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युवा रचनाकार मनोज कुमार झा की कहानी : सोचना पड़ता है

एक दिन मैं यह शहर छोड़ दूंगा और तब यह शहर ऐसा ही नहीं रह जाएगा

युवा रचनाकार मनोज कुमार झा की कहानी : सोचना पड़ता है
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एक दिन मैं यह शहर छोड़ दूंगा और तब यह शहर ऐसा ही नहीं रह जाएगा, देखना आकाश ने मेज पर मुक्का मारते हुए कहा। ‘जैसे जब तूने गांव छोड़ दिया तो गांव एक्सप्लोड कर गया और आभा को तेरा साथ छूट गया तो वो एक्सप्लोड कर गयी‘ गौरव ने दोस्ताना तंज के साथ कहा।

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‘‘तू खुद को समझता क्या है रे, तू गांव छोड़ दिया तो गांव की होली और चकाचक हो गयी और आभा अब अमरीका में पति के साथ लॉस बेगास के चमक को बढ़ा रही है और तूं साला समझता है कि तूं जिस जगह को छोड़ेगा- जेहि गिरि तजै वीर हनुमंता, गई सो जा पाताल तुरंता, जैसे कि तू एक मामूली क्लर्क नहीं, ग्रेनेड की पिन है जो हटेगा तो विस्फोट हो जाएगा’’ मयंक ने गौरव के सुर को संगत दी। ‘तुम लोग अपने को पिद्दी को समझते हो तो समझ, समझ इस दुनिया से एक कटा हुआ कीड़ा।

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पर मैं अपने को भरा-पूरा इंसान समझता हूं और एक इंसान, एक अशरफ-उल-मख्लूकात, जिस जगह पर अपनी जड़े गाड़ कर रखता है, वह जगह वह छोड़ दे तो, सारी धरती का वातावरण बदल जाता है।‘ ‘अबे, इन्वाइरनमेण्ट के अफलातून, ऐसा मनुष्य के हटने-उठने से नहीं होता है, यह दुनिया के उस गैरमानवीय वातावरण के लिए सही है जहां कहते हैं कि एक तितली के पंख का फरफर दूसरे महादेश का, वातावरण बदल देता है और कहते हैं कि..................‘ कहते-कहते मयंक जैसे थक गया।

एक लंबी यात्रा की थकान सा कुछ- जैसे उसके गांव में तितली ने पंख फरफराया हो और उसके दिल में बगूले उठने लगे हो। इस बार जब गौरव ने मुंह खोला तो उसकी आवाज आकाश से मिलती-जुलती थी। ‘सुनो, फिजीक्स मत छांटो, इतना जहीन रहता तो कोई बड़ी नौकरी कर रहा होता, मास भर टर्राने वाला मासटर नहीं होता। क्या गलत कह दिया आकाश ने। क्या एक पेड़ के कट जाने से जंगल नहीं बदल जाता है ? इसे हम-तुम नहीं समझ सकते, यह सिर्फ जंगल समझता है। एक वृद्ध के मर जाने से पूरा गांव उदास हो जाता है।

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एक बूंद गिर जाने के बाद क्या आंखे वही रह जाती है!‘ कहते कहते गौरव कुर्सी से उठ खड़ा हुआ और मुंह धोने के लिए बेसिन के पास गया। बेसिन पर टंगे आइने में देखने की इच्छा तो हुई, पर हिम्मत नहीं हुई। लौटकर आया तो चुप्पी पसरी थी- मटमैले रंग की चुप्पी जिसपर सभी अपने-अपने हिस्से का दुख मल रहे थे। चुप्पी को दुख के रसायन ने फाड़ दिया और थोड़ी देर बाद सभी लोग मुस्कराने लगे, चुप्पी इन डटे और थके हुए लोगों की मुस्कराहट की आंच में पिघल गयी।

अभी और लोगों को भी आना था। ये लोग अभी तक न आए लोगों पर चर्चा करने लगे। हर हफ्ते यह जमावड़ा होता था। न आए लोगों की चर्चा में भी निंदारस नहीं था। यह वातावरण को दुर्लभ बनाता था। ये सब जहां-तहां से बहते हुए शहर में आकर मिल गए थे।

आकाश के पिता गाँव के चैक पर पान की दुकान चलाते थे। उनकी दूकान चैक पर सबसे ज्यादा मशहूर थी। वहाँ तरह-तरह की आकृतियों की पान की गिलौड़ी बनाकर ग्राहकों को दिय जाता था - कमल की तरह का तो कभी ताजमहल की तरह का। आकाश भी पान की गिलौड़ी बाँधना सीख गया था। दुकान पे तरह तरह के लोग आते थे।

इतनी तरह के लोगों को देखना आकाश को अच्छा लगता था। वे सभी के बतियाने के ढ़ंग की नकल करता था। वह अपनी माँ को जब नकल करके सुनाता था तो माँ को बड़ा अच्छा लगता था। तब आकाश और माँ नहीं जानते थे कि इस तरह से नकल करने को मिमिकरी कहते है और इसके बदले में पैसे मिलते हैं।

वह कई बार माँ से कहता कि माँ, तूँ भी दुकान पर चलना, बड़ा आनंद है, वहाँ। माँ मुस्कुराकर रह जाती। माँ ने कभी चैक पर नहीं जाने क कारण नहीं बताया। वह समझ नहीं पाता था कि जो माँ अपनी सहेलियों के साथ इतना हंसी-ठठ्ठा करती है, वो चैक पर क्यों नहीं जा सकती। पर, माँ ने बताया भी नहीं और वो रफ्ता-रफ्ता समझ भी गया कि उसके टोले की औरतें चैक पर नहीं जाते।

दूसरे टोले की औरतें चैक आती थी। उसे अपने टोले के लोगों के अलावा सबसे अधिक अपनापा मुसहर टोली के बच्चों से था। ये बच्चे आसपास के चैर-चांचर में मिलने वाली खाने की चीजों को निकालने में उस्ताद थे। इसके साथ आकाश ने तरह तरह के जंगली पौधों की जड़ें, कंद और फल खाए। इमली और बेर तोड़ने में ये माहिर थे। इसी मैं से एक ने बताया था फल तो पत्थर से तोड़े जा सकते हैं, मगर फूल नहीं। यह बात माँ को बहुत अच्छी लगी थी।

वह भी कुछ चीजें खा लेती थी। जब यह सब खाती तो उसे बचपन की सखियाँ याद आती थीं। ये लोग खेलते भी बड़े अच्छे थे। हीरा सदाय बाँस की जड़ें खोदकर उससे बड़ा अच्छा गैंद बनाता था। कई मैच इन्होंने जिताए। शाम को आकाश या तो इन लोगों के साथ खेलता या पितामह के साथ खेतों में घूमने जाता। दादा इन्हें किस्से सुनाते कई तरह के।

मगर जब सूर्यास्त होने लगता तो आकाश को दादाजी चुप होने को कहते। सूर्य का डूबना, पक्षियों का लौटना, खेतों में फैली लाल रंग की किरणें - ये सब आकाश के दादाजी को बहुत अच्छे लगते। आकाश को भी यह सब अच्छा लगता था। मगर वो एक बदरंग शाम थी। उस दिन आकाश दुकान पर था। उसके पिता भी थे। हीरा सदाय का छोटा भाई दुकान पे आया। आकाश ने कई बार पूछा- पान खाओगे ? मगर वो ना में सिर हिलाता रहा।

वो कई बार दुकान पर आता और लौट जाता। आकाश समझ नहीं पा रहा था। हीरा के भाई ने आकाश के पिताजी से एक गेंद का दाम पूछा। उसके पिताजी ने अनमने ढ़ंग से कीमत बताई। आकाश को बुरा लगा। हीरा के भाई ने सारे गेंदों को देखा और लौटने लगा। तभी हरखू वहाँ आया। उसने कहा कि पलटनमा का लड़का कुछ चुरा के ले जा रहा है। हीरा के पिताजी का नाम पलटन था।

आकाश के पिता ने कहा - चेक करो, हमको भी डाउट था। हरखू ने पीछा किया, तलाशी ली। एक गेंद निकला और लड़का रोने लगा। हरखू ने कहा- क्या रे! तेर बाप का दुकान है, साला रोता है, फिलिम देख देख करके एक्टिंग सीख गया है। यह कहते हुए हरखू ने लड़के के देह पर पिच्च से पान की पीक फेंक दी। वहाँ दो और लोग थे। उन्होंने भी उसके देह पर पीक फेंक दी। आकाश का माथा घूमने लगा।

जब उसके पिता ने भी पीक फेंकी तो उसका माथा सुन्न हो गया। थोड़ी देर बाद उसको होश आया तो वह सोचने लगा कि उसका बाप भी गया गुजरा है। फिर सोचा कि हीरा तो खुद उतना बढ़ियाँ गेंद बनाता है, मगर उसका भाई यह गेंद क्यों चुराने आया। तब उसके जेहन में आया कि हीरा का बनाया गेंद ज्यादा उछलता नहीं था। यह गेंद उछलता बहुत था, इसे जादू बाली गेंद कहते थे और यह नया-नया ही बाजार में आया था।

इस घटना के बाद आकाश कभी दुकान पर नहीं गया। पान की गिलौरी के जो कमल इत्यादि आकाश उसे लुभाते थे वे अब उसकी कल्पना में तिलचट्टे और झींगुर की तरह लगने लगे और उसका पीछा करने लगे। अब उसे पिता एक चोर की तरह लगते थे, वो माँ से ही ज्यादा बतियाता था। मैट्रिक के बाद वो जिला मुख्यालय आ गया और अब इस शहर मे।

मयंक के पिता के पास खेत अधिक थे। खेतों को बेचकर उसके पिता ने ट्रक खरीदे। बिहार के एक क्रांतिकारी नेता ने कहा था कि कई राज्यों में लोगों को पैसा होगा तो वे कील बनाने वाली ही सही, फैक्ट्री खोल लेंगें; मगर बिहार में बस एवं ट्रक खरीद कर चलाऐंगे। यह बात मयंक के पिता के लिए सौ फीसदी सही थे। उनके पास सात ट्रक थे। वे चाहते थे कि मयंक उनका धंधा संभाले। मगर मयंक शहर आ गया।

ऐसे ही इन सारे दोस्तों के अलग अलग ढ़ंग और अलग अलग काट की पृष्ठभूमि थी।

शहर के कई स्वयंभू भूमिरक्षकों को लगता था कि शहर को बंजर होते जाने की हादसा के चक्षुगोचर कारण इन बाहर से आए लोगों के फेफड़े से निकलते हवा, पानी और नमक में ढूंढ़ा जा सकता है। मगर, इनके पास वो खल-हुनर कहां था, जिनसे ये किसी शहर के सत्त को सोख सकते थे! ये तो प्यारे होने की हद तक निरीह थे, बिल्कुल बारिश में भींग रहे बच्चे की तरह। ये सब अपने अपने गांव, कस्बों से साथ में बांधकर बस थोड़ा सा दुख, थोड़ी सी ख्वाहिशें, थोड़ा सा जुर्रत-ए-इजहार और थोड़ा सा जीने की ललाई लाए थे।

कोई अपने कोट की जेब में गांव की शामों के चन्द टुकड़े लेकर आया था जिसे वह इस शहर की फुफकार से डरकर हिलाने लगता था और यह शहर भैंसा की तरह भड़क जाता था, कोई अपने साथ चंद गंतव्य-वंचित प्रेम-पत्र लेकर आया था जो कि नौकरी के अपाइंटमेंट लेटर के साथ प्रेमिका को भेजे जाने की कल्पित चातुर्य के इंतजार में इतनी धुंधली हो चुकी थी कि शंका होती थी कि इन्हें पढ़ने की कूबत अब प्रेमिकाओं में बची होगी कि नहीं।

कोई लिट्टी बनाने के लिए थोड़ा सत्तू, रोटी के साथ खाने के लिए बिना आयोडीन की बेढ़ब किंतु सलोने दाने वाले खुरदरा सरस नमक जैसी चीजें लेकर आया था। कोई चंद किताबें लेकर आया था जिनमें सूरज, तारे आदि की किस्से थे, लाखों सालों के बंजारेपन और हजारों सालों के हल जोतने का गीत था और उखरे हुए लोगों के पांव से बहने वाले खून और आंसू की कविताएं थी।

ऐसी ही चीजें लेकर आए थे ये। पर, इस शहर के लोग इन सबमें बारूद की गंध सूंघ लेते थे। और सुंघैयों के सरदार के पास पुख्ता रिपोर्ट थी कि यह गंध लगातार बढ़ता जा रहा है। बाहर से आए ऐसे लोग बहुत से थे। पर, फिलहाल आकाश की बैठक में इनमें सिर्फ चार थे और सात-आठ और आने थे। तभी मयंक ने सेलफोन पर समाचार देखा कि बाहरी लोगों के खिलाफ शहर में दंगे शुरू हो गए हैं।

सभी लोग डर गए। सबको फोन लगाया गया। मात्र असलम को फोन नहीं लग पा रहा था। उसे एक गैर-मुस्लिम लड़की से प्यार था जो गैर-बिहारी भी थी। सभी के जेहन में गैर-मुस्लिम, गैर-बिहारी लफ्ज आ रहे थे। सबके मन का स्वाद बिगड़ रहा था। इस तरीके से भी सोचना पड़ेगा, ऐसा इन्होंने सोचा भी न था। असलम को कुछ हुआ तो नहीं? लड़की के घरवालों ने इस मौके का बहाना बनाकर कहीं कुछ कर तो नहीं दिया? या लड़की ने तो कहीं इसी मुद्दे पर झगड़ा नहीं कर लिया और असलम नाउम्मीद सा कहीं गायब हो गया।

आकाश ने जब यह कहा कि हो सकता है कहीं लड़की ने उसे खत्म तो नहीं कर दिया, क्योंकि इधर संबंध कसैले होते जा रहे थे, जिस कंपनी में दोनों एक ओहदा पर काम कर रहे थे उसमें उनके प्रमोशन को लेकर आपसी तनाव बढ़ गया था, तो सबने उसे डपट दिया। मगर सबके मन में यह चल रहा था कि असलम को लड़की ने या उसके घर वाले ने कहीं ...........। या कहीं असलम ने ही उसे ...............

असलम भी बड़ा गुस्सैल है। या कहीं दोनों ने एक साथ खुदकुशी तो नहीं कर ली, जिसका जिक्र वे अक्सर करते थे और कहते थे कि इसके लिए किसी पवित्र वक्त का इंतजार है। ‘‘जो भी हो हमें इसी शहर में रहना होगा और असलम के बारे में तुरंत पता लगाना होगा।’’ - आकाश ने कहा और सब ने हामी भरी।

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