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आलोक पुराणिक का लेख : शेयर बाजार की छलांगों के मायने

इस तरह के पूंजी-प्रवाह में स्टाक बाजारों द्वारा मुहैया करवाए जाने वाली तरलता का महत्वपूर्ण योगदान है, इसलिए स्टाक बाजारों को सट्टे का अड्डा बताना उपयुक्त नहीं है। यह अलग बात है कि सट्टा हर उस तत्व से जुड़ सकता है, जिसके भावों को लेकर भविष्य में अनिश्चितता हो। शेयर के भावों पर तमाम तरह के कारकों का असर होता है, ये कारक अनिश्चित होते हैं।

कोरोना के डर से उबरे शेयर बाजार, सेंसेक्स 479 अंकों के उछाल के साथ बंद
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कोरोना के डर से उबरे शेयर बाजार, सेंसेक्स 479 अंकों के उछाल के साथ बंद

आलोक पुराणिक

कोविड-19 महामारी की चुनौतियों से अर्थव्यवस्था जूझ रही है और कर संग्रह से लेकर तमाम आंकड़ों में आर्थिक सुस्ती के लक्षण हैं। ऐसी सूरत में भी शेयर बाजार नई छलांग लगा रहे हैं। क्या बाजार का वास्तविक अर्थव्यवस्था से कोई संबंध नहीं रह गया है, यह प्रश्न प्रासंगिक हो उठता है।

शेयर बाजारों काे कई बार सट्टेबाजी का अड्डा बताया जाता है। भारतीय शेयर बाजार भी अपवाद नहीं हैं। सट्टेबाजी से आशय ऐसी गतिविधि से है, जिसमें भागीदार पक्षकारों की मंशा संबंधित वस्तु की कीमतों में उतार-चढाव के अंतर से लाभ कमाने की होती है। सट्टेबाजी का आम तौर पर औद्योगिक विकास, औद्योगिक वित्त से कोई रिश्ता नहीं होता। औद्योगिक वित्त से जुड़ी गतिविधियों का रिश्ता ऐसी गतिविधियों से होता है, जिनमें किसी कारोबार, किसी उद्यम के लिए वित्त का इंतजाम किया जाता है, यह इंतजाम प्रतिभूतियों के जरिए जैसे शेयर-अंश या डिबेंचर-ऋणपत्रों के जरिए हो सकता है। शेयर-अंश से शेयरधारी को एक तरह से मिल्कियत हासिल हो जाती है, वह संबंधित कारोबार, संबंधित उद्यम का छोटा ही सही मालिक बन जाता है। शेयर बाजार की भूमिका यही है कि वह कंपनियों द्वारा जारी अंशों-ऋणपत्रों की खरीद-बिक्री के लिए बाजार मुहैया करवाए। छोटे निवेशक कंपनियों को पूंजी प्रदान करें और इस पूंजी-अंश या ऋणपत्रों की खरीद-फरोख्त लगातार हो सके, तरलता बनी रहे, इसलिए स्टाक बाजारों का सुचारु कारोबार चलना चाहिए। नई प्रतिभूतियों के बाजार को प्राथमिक बाजार कहते हैं और शेयर बाजारों को द्वितीयक कहा जाता है।

शेयर बाजारों को सट्टेबाजी का अड्डा इसलिए कहा जाता है कि किसी भी शेयर के भावों में बहुत तेज गति से उतार या चढ़ाव हो सकता है। शेयरों के उतार चढ़ाव में समस्या नहीं है, समस्या तब है जब शेयर बाजार में ऐसे कारोबारी आ जाते हैं, जो अपनी धनशक्ति की बदौलत बाजार में अकूत खरीदारी करके किसी शेयर को बहुत ऊंचे स्तर तक ले जाने की क्षमता रखते हैं और बाजार को असंतुलित कर देते हैं। नब्बे के दशक में भारतीय शेयर बाजार ने हर्षद मेहता नामक ऐसा कारोबारी देखा था, जिसके कारोबार की वजह से शेयर बाजार बहुत असंतुलित हुआ था।

शेयर बाजार का मूल उद्देश्य कंपनियों की प्रतिभूतियों के लिए स्वस्थ बाजार मुहैया कराना है। भारत में दो स्टाक बाजार ही मुख्य हैं-मुंबई स्टाक एक्सचेंज और नेशनल स्टाक एक्सचेंज। मुंबई स्टाक एक्सचेंज की जड़ें जुलाई 1875 तक जाती हैं, यह एशिया का पहला स्टाक एक्सचेंज है। दूसरे एक्सचेंज नेशनल स्टाक एक्सचेंज ने 1994 से काम शुरु किया। नेशनल स्टाक एक्सचेंज के अस्तित्व में आने से पहले मुंबई स्टाक बाजार में कारोबार के तरीके प्राचीनकालीन थे। सेबी के शक्ति-संपन्न होने से पहले मुंबई स्टाक बाजार में मुंबई स्टाक एक्सचेंज पर कई बार पहले इस तरह के आरोप लगते रहे कि उसके कारोबार के तौर-तरीके पारदर्शी और निवेशक-मित्र नहीं हैं।

इतिहास देखें, तो साफ होता है कि राष्ट्रीय योजना समिति की औद्योगिक वित्त पर जो रिपोर्ट 1948 में प्रस्तुत की गई थी, उसमें भारतीय स्टाक बाजारों को जुए का अड्डा बताया गया था। इस राष्ट्रीय योजना समिति में लाला श्रीराम, जेआरडी टाटा जैसे उस समय के महत्वपूर्ण उद्योगपति शामिल थे।

स्टाक बाजारों के नियमन का इतिहास का अध्ययन करें तो साफ होता है कि सेबी यानी सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड आफ इंडिया के गठन के बाद भारतीय पूंजी बाजार के तमाम संस्थानों के क्रिया-कलाप में गुणात्मक परिवर्तन आया है। सेबी की स्थापना 12 अप्रैल 1988 को एक गैर-वैधानिक संगठन के तौर पर की गई थी। सेबी को अधिनियम 1992 ने महत्वपूर्ण अधिकार और शक्तियां प्रदान कीं। ऐसा नहीं है कि सेबी के गठन के बाद स्टाक बाजारों के कारोबार को लेकर प्रश्न नहीं खड़े हुए, पर सेबी के गठन के बाद भारतीय पूंजी बाजार में ऐसा नियामक संगठन मौजूद था, जिसका समग्र ध्यान स्टाक बाजारों के कामकाज पर रहा है। नई प्रतिभूतियों का बाजार और स्टाक बाजार यानी प्रतिभूतियों के प्राथमिक और द्वितीयक बाजार दोनों क्षेत्र ही सेबी के अधिकार क्षेत्र के दायरे में आते हैं।

आर्थिक सर्वेक्षण 2019-20 खंड दो के अनुसार- 2019-20 में दिसंबर 2019 तक कंपनियों ने सार्वजनिक निर्गम, अधिकार निर्गम के जरिए 73,896 करोड़ रुपये की राशि निवेशकों से ली थी। यह रकम 2018-19 की समान अवधि की रकम के मुकाबले करीब 67 प्रतिशत ज्यादा थी। यानी हाल के समय में कंपनियों ने पूंजी बाजार से महत्वपूर्ण परिमाण में पूंजी हासिल करके अपने कारोबार में लगाई है। कोविड-19 महामारी के बाद सेबी ने पूंजी बाजार से पैसा उठाने के नियमों को उदार किया है, ताकि सुस्ती की स्थिति में कंपनियों के पास पूंजी का अभाव न रहे। इस तरह से सेबी ने खुद को एक गतिशील नियामक संस्थान के तौर पर प्रस्तुत किया है।

इस तरह के पूंजी-प्रवाह में स्टाक बाजारों द्वारा मुहैया करवाए जाने वाली तरलता का महत्वपूर्ण योगदान है। इसलिए स्टाक बाजारों को सट्टे का अड्डा बताना उपयुक्त नहीं है। यह अलग बात है कि सट्टा हर उस तत्व से जुड़ सकता है, जिसके भावों को लेकर भविष्य में अनिश्चितता हो। शेयर के भावों पर तमाम तरह के कारकों का असर होता है, ये कारक अनिश्चित होते हैं। अनिश्चितता के माहौल में अपने हिसाब से कारोबारी विश्लेषण कर सकते हैं। सेबी का जिम्मा यह है कि वह देखे कि बाजार में अस्वस्थ प्रवृत्तियां तो सिर नहीं उठा रही हैं, बाजार पर सिर्फ सट्टा कारोबारियों ने तो ही कब्जा नहीं कर लिया है। इसलिए निवेशक-शिक्षण भी जरुरी है। सेबी और सरकार से जुड़े कई संस्थान इस निवेशक शिक्षण के काम में लगे हुए हैं। मोटे तौर पर माना जा सकता है कि भारतीय पूंजी बाजार में तीन करोड़ निवेशक हैं। 130 करोड़ जनसंख्या वाले देश में तीन करोड़ निवेशकों का आंकड़ा यह इंगित करता है कि अभी पूंजी बाजार में निवेशकों की भागीदार बढ़ाने की बहुत संभावना है। इस संभावना का एक प्रतिफलन तमाम कारोबारों की पूंजी की उपलब्धता की शक्ल में होगा।

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