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प्रभात कुमार रॉय का लेख : इब्राहिम रईसी के निर्वाचित होने के मायने

ईरान में एक इस्लामिक कट्टरपंथी राष्ट्रपति के सत्तानशीन होने के कारण पश्चिमी देशों और ईरान के मध्य कटुताएं और तनाव और अधिक बढ़ सकता है। दो सैन्य शक्तियों के मध्य विभाजित होती हुई दुनिया में एक खेमे में चीन, रूस और ईरान सरीखे अनेक राष्ट्र हैं और दूसरी तरफ अमेरिका और पश्चिमी राष्ट्र हैं। ईरान वस्तुतः अपनी आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए चीन और रूस के और निकट जा सकता है। ईरान को उसकी संकीर्णता कहां लेकर जाएगी, अभी कहा नहीं जा सकता। पूर्व राष्ट्रपति अहमदीनिजाद के कार्यकालों में ईरान विश्वपटल पर अलग-थलग पड़ गया था। क्या रईसी संकीर्ण काल के इतिहास दोहराने जा रहा है?

प्रभात कुमार रॉय का लेख : इब्राहिम रईसी के निर्वाचित होने के मायने
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प्रभात कुमार रॉय 

प्रभात कुमार रॉय

रान के राष्ट्रपति के चुनाव परिणाम में भारतीयों की बहुत अधिक दिलचस्पी रही, क्योंकि सदियों से भारत और ईरान में अत्यंत निकट सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक संबंध रहे हैं। अमेरिका के कूटनीतिक दबाव को दरकिनार करते हुए भारत ने ईरान के साथ अपने गहन संबंधों को बाकायदा कायम रखा है। ईरान के राष्ट्रपति पद के लिए हुए चुनाव में इस्लामिक कट्टरपंथी राजनीतिक नज़रिया रखने वाले इब्राहिम रईसी ने कुल डाले गए वोटों का 62 फीसदी हासिल करके अपनी फतह का परचम ईरान पर लहरा दिया। इब्राहिम रईसी अगस्त के प्रारम्भ में राष्ट्रपति पद पर आसीन हो जाएंगे। नव निर्वाचित राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी ईरान की न्यायपालिका के मुख्य न्यायाधीश रह चुके हैं और उनका मज़हबी और राजनीतिक नजरिया अत्यंत कट्टरपंथी करार दिया जाता है। ईरान के मुख्य न्यायाधीश रहे, इब्राहिम रईसी द्वारा राजनीतिक कैदियों खासतौर पर सोशलिस्ट मुजाहिदों को बहुत बड़ी तादाद में फांसी का दंड दिया गया था। राष्ट्रपति पद के लिए संचालित चुनाव अभियान में 60 वर्षीय इब्राहिम रईसी ने स्वयं को एक ऐसे उम्मीदवार के तौर में पेश किया जो पूर्व राष्ट्रपति हसन रूहानी हुकूमत के तहत पनपे भ्रष्टाचार और आर्थिक संकट को बखूबी समाप्त कर सकेगा। उल्लेखनीय है कि इस्लामिक उदारवादी हसन रूहानी 2013 में राष्ट्रपति निर्वाचित हुए और निरंतर दो दफा राष्ट्रपति पद पर आसीन रहे। विगत राष्ट्रपति पद के चुनाव में हसन रुहानी के सामने इब्राहिम रईसी चुनाव हार गए थे।

ईरान में 1979 में रजा शाह पहलवी की हुकूमत के तख्तापलट के पश्चात से इस्लामिक तर्ज की मज़हबी हुकूमत कायम है, जिसका राजनीतिक ढाचा अत्यंत जटिल है। ईरान में हुकूमत की वास्तविक शक्ति सर्वोच्च मजहबी सुप्रीम नेता के हाथों में केंद्रित रहती है। मजहबी सर्वोच्च शासक ही वस्तुतः ईरान की सशस्त्र सेना का कमांडर इन चीफ होता है। ईरान में कायम इस्लामिक राजनीतिक व्यवस्था के तहत राष्ट्र के लिए सभी घरेलू और विदेश नीतियों का निर्धारण सर्वोच्च मजहबी सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली ख़ामनेई द्वारा किया जाता है और इस्लामिक हुकूमत में राष्ट्रपति और उसका मंत्रिमंडल महज सुप्रीम लीडर द्वारा निर्धारित नीतियों को अंजाम देता है। निर्वाचित राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी को सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली ख़ामनेई के अत्यंत निकट माना जाता है। यहां तक कि 82 वर्षीय सुप्रीम लीडर का उत्तराधिकारी भी तसव्वुर किया जाता है। कट्टरपंथी इब्राहिम रईसी की राष्ट्रपति पद के चुनाव में फतह के पृष्ठभूमि में हकीकत निहित है कि ईरान में पूर्व के चुनावों के मुकाबले में इस दफा बहुत कम मतदाताओं ने मतदान में हिस्सा लिया। इस्लामिक कट्टरपंथी इब्राहिम रईसी के राष्ट्रपति निर्वाचित हो जाने का सबसे बड़ा कारण रहा कि इस दफा ईरान की गार्जियन काउंसिल ने राष्ट्रपति चुनाव में बहुत सख्त नियम लागू किए। अत्यंत सख्त नियमों के पश्चात तो इब्रहिम रईसी को प्रबल चुनौती देने वाला उम्मीदवार मैदान में शेष ही नहीं रहा। साथ ही इन सख्त नियमों के कारणवश ईरान के मतदाताओं की चुनाव में रुचि और उत्साह समाप्त हो गया। इस दफा ईरान के राष्ट्रपति चुनाव के इतिहास में सबसे कम वोट डाले गए हैं। ईरान में आधिकारिक तौर पर ये दावा किया जाता है कि देश की इस्लामिक व्यवस्था को नागरिकों का प्रबल समर्थन हासिल है। अतः अधिक तादाद में मतदान करने को बेहद अहमियत प्रदान की जाती है, लेकिन इस चुनाव में कम मतदान का बदलाव देखा गया। देश के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली ख़ामनेई और कई वरिष्ठ धार्मिक नेताओं ने लोगों से रिकॉर्ड संख्या में वोट डालने की अपील की थी, लेकिन अपेक्षाकृत कम प्रतिशत मतदान हुआ।

कट्टरपंथी इब्राहिम रईसी के ईरान के राष्ट्रपति पद पर निर्वाचित हो जाने से विश्वपटल पर ईरान और इजराइल के मध्य कशीदगी और सैन्य तनाव में वृद्धि हो सकती है। इजराइल में सत्ता परिवर्तन हुआ है और वहां भी पूर्व प्रधानमंत्री नेतन्याहू के स्थान पर नेफ्टाली बैनेट नामक उग्र दक्षिणपंथी नेता प्रधानमंत्री पद पर आसीन हैं। अतः दोनों देशों के मध्य सैन्य तनाव बढ़ सकता है। इजराइल के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लियोर हाइयात ने कहा है कि है कि इब्राहिम रईसी को अभी तक का ईरान का सबसे कट्टरपंथी राष्ट्रपति करार दिया जा सकता है। इजराइल ने चेतावनी दी है कि राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी ईरान की परमाणु गतिविधियों को तेजी से बढ़ावा देंगे। ईरान और अमेरिका एवं पश्चिमी राष्ट्रों के मध्य पहले से ही ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर जो तनातनी और कटुता विद्यमान है, उसमें और अधिक बढ़ोतरी हो सकती है। ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को लेकर पहले ही पश्चिमी देशों के साथ तनावपूर्ण कूटनीतिक रिश्तों में गिरफ्त में आ गया था। बहुत कड़े आर्थिक प्रतिबंधों से जूझ रहे ईरान में हसन रूहानी इस वादे के साथ पहली बार 2013 में राष्ट्रपति चुनाव जीते थे, कि वो पश्चिमी देशों के साथ ईरान के कूटनीतिक रिश्तों को बेहतर बनाएंगे। तत्कालीन राष्ट्रपति हसन रुहानी ने 2015 में पश्चिमी देशों के साथ ऐतिहासिक परमाणु समझौते पर हस्ताक्षर किए। इस समझौते के तहत ईरान पर थोपे गए आर्थिक प्रतिबंधों में छूट प्रदान करने के बदले, ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर कुछ प्रतिबंध आयद किए गए। पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ किया गया परमाणु करार तोड़ दिया। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने ईरान के साथ परमाणु करार को पुनर्जीवित करने इच्छा जताई है।

फिलहाल ईरान से परमाणु समझौते को फिर से लागू करने को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पश्चिमी देशों की वार्ता जारी है, लेकिन अभी तक इसका कोई पुख्ता परिणाम नहीं निकल पाया है। यक्ष प्रश्न है कि ईरान में एक कट्टरपंथी राष्ट्रपति के निर्वाचन के पश्चात पश्चिम देशों के साथ ईरान के संबंध और अधिक तल्ख हो सकते हैं। ईरान तो चाहता है कि उस पर लगाई गई आर्थिक पाबंदियां खत्म की जाएं। हालांकि अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने कहा कि ईरान पर अनेक आर्थिक प्रतिबंध लागू रहेंगे। ईरान में एक इस्लामिक कट्टरपंथी राष्ट्रपति के सत्तानशीन होने के कारण पश्चिमी देशों और ईरान के मध्य कटुताएं और तनाव और अधिक बढ़ सकता है। दो सैन्य शक्तियों के मध्य विभाजित होती हुई दुनिया में एक खेमे में चीन, रूस और ईरान सरीखे अनेक राष्ट्र हैं और दूसरी तरफ अमेरिका और पश्चिमी राष्ट्र हैं। आर्थिक प्रतिबंधों से जूझता हुआ ईरान वस्तुतः अपनी आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए चीन और रूस के और निकट जा सकता है। ईरान को उसकी इस्लामिक कट्टरपंथी संकीर्णता कहां लेकर जाएगी, अभी कहा नहीं जा सकता। ईरान के इस्लामिक कट्टरपंथी पूर्व राष्ट्रपति अहमदीनिजाद के दो कार्यकालों में ईरान विश्वपटल पर अलग-थलग पड़ गया था। क्या कट्टरपंथी इब्राहिम रईसी के कार्यकाल ईरान अपने संकीर्ण काल के इतिहास को दोहराने जा रहा है

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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