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चुनावों से पूर्व नक्सलियों का लोकतंत्र पर हमला

सरकार को वार्ता के विकल्प को खुला रखना चाहिए लेकिन सुरक्षा इंतजामों को भी पुख्ता रखना चाहिए।

चुनावों से पूर्व नक्सलियों का लोकतंत्र पर हमला
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नई दिल्‍ली. लोकसभा चुनावों से पूर्व छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले के तोंगपाल में सुरक्षाबलों पर नक्सलियों का हमला लोकतंत्र पर एक बड़ा आघात है। हमले में सीआरपीएफ और छत्तीसगढ़ पुलिस के एक दर्जन से ज्यादा जवान शहीद हो गए हैं। तोंगपाल भी उसी इलाके में आता है, जहां गत वर्ष मई में कांग्रेस के नेताओं के काफिले पर बड़ा नक्सली हमला हुआ था, जिसमें पार्टी के चार दिग्गज नेताओं सहित 30 लोगों की हत्या हो गई थी। वर्ष के अंदर ही इतना बड़ा हमला दिखाता है कि हमने उस घटना से कोई सीख नहीं ली है। सुरक्षाबलों पर इससे पहले भी हमले हुए हैं।

2010 में दंतेवाड़ा में हुए नक्सली हमले को कौन भूल सकता है जिसमें 76 जवान शहीद हुए थे। सरकार जब भी कोई बड़ा हमला होता है तो जांच के आदेश दे देती है और फिर सब कुछ अपने र्ढे पर चलने लगता है। इन जांचों से नक्सल जैसे मर्ज के इलाज की उम्मीद नहीं की जा सकती। केंद्र सरकार वाकई यदि इस समस्या के प्रति चिंतित है तो इसके असली कारणों को खोजना होगा। यदि दोबारा ऐसे हमलों से बचना है तो माओवाद को जड़मूल से खत्म करना होगा।

सत्ता पक्ष और विपक्षी दलों को मिल बैठकर निर्धारित करना होगा कि नक्सलवाद के नासूर हो जाने की प्रमुख वजहें क्या हैं? क्या वजह है कि नक्सली देश के सबसे बड़े दुश्मन बने बैठे हैं। प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह नक्सलवाद को आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा करार दे चुके हैं। यह कानून व्यवस्था का मामला है या सामाजिक-आर्थिक मामला है या फिर दोनों। एक धड़ा इसे कानून व्यवस्था की समस्या मानता है तो दूसरा सामाजिक-आर्थिक समस्या मानता है।

दुनिया के बड़े-बड़े मामले वार्ता की मेज पर ही हल किए गए हैं। इतिहास गवाह है कि लड़ाइयों से किसी भी समस्या का समाधान नहीं हुआ है, बल्कि समस्या और उलझती गई है। माओवादियों को भी इसे को अच्छी तरह समझ लेना चाहिए। आदिवासी इलाकों में जहां सरकार नहीं पहुंच पाई है, वहां विकास कार्यो में तेजी लानी होगी। सरकार को वार्ता के विकल्प को खुला रखना चाहिए, लेकिन सुरक्षा इंतजामों को भी पुख्ता रखना चाहिए।

वहीं स्थानीय स्तर पर खुफिया तंत्र को भी मजबूत करना होगा, जिससे नक्सली हमलों को रोका जा सके। साथ ही सरकार को ईमानदार पहल करनी होगी, जिससे वंचित वर्ग विकास की मुख्यधारा से जुड़ सकें। तरुपति से पशुपतिनाथ तक बने लाल गलियारे का क्षेत्र बहुत बड़ा है, जहां माओवादी सक्रिय हैं। यहां की सामाजिक-आर्थिक स्थिति बेहद खराब है। 1967 से अब तक इन क्षेत्रों में ठोस विकास नहीं हो सका है जिससे स्थिति और विकराल होती गई है।

जिसका फायदा कुछ नक्सली उठाते रहे हैं और वंचित आदिवासियों को अपनी मुहिम में शामिल करने में सफल हो रहे हैं। बिना देरी किए इस समस्या के हल की दिशा में बड़ी पहल की जानी चाहिए। समाधान के लिए समग्र योजना तैयार करनी होगी। इस मामले में राज्यों को विश्वास में लेकर केंद्र को राष्ट्रीय स्तर पर प्रयास करनी चाहिए। पहले भी वार्ता के असफल प्रयास हुए हैं, परंतु समस्या को समाधान के बिना छोड़ा नहीं जा सकता। आमने सामने होने पर परतें खुल सकती हैं।

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