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अरविंद जयतिलक का लेख : सदन की गरिमा से खिलवाड़

विपक्षी दलों के सदस्यों द्वारा सदन में मर्यादा की सारी हदें पार की गईं। यह दिन संसदीय लोकतंत्र के लिए काला दिन कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। समझना कठिन है कि जब सत्तापक्ष बार-बार कह रहा था कि कृषि मंत्री अपनी बात पूरी कर लें फिर विधेयक पर मतदान हो तो इसमें क्या अनुचित था। क्या यह विपक्ष की जिम्मेदारी नहीं थी कि वह धैर्य और शालीनता से पहले बात सुनें और फिर अपनी बात कहें? लेकिन देखा गया कि विपक्ष के कुछ सदस्य अपनी नैतिक जिम्मेदारी को किनारे रख वेल तक पहुंच गए और कुछ तो उपसभापति के टेबल पर चढ़ गए। क्या लोकतांत्रिक देश के निर्वाचित-सम्मानित जनप्रतिनिधियों का ऐसा ही आचरण होना चाहिए?

अरविंद जयतिलक का लेख : सदन की गरिमा से खिलवाड़
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कृषि सुधार से जुड़े दो विधेयकों के पारित होने के दरम्यान जिस तरह कुछ विपक्षी (Opposition) दलों के सदस्यों द्वारा मर्यादा की सारी हदें पार की गई वो उच्च सदन की गरिमा पर गहरा आघात है। यह दिन संसदीय लोकतंत्र के लिए काला दिन कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। यह उचित है कि हंगामा काटने वाले आठ सदस्यों को मानसून सत्र की शेष अवधि के लिए निलंबित कर दिया गया है।

समझना कठिन है कि जब सत्तापक्ष बार-बार कह रहा था कि कृषि मंत्री अपनी बात पूरी कर लें फिर विधेयक पर मतदान हो तो इसमें क्या अनुचित था। क्या यह विपक्ष की जिम्मेदारी नहीं थी कि वह धैर्य और शालीनता (Decency) से पहले बात सुने और फिर अपनी बात कहे? लेकिन देखा गया कि विपक्ष के कुछ सदस्य अपनी नैतिक जिम्मेदारी को किनारे रख वेल तक पहुंच गए और कुछ तो उपसभापति के टेबल पर चढ़ गए। क्या लोकतांत्रिक देश के निर्वाचित-सम्मानित जनप्रतिनिधियों का ऐसा ही आचरण होना चाहिए?

याद कीजिए अभी नवंबर, 2019 में ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राज्यसभा के 250वें सत्र को संबोधित करते हुए कहा था कि संसद के उच्च सदन में चेक एंड बैलेंस का सिद्धांत अहम है। विरोध और अवरोध के बीच भेद किया जाना आवश्यक है। अब सवाल उठता है कि क्या विपक्ष के उत्साहित सदस्यों द्वारा विरोध और अवरोध के बीच भेद किया गया? अगर नहीं तो क्यों? क्या वे संसदीय मर्यादा से अनभिज्ञ हैं या उन्हें यह लगता है कि संसद की मर्यादा का हनन कर वे सत्ता तक पहुंच जाएंगे?

अगर यह सोच है तो उन्हें समझना होगा कि देश उनकी सोच से अलग सोच रखता है। बेशक विपक्ष का उत्तरदायित्व है कि वह जनता व जनहित से जुड़े मुद्दे पर सरकार से सवाल पूछे, लेकिन इसका तात्पर्य यह भी तो नहीं कि सवाल पूछने का तरीका अमर्यादित और हिंसक हो? उच्च सदन में ऐसा ही नजारा देखने को मिला। देश हतप्रभ है और समझ नहीं पा रहा है कि ऐसा क्या हुआ।

बेशक राष्ट्रीय महत्व के विषयों पर चर्चा होनी चाहिए, लेकिन उसे रोकने का प्रयास नहीं होना चाहिए। यह मानने में गुरेज नहीं कि संघीय ढांचे और विविधताओं से भरे होने के बावजूद राज्यसभा में राष्ट्रीय दृष्टिकोण ओझल नहीं होना चाहिए। यह सत्ता और विपक्ष दोनों की जिम्मेदारी है। याद कीजिए कि 250वें सत्र के पहले दिन राज्यसभा के सभापति एम वेकैया नायडु सदस्यों के व्यवहार को देखते हुए कहते सुने गए थे कि जहां तक लोगों की उम्मीदों पर खरा उतरने का संबंध है, सब ठीक नहीं है।

उन्होंने सदस्यों को आत्ममंथन का सुझाव दिया। सदस्यगण आत्ममंथन करेंगे या नहीं यह उनके विवेक पर निर्भर है, लेकिन उन्हें ध्यान रखना होगा कि उनकी मौजूदा भूमिका से उच्च सदन की गरिमा धूल-धुसरित हो रही है। बिडंबना कहा जाएगा कि उनके सुझाव के बाद भी विपक्ष के कुछ सदस्यों ने संसदीय मर्यादा का ख्याल नहीं रखा।

विगत कुछ वर्षों से जिस तरह उच्च सदन का माहौल देखने को मिल रहा है उससे यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या राज्यसभा के सदस्यगण आवश्यक एवं अहम सुझावों पर गौर फरमाएंगे? क्या वे राज्यसभा की गरिमा के अनुरुप आचरण करेंगे? इसमें संदेह है। एक समय था जब उच्च सदन यानी राज्यसभा जनपक्षधरता वाले राजनीतिज्ञों व कला, साहित्य, विज्ञान व समाजसेवा क्षेत्र से जुड़े लोगों से गौरान्वित हुआ करता था।

उनका विमर्श संवैधानिक मर्यादा के दायरे में राष्ट्रहित से जुड़ा होता था। सदस्य दलगत भावना से उपर उठकर राष्ट्रीय महत्व के मसलों पर एकता का प्रदर्शन करते थे, लेकिन आज की परिस्थितियां बिल्कुल उलट है। कला, साहित्य और समाजसेवा की पक्षधरता रखने वालों का स्थान बाहुबलियों और पूंजीपतियों ने ले लिया है। यह लोकतंत्र और संसद की सर्वोच्चता दोनों के लिए बेहद चिंताजनक है।

ध्यान देना होगा कि सैद्वांतिक तौर पर भले ही राज्यसभा राज्य हितों की संरक्षिका है, लेकिन व्यवहारिक तौर पर वह केवल राज्य के हितों के लिए ही कार्य नहीं करती बल्कि राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर भी काम करती है। किंतु निर्वाचन की रीति-नीति और भूमिका को देखते हुए अब देश में राज्यसभा की उपादेयता को लेकर सवाल उठने लगा है। गौर करें तो इसके लिए हमारे जनप्रतिनिधियों का अमर्यादित आचरण ही जिम्मेदार हैं।

13 मई 1952 को जब संसद की पहली बैठक संपन्न हुई तब पहले राष्ट्रपति डा. राजेंद्र प्रसाद ने कहा था कि संसद जनभावनाओं की अपेक्षा की सर्वोच्च पंचायत है। उसका समादर होना चाहिए। देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित नेहरु ने संसदीय लोकतंत्र को जनता की जवाबदेही से जोड़ते हुए कहा कि भारत की सेवा का अर्थ लाखों-करोड़ों पीड़ित लोगों की सेवा करना है। लोकसभा के पहले अध्यक्ष गणेश वासुदेव मावलंकर ने जनता और जनप्रतिनिधियों को आगाह करते हुए कहा कि सच्चे लोकतंत्र के लिए व्यक्ति को केवल संविधान के उपबंधों अथवा विधानमंडल में कार्य संचालन हेतु बनाए गए नियमों और विनियमों के अनुपालन तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए।

सवाल लाजिमी है कि क्या मौजूदा संसद सदस्य डा. राजेंद्र प्रसाद, पंडित नेहरु और मावलंकर की अपेक्षाओं पर खरा उतर रहे हैं? क्या माननीयों के आचरण में जनता के प्रति जवाबदेही की भावना विकसित हो पाई है? विगत दशकों में जनप्रतिनिधियों के आचरण को देखते हुए ऐसा कहना मुश्किल है। दो राय नहीं कि इन सत्तर सालों में संसद ने ढेर सारे उतार-चढ़ाव देखे हैं और अपनी सर्वोच्चता बनाए रखी है।

सभी धर्म, जाति, मजहब व पंथ के लोग देश की मुख्य धारा से जुड़े हैं। सबका प्रतिनिधित्व संसद में मुखर हुआ है। संसद ने इन सत्तर सालों में ढेर सारे ऐसे निर्णय लिए हैं जो सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक सरोकारों के लिए मील का पत्थर साबित हुए। सामाजिक मोर्चे पर संसद की उपलब्धियां स्वागतयोग्य है। मसलन दहेज प्रथा और असपृश्यता उन्मूलन जैसी सामाजिक बुराइयों पर रोकथाम लगाकर संसद ने अपने मानवीय दृष्टिकोण को फलीभूत किया है। भूमि सुधार और श्रम कानून के माध्यम से वह भूमिहीनों और कामगारों को आर्थिक संबल प्रदान किया है।

संसद ने ऐतिहासिक फैसला लेते हुए स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए आरक्षण का द्वारा खोला है। मनरेगा चलाकर रोजगार क्रंाति की शुभारंभ की है। संसद ने घरेलू हिंसा पर रोक का कानून बनाकर बच्चों और महिलाओं की रक्षा की है। संसद ने सूचना शिक्षा के अधिकार कानून से भारतीय समाज को लैस किया है। फिर भी इस दिशा में अभी बहुत कुछ किया जाना शेष है। यह तभी संभव होगा जब प्रतिनिधि संसद की गरिमा का पालन करते हुए जवाबदेही की कसौटी पर खरा उतरेंगे।

उन्हें समझना होगा कि अभी देश की जमीनी सूरत नहीं बदली है। वह तभी बदलेगी जब संसदीय भूमिका का विस्तार होगा।

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