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मोदी-मैक्रों की कूटनीति बदलेगी वैश्विक तस्वीर

मैक्रों उस दौर में राष्ट्रपति बने हैं, जब फ्रांस कई सारी समस्याओं से गुजर रहा है और पश्चिम में संरक्षणवाद की हवा चल रही है।

मोदी-मैक्रों की कूटनीति बदलेगी वैश्विक तस्वीर

फ्रांस को अब तक के सबसे युवा और सबसे कम राजनीतिक अनुभव वाले नेता राष्ट्रपति के रूप में मिला है। जिस तरह अमेरिका में गैर राजनीतिक व्यक्ति डोनाल्ड ट्रंप ने राष्ट्रपति का चुनाव जीत कर दुनिया को चौंकाया था, कुछ उसी अंदाज में फ्रांस में 39 वर्षीय इमैनुएल मैक्रों ने राष्ट्रपति बनकर दुनिया को स्तब्ध किया है।

मैक्रों उस दौर में राष्ट्रपति बने हैं, जब फ्रांस कई सारी समस्याओं से गुजर रहा है और पश्चिम में संरक्षणवाद की हवा चल रही है। फ्रांसीसी जनता द्वारा एक नौसिखिये राजनेता पर इस कदर विश्वास जताना दुनिया में बदल रही राजनीति का प्रतीक है। मैक्रों नए वादे और नए बदलाव के लक्ष्य के साथ सत्ता में आए हैं।

फ्रांस समेत समस्त यूरोप मंदी के दौर से गुजर रहे हैं। वह लगातार इस्लामिक स्टेट के आतंकवाद के निशाने पर है। लाेकतंत्र, समावेशी समाज, धर्मनिरपेक्षता और सांस्कृतिक बहुलता फ्रांस की बुनियाद व ताकत रहे हैं, पर फ्रांस की वैश्विक साख व आर्थिक शक्ति कमजोर हुआ है।

नए राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के सामने फ्रांस की खोई ताकत वापस लाने की चुनौती है। मैक्रों के बारे में कहा जाता है कि वे उदार मध्यमार्गी हैं। वे फ्रांस्वां ओलांद की सोशलिस्ट पार्टी के सदस्य रहे हैं और उनकी सरकार में दो साल अर्थव्यवस्था मंत्री पद पर रहे, लेकिन राष्ट्रपति चुनाव उन्होंने एन मार्शे नाम की अपनी नई राजनीतिक पार्टी बनाकर लड़ा है।

एन मार्शे की नीति को वामपंथी व दक्षिणपंथी विचारधारा का संगम माना जाता है। इस चुनाव के दौरान उन्होंने स्वयं को एक प्रगतिशील शख्स के रूप में पेश किया हैे। उन्होंने खुद को आर्थिक रूप से उदार, कारोबार समर्थक पेश किया है। हालांकि वे एक संप्रभु देश में किसी भी धर्म को मानने की स्वतंत्रता, समानता और आव्रजन सहित सामाजिक मुद्दों पर समाजवादी विचारधारा से प्रेरित हैं।

वे यूरोपीय संघ के समर्थक हैंं। उन्होंने चुनाव के दौरान बेरोजगारी की समस्या को शीर्ष प्राथमिकताओं में रखा, जिसे राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद उठाने में असफल रहे। उनकी नीतियों में फ्रांस की असफल राजनीतिक व्यवस्था को दुरुस्त करना, श्रम कानूनों में रियायत बरतना, सामाजिक गतिशीलता को प्रोत्साहित करना, सांसदों की संख्या घटाना और एक यूरोजोन सरकार का गठन करना है।

उन्होंने आतंकवादी संगठन आईएस से हर वक्त लड़ने के लिए मुस्तैद रहने वाले कार्यबल के गठन का ऐलान किया है। उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के साथ वार्ता की इच्छा जताई है। मैक्रों ने सीरिया में स्थाई राजनीतिक समाधान के लिए रूस, ईरान, तुर्की और सऊदी अरब के साथ मिलकर काम करने की इच्छा भी जताई है।

देखने वाली बात होगी कि वे यूएस व रूस में जारी तनाव के बीच कैसे संतुलन बिठाते हैं। फ्रांस के भारत से अच्छे रिश्ते रहे हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि मैक्रों के शासन में भी फ्रांस-भारत मित्र देश बने रहेंगे। खास बात यह है कि जिस तरह नरेंद्र मोदी की नीति सबका साथ सबका विकास की रही है, वैसे ही मैक्रों की नीति भी सबको साथ लेकर चलने की है।

ऐसे में संरक्षणवाद की ओर बढ़ रहे विश्व में मोदी और मैक्रों की कूटनीति दुनिया की तस्वीर बदल सकती है। संयुक्त राष्ट्र के गरीबी उन्मूलन के लक्ष्य में वैश्वक स्तर पर मोदी व मैक्रों बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। उनकी जीत को यूरोप में दक्षिणपंथी उभार व संरक्षणवाद की पैरोकारी पर ब्रेक के रूप में भी देखा जाना चाहिए।

यूरोपीय संघ को मजबूत करना, शरणार्थी समस्या से निपटना व वैश्विक व्यवस्था में संतुलन बनाना उनकी बड़ी चुनौती होगी। सुरक्षा परिषद में विस्तार पर नीति अभी स्पष्ट नहीं है। इसलिए भारत को जल्द ही मैक्रों सरकार से बेहतर कूटनीतिक संबंध पर जोर देना चाहिए।

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