयी सरकार द्वारा पोटा कानून लागू करवाया था, लेकिन इस कानून को 2004 में यूपीए सरकार की कैबिनेट की पहली बैठक में ही राजनीतिक मकसद से हटा दिया गया। दलील यह दी गई कि इस कानून से एक समुदाय विशेष को नुकसान हो रहा है। जबकि सच्चाई यह थी कि पोटा के तहत तमिल आतंकियों के खिलाफ भी कार्रवाई की गई थी। वोटबैंक की राजनीति के चलते आतंक के खिलाफ धारदार हथियार को कुंद ही नहीं बल्कि नष्ट कर दिया गया।

एनआईए विधेयक पर बहस के दौरान भी कई राजनीतिक दलों ने ऐसे ही सवाल उठाए तो गृहमंत्री अमित शाह ने स्पष्ट करते हुए कहा कि सरकार की एनआईए कानून के दुरुपयोग की मंशा नहीं है। मगर आतंक को खत्म करते वक्त हम यह नहीं देखेंगे कि यह किस धर्म के व्यक्ति ने किया है, होना भी ऐसा ही चाहिए। आतंकवाद का कोई धर्म, मजहब नहीं होता। अगर इसमें वोट बैंक देखेंगे तो राष्ट्र गर्त में चला जाएगा।

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