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मोदी सरकार अनुसूचित जातियों-जनजातियों के लिए खलनायक!

भारत की वर्तमान दशा किसी भी विवेकशील व्यक्ति को भयभीत कर सकती है। अप्रैल से अब तक चार बार भारत बंद हो गया। तीन पूरी तरह गैर दलीय बंद रहे हैं और तीनों की जड़ एक ही जगह सन्निहित थी। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण कानून।

मोदी सरकार अनुसूचित जातियों-जनजातियों के लिए खलनायक!

भारत की वर्तमान दशा किसी भी विवेकशील व्यक्ति को भयभीत कर सकती है। अप्रैल से अब तक चार बार भारत बंद हो गया। तीन पूरी तरह गैर दलीय बंद रहे हैं और तीनों की जड़ एक ही जगह सन्निहित थी। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण कानून। पहला बंद 2 अप्रैल को दलितों के नाम पर बुलाया गया था। वह कितना हिसंक और बंद कराने वालों का रवैया कितना डरावना था, यह हम सबने देखा।

10 अप्रैल को केवल सोशल मीडिया पर आह्वान मात्र से बंद हो गया। उसके बाद 6 सितंबर का बंद। पहला उच्चतम न्यायालय द्वारा अनुसूचित जाति, जनजाति निवारण कानून में प्राथमिकी, गिरफ्तारी तथा जमानत के प्रावधान में लाए गए बदलाव के विरुद्ध था। उच्चतम न्यायालय के विरुद्ध भारत में शायद यह पहला बंद आयोजित हुआ।

अब 10 सितंबर का भारत बंद कांग्रेस की ओर से हुआ और यह पेट्रॉल-डीजल तथा रसोई गैस के मूल्यों में वृद्धि के खिलाफ है। यह बंद सामान्य तौर पर भयभीत करने वाला नहीं माना जा सकती। िकंतु समय अवश्य चिंताजनक है, क्योंकि देश में सबसे ज्यादा लंबे समय तक शासन करने वाली पार्टी को यह समझना चाहिए था कि इस समय पैदा हो रहे सामाजिक तनाव को कम करने के लिए हरसंभव यत्न करने की आवश्यकता है।

वास्तव में ये दोनों स्थितियां भयभीत करने वाली हैं। जिनको 1990 याद हो उनके अंदर अवश्य सिहरन पैदा हो रही होगी। विश्वनाथ प्रताप सिंह सरकार द्वारा मंडल आयोग की सिफारिशें लागू करने के बाद पूरा देश हिंसा में जल उठा था। विश्वनाथ प्रताप सिंह पिछड़ों का परित्राता के रुप में इतिहास पुरुष बनकर अमर होने का ख्वाब पाले हुए थे। जब हिंसा होने लगी, युवा आत्मदाह करने लगे तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई।

यह मायने नहीं रखता कि उसके बाद राजा मांडा की राजनीति में कोई हैसियत नहीं रही। उस दौर से बाहर निकलने में देश को दो दशक से ज्यादा लग गए। देश विखंडित राजनीति और बहुमतविहीन संसद एवं राज्य विधायिकाओं में फंसा रहा। उससे नेताआंे का एक ऐसा दौर देश में आरंभ हुआ जिनकी दृष्टि सिर्फ जातीय तनाव और विभाजन पैदा कर राजनीति साधने पर रही।

जातियों को खत्म करने की धारा से निकले नेता मंडल के बाद जातियों के नेता बन गए। हालांकि राजनीतिक दंश जारी रहने के बावजूद समाज ने धीरे-धीरे अपने को संभाला, लेकिन सतह के अंदर से तनाव पूरी तरह खत्म हो गया हो ऐसा नहीं माना जा सकता। अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण कानून के वर्तमान हस्र ने फिर से तनाव के एक दौर का खतरा समाज के गर्दन पर लटका दिया है।

इससे किस पार्टी को लाभ होगा और किसे हानि, कौन पार्टी हारेगी, कौन जीतेगी इस गणना से कोई प्रसन्न या दुखी होता है तो हो, हमारा सरोकार वहां तक सीमित नहीं हो सकता। हमारी चिंता के मूल में समाज की एकता है। सत्ता में राजनीतिक दल आते-जाते रहेंगे, लेकिन समाज की एकता कायम रहेगी तभी देश सुरक्षित रहेगा, सशक्त होगा। बाहर और भीतर की अनेक शक्तियां देश की एकता को कई प्रकार से कमजोर करने के लिए सक्रिय हैं।

अगर हम सचेत नहीं रहे तो वे सफल हो जाएंगे। संसद अगर बहस के लिए है तो फिर ऐसा आतंककारी माहौल बना देने का क्या मतलब है जहां कोई संासद सच बोलने का साहस न कर सके। उच्चतम न्यायालय का फैसला आने के साथ ही विपक्षी पार्टियों ने नरेन्द्र मोदी सरकार को अनुसूचित जातियों-जनजातियों का खलनायक साबित करना आरंभ कर दिया।

सामान्य लोकतांत्रिक आचरण तो यही था कि न्यायालय ने कोई फैसला दिया जो उसके आधारों पर पहले पूरी बहस हो। सबको अपना विचार रखने का खुला मौका दिया जाए। उसके बाद इसमें बदलाव करना है, नहीं करना है, करना है तो कितना करना है, इन पर विचार कर निर्णय लिया जाना चाहिए था। मंडल आयोग के अनुभवों से सीख लेते हुए इसकी घातक प्रतिध्वनियों का पूर्व आकलन भी करना आवश्यक था।

इससे ज्यादा भयभीत करने वाली कोई स्थिति हो ही नहीं सकती जहां शांति से विवेकसम्मत विमर्श करना संभव न रहे। हमारे यहां के संसदीय लोकतंत्र में राजनीतिक पार्टियों की भूमिका सर्वोपरि हो चुकी है। किसी भी विषय पर निर्णय करने करने का दायित्व उन्हीं का है। अगर राजनीतिक प्रतिष्ठान में खुलकर बात करने की स्थिति नहीं तो निर्णय में भी विवेक परिलक्षित नहीं हो सकता है।

आखिर यह कैसी स्थिति थी जिसमें दोनों सदनों में कोई माननीय सदस्य यहां तक कहने का साहस नहीं कर पाए कि हमें कोई निर्णय करने के पूर्व जनता को विश्वास में लेने की कोशिश करनी चाहिए। स्थिति में अभी तक कोई अंतर नहीं आया है। आप देख लीजिए, देश का वातावरण बिगड़ रहा है, उसे बिगाड़ने वाली शक्तियां सक्रिय है, लेकिन न तो सरकार न विपक्ष कोई भी विरोध मंे खड़े समूहों से संवाद करने को तैयार है।

ऐसे हर विरोध और बंद के पीछे राजनीति होती है, लेकिन यह संभव नहीं कि इतना व्यापक विरोध किसी राजनीतिक दल द्वारा पैदा कर दिया जाए। दोनों पक्षों की ऐसी भूमिका से देश के भविष्य को लेकर किसके अंदर भय पैदा नहीं होगा! प्रधानमंत्री सभी राजनीतिक दलों की बैठक बुला सकते थे, मुख्यमंत्रियों के साथ बैठक कर सकते थे। विरोध करने वाले समूहों के नेताओं से मुलाकात और बातचीत की शुरुआत हो सकती थी।

इस तरह साफ है कि राजनीतिक पार्टियों से हम पैदा हो रहे सामाजिक तनाव के खतरे को खत्म करने के लिए काम करने की उम्मीद नहीं कर सकते। तो फिर किया क्या जाए। एक रास्ता यह हो सकता है कि सभी जाति वर्गों के प्रभावी लोग राष्ट्रीय स्तर से लेकर नीचे तक एक औपचारिक समूह बनाकर सामने आएं और साथ मिलकर एकता का संदेश दें। लोगों से समाजिक एकता बनाए रखने की अपील करें,

उसके लिए सजग रहें, साहस के साथ उनके बीच जाएं, बातें करें तो असर हो सकता है। दूसरे, अगर कहीं अनुसूचित जाति-जनजाति कानून के तहत मुकदमा हो तो अपने स्तर पर भी उसे देखने की कोशिश करें कि वाकई अत्याचार हुआ है या मामला झूठा है। अगर उसमें समझौते की गुंजाइश हो जो उसकी भी कोशिश की जाए। इसे मीडिया में प्रचारित किया जाए।

यह प्रक्रिया जितनी सशक्त होगी समाज का तनाव उनता ही कम होगा और राष्ट्रीय एकता मजबूत होगी। उन शक्तियों को भी धक्का लगेगा जो इसे भारत में तनाव और अशांति पैदा करने के रुप में देख रहे हैं। साथ ही इससे राजनीतिक पार्टियों पर भी वोट की राजनीति से बाहर आकर विवेकशील कदम उठाने का दबाव बढ़ेगा।

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