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लिंचिस्तान की तरफ बढ़ रहा है भारत, खतरे में देश

भारत दुनिया का सबसे बड़ा, सबसे ज्यादा व्यापक लोकधर्मी अवधारणाओं पर आधारित लोकतंत्र है। यह ककहरा सामाजिक नारे में भी तब्दील हो गया है। अकादेमिक समझ की सड़क पर चलता यह जुमला भीड़ या जुलूस तक को हंकालता रहता है।

लिंचिस्तान की तरफ बढ़ रहा है भारत, खतरे में देश

एक रटा हुआ फिकरा किताबी पाठ्यक्रम में मच्छरों की तरह भुनभुनाता रहता है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा, सबसे ज्यादा व्यापक लोकधर्मी अवधारणाओं पर आधारित लोकतंत्र है। यह ककहरा सामाजिक नारे में भी तब्दील हो गया है। अकादेमिक समझ की सड़क पर चलता यह जुमला भीड़ या जुलूस तक को हंकालता रहता है। समुद्र पार गोष्ठियों में हमारे वस्त्राभिरामी प्रधानममंत्री यही वाक्य दुनिया के हवाले करते रहते हैं।

अचानक एक हिंसक जत्था आकर लोकतंत्र में भरोसा करती खुली सड़क पर अस्सी बरस के साधु लगते बूढ़े को लात घूंसों लाठी से कुचल देता है। गाय का मांस बेचने के आरोपी को हत्यारे मांस के लोथड़े में बदल देते हैं। अंधविश्वास, अवैज्ञानिकता, धर्मांधता, जातिवाद, ऊंचनीच, पूंजीवाद, सामंतवाद के खिलाफ लड़ते चेहरों को कुछ ताकतें नेस्तनाबूद कर मनुष्य के बदले दीवारों पर तस्वीर टांगने लायक कर देती हैं।

लोकतंत्र का शोशा लुग्दी में बदलता रहता है। भारत ज्ञान को उधार लेने परहेज नहीं करता रहा है। पिछली तीन सदियां अपने देशज अतीत से अलग यूरोपीय देशों की तमीज को बंदरिया के बच्चे की तरह छाती से चिपटाए रही हैं। देश ने मालिक रहे फिरंगियों से हुकूमत करने की उम्मीदजदा कई तलवारें खरीद लीं। बिना धार की तलवारें लोहे की नहीं सोने की हैं। उन पर लोहे का केवल वर्क चढ़ा है।

तलवारें खूबसूरत नक्काशी वाली म्यान में खरीदी गईं। म्यानों की मखमली देहें तलवारों से ज्यादा महंगी हैं। इसलिए तलवारें अममून म्यानों से नहीं निकलतीं। उनको फिरंगी ने मंत्रिपरिषद, हाई कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, अफसर, विधायक, सांसद वगैरह कहा। भारत बीसवीं सदी के युद्धजनित संसार के डगमग इतिहास में अपने पैरों खड़ा होने का पहला सामूहिक जतन कर रहा था।

वह पाताललोक तक गया जिसे अब अमेरिका कहा जाता है। वहां से कई नाप और रंग की जगमग पोशाकें खरीदी गईं। उन पर धर्म, व्यापार, अभिव्यक्ति, भ्रमण वगैरह की आजादी के अधिकारों के लेबल लगाए। पोशाकों को करीने से रखने तीन बरस की मशक्कत के बाद एक वाॅर्डरोब भी देश के प्रतिनिधियों ने बनाई। उस आलमारी का नाम आईन या संविधान दिया। दिखने को वाॅर्ड रोब रोज खुलता और बंद होता है।

पोशाकें महंगी होने से केवल राष्ट्रीय त्योहारों, प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति के शपथग्रहण और खास आयोजनों में पहनी जाती हैं। रोज पहनने से पोशाकें नष्ट या गंदी हो सकती हैं। जिंदगी रोज देसी कुर्ते पाजामे, धोती और साड़ी वगैरह में सड़कों पर जीती है। नामचीन सेठों के इलेक्ट्राॅनिक चैनल और अखबारों के कारिंदे अभिव्यक्ति की आजादी के पैरोकार की ठसक लिए कीमती पोषाकों में लकदक दिखाई देते बहुरूपिये बने नये अवतार कहला रहे हैं।

वे विदेशी जीवन की दुर्गंध फैलाते रहने में मशगूल हैं। देशज जमीर, इतिहास और पूर्वजों ने कई बुनियादी सामाजिक व्यवस्थाएं रच रखी थीं। फिरंगी ने समझाया पुराने बासी पचड़ों में क्या रखा है। इनकी धुलाई, सिलाई और रफू के बाद इस्तेमाल में काहे की बुद्धिमानी है। देश आदतन झांसे में आ गया। उनके कहने से पहली बार मिलजुलकर पैंतीस करोड़ लोगों के नुमाइंदों ने एक राष्ट्रीय पोथी लिखी ही थी।

उस संविधान में अंगरेजी हरफों में हिन्दुस्तानी गरीबों, लाचारों, बूढ़ों, बीमारों, बेकारों, मुफलिसों, स्त्रियों, बच्चों के सपनों के लिए मायावी संसार भी उधार की भाषा में रच दिया। सपने दिखाए जो यथार्थ की दहलीज पर पानी के बुलबुले की तरह फूटते जा रहे हैं। जो पैंतीस करोड़ थे, एक सौ पच्चीस करोड़ हो गए। म्यानों, तलवारों, महंगी पोशाकों के कब्जेदार रोबदार हो गए।

उन्हें सचिव, मुनीम, निजी नौकर, अंगरक्षक, ड्राइवर वगैरह की भी जरूरत होती रही। फिरंगियों ने फिर समझाया। सुनो हम दो सौ बरस तुम पर हुकूमत करते रहे। बड़ी मुश्किलों और दुर्घटनाओं के कारण हटे। तुम दो सौ बरस क्या अनंतकाल तक हुकूमत कर सकते हो। वे तलवारें, म्यानें, पोशाकें, दुर्गम भाषा में लिखी पोथियां अभेद्य दीवारों के रहस्य हैं। उन पर ताला जड़ो। चाबी जेब में रखो। तवारीख तुम्हारी जेब में होगी।

इस मायावी ठनगन को लोकतंत्र कहते समझते 125 करोड़ जुबानें सूख रही हैं। सत्ता प्रबंधन की महाभारत में प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्रियों, सांसदों और विधायकों को अर्जुन की भूमिका में अन्याय के दुःशासन का अंत करना था। वीर्यवान अर्जुन क्लैव्य में वृहन्नला बना हुआ है। वह रोज देश विदेश में नपुंसक गर्जना करता है। हवाई लटके झटके दिखाता है। लोकतंत्र की मृगतृष्णा दिखाता है।

भारत में इन्सानी धर्म को लोकप्रशासन कहा जाता था। धर्म चक्र प्रवर्तनाय कहते कुरुक्षेत्र में लड़ने वाला गुजरात के द्वारिकापुरी में रणछोड़दास हो गया। इतिहास तजबीज कर रहा है दलित वर्ग का बहेलिया उसके छलप्रपंच को अपने निर्णायक आक्रमण के जरिए फिर खत्म करे। आईन की पोथी ने नामधारी संविधान सम्राट को राष्ट्रपति कहा। शक्ति, ज्ञान, विवेक, ऊर्जा के सत्ता के सुखमहल में गिरवी हो जाने से वह अंधत्व ढोता है।

हर पांच वर्ष के क्षणिक जीवन के बाद सियासी इच्छामृत्यु का त्रासद भोगता है। गुंडे, लुच्चे, लफंगे, फिरौतिये, रंगदार कहलाते गरीबों और मध्यवर्गीय घरों के बेकार बच्चे नये नामों के पट्टे गले में लटकाए खूंरेजी करने को मजबूर और अभिशप्त हैं। उनसे नौकरियां, रोजगार, जीवनयापन के साधन, आदर्श, आकांक्षाएं, सपने, भविष्य सब कुछ छीन लिए गए हैं। वे देश की सहानुभूति के पात्र तक नहीं हैं।

उनके जीवनकाल में विनाश के अलावा सरकार, सत्ता और संविधान ने कुछ नहीं बचा रखा है। वे नेताओं के लिए सड़कों पर हिंसा की फसलें बो रहे हैं। नेता उन्हें काट रहे हैं। निकम्मे, शातिर, व्यवस्थाजनित, शोषक राजनेता टर्राते रहते हैं। न्यायाधीश, नौकरशाह, कारपोरेटिए, अंग्रेजी नस्ल और तहजीब की तलवारें म्यानें लटकाए, पोशाकें पहने मुट्ठी भर सत्ताधारी दलालों सहित जनता को पशु की तरह जल्लाकुट्टू में तब्दील कर रहे हैं।

विदेशी मानस पुत्रों की हुकूमतशाही के कारण लाखों किसान आत्महत्या कर रहे हैं। महिलाएं सड़कों पर बलात्कार झेल रही हैं। पुलिस, सीबीआई, एन.आई.ए, ई.डी. इन्कम टैक्स के नाम धरे सत्ता की बांबियों के नाग हर विरोधी आवाज को डस सकते हैं। इन्कलाबियों की हत्याएं हो रही हैं। अखलाक, दाभोलकर, पानसरे, गौरीलंकेश जैसे रोशन दिमागों के अस्तित्व में अंधेरा ठूंसा जाता है।

अग्निवेश पर हमले को सत्ता सम्राटों की सहानुभूति और तटस्थता के लायक भी नहीं समझा जाता। लोकतंत्र राजनेताओं के जमीर की खुदकुशी का दूसरा नाम बन गया है।

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