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आलोक पुराणिक का व्यंग्य लेख: याद आए गांव

कोरोना-काल में गांवों के लिए लिए कुछ अच्छी खबरें आ रही हैं। शहरी बालिकाओं को अब गांव का महत्व पता चल रहा है। शहरी बालिकाओं के घरवालों को अब गांव वाले लड़के ज्यादा बेहतर दिखाई देने लग गए हैं।

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शादी करवाने वाली वेबसाइटों ने बताया है कि लाॅकडाऊन के बाद विवाह के इच्छुक बालक-बालिकाओं का ट्रेफिक वेबसाइटों पर करीब तीस प्रतिशत बढ़ गया है। बैठे से बेगार भली के बजाय अब बंदा बैठे से शादी भली टाइप कहावत पर अमल करने में जुट गया है। लोग शादी कराने में बिजी हो रहे हैं। शादी करवाने में बहुत समय लगता है और फिर की हुई शादी से निपटने में बहुत वक्त लगता है। पूरी जिंदगी ही निकल जाती है, यूं समझो।

कोरोना-काल में गांवों के लिए लिए कुछ अच्छी खबरें आ रही हैं। शहरी बालिकाओं को अब गांव का महत्व पता चल रहा है। शहरी बालिकाओं के घरवालों को अब गांव वाले लड़के ज्यादा बेहतर दिखाई देने लग गए हैं। खबरें चल रही हैं कि शहरों में लाॅकडाऊन के कारण सब्जियां नहीं हैं, दूध नहीं है। गांवों की बहुत याद आ रही है लोगों को। गांव-जड़ों की याद आदमी को संकट के वक्त आती है। अच्छे दिनों में भी आदमी अगर गांव देहात को याद कर ले, तो सबके लिए बेहतर रहेगा, लेकिन गांव को तो कोई याद करता ही नहीं।

पुराने वक्त की बात थी कि जब हीरोईन और हीरो गांव में धमाचौकड़ी मचाते थे। दिलीप कुमार वैजयंती माला, सुनील दत्त और नर्गिस की पुरानी फिल्में देखिए गांव दिखते थे। नया दौर में दिलीप कुमार वैजयंती माला गांव में ही गाना गाते थे। शाहरुख खान के टाइम तक नान रेजीडेंट इंडियन-एनआरआई युग आ गया। अब हमारा एनआरआई फंसा हुआ है अमेरिका में, कोरोना के आतंक में। अमेरिका से खतरनाक खबरें आ रही हैं जितने बंदों की जान वियतनाम युद्ध में गई थी, उतने बंदे और उतनों से ज्यादा बंदे अब कोरोना ने अमेरिका ने मार दिए हैं। कोरोना से अमेरिका में मौत का आंकड़ा साठ हजार से बहुत ऊपर चला गया है। दुनिया में सबसे ज्यादा कोरोना के शिकार अमेरिका वाले ही बने हैं।

इधर कुछ सकारात्मक खबरें मिल रही हैं भारतीय गांवों से। महाराष्ट्र के एक गांव के विवाह योग्य नौजवान ने एक अखबार को बताया-अब गांव वाले दूल्हे डिमांड में आ गए हैं। मुझे विवाह योग्य बालिका के माता-पिता के परस्पर संवाद कुछ यूं सुनाई दिया, संदीप है अमेरिका में, उसकी तरफ से आफर आया है, अपनी पिंकी के लिए। छोड़ो अमेरिका बहुत बैकवर्ड देश है मेडिकल के मामले में, देखा नहीं कोरोना का इलाज ढंग से नहीं हो पा रहा है अमेरिका में। अपनी बेटी पिछड़े इलाके में नहीं ब्याहेंगे।

ओके, प्रदीप सैटल्ड है इटली में, उसकी बुआ भी पिंकी के बारे में पूछताछ कर रही थी। छोड़ो इटली में कोरोना ने जो हाल किया है, उसे देखकर तो टिकऊपाड़े के अस्पताल भी बहुत बेहतर लग रहे हैं। इटली भी बैकवर्ड है मेडिकल के मामले में। ना हमें, ना देनी अपनी बेटी इटली में। सुनो, फ्रांस में गौरव है, उसकी मां ने भी दिलचस्पी दिखाई है अपनी पिंकी में। हुंह, फ्रांस का हाल देखा है अब, ना बाबा ना। ओके तो स्पेन के रमेश के रिश्ते पर तो गौर कर लो, अच्छा भला सैटल्ड है, स्पेन में। ना बाबा ना, स्पेन की खबरें नहीं देखीं तुमने। कोरोना का इलाज वहां से बेहतर तो अपने गाजियाबाद में हो रहा है। वहो लोग लगातार मर रहे हैं। अच्छा झुमरीखेड़ा से सोबरनप्रसाद का आफर भी आया है, बाप के खेत हैं, आठ भैंस हैं। बस दिक्कत यह है कि झुमरीखेड़ा शहर से थोड़ा दूर है। मतलब शहर से अस्सी किलोमीटर अंदर जाकर पचास किलोमीटर कच्ची सड़क पर सफर करके गांव झुमरीखेड़ा आता है। सुनो, झुमरीखेड़ा का आफर सही है। बल्कि शहर से पांच सौ किलोमीटर दूर का कोई गांव हो तो वह और भी अच्छा रहेगा। कोरोना से वही इलाके सेफ हैं, जहां कोई आसानी से नहीं पहुंचता। देखो हमारी बिटिया के गेहूं वगैरह खेत में हो जाएगा, दूध दही भी घर की भैंसें दे देंगी। शहरों का हाल देख लो लाकडाऊन में पड़े हैं तो सात दिन दूध न मिलने का और दस दिनों तक सब्जी न मिलने की।

ओके, तो फिर मैं सोबरनप्रसादजी को हां कह देती हूं। हां जी अपनी पिंकी जितनी खुश झुमरीखेड़ा में रहेगी, उतनी न्यूयार्क या रोम में नहीं रह पाएगी। झुमरीखेड़ा ने न्यूयार्क को पीट दिया है जी। वो अब अमेरिका, इटली से कहीं बेहतर हो गया है। हर मां-बाप अपनी बेटी को वहां भेजने को तैयार है। बड़े-बड़े देशों की हवा निकल गई है।

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