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अशोक गौतम का व्यंग्य लेख: आदमी कहीं का

हद है यार! इस कोरोना ने कुत्ते तक इतने संवदेशील कर दिए? और इधर आदमी होने के बाद भी हम आदमी हैं कि समझते नहीं। क्या मतलब तुम्हारा? क्या फील कर रहे हो तुम? क्या तुम्हें भी खांसी हो रही है?

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जब से लॉकडाउन हुआ, मैं तो उदास हूं ही पर कई दिनों से न नोट करते हुए भी नोट कर रहा था कि जैसे घर का पांचवां मेंबर डेजी भी उदास हो। जबकि इन दिनों उसको तो कम से कम प्रसन्न होना चाहिए कि आजकल मैं ऑफिस बंद होने के चलते साहब की सेवाश्रूषा के बदले उसकी सेवा में जुटा हूं।

उसकी उदासी बर्दाश्त करने की जब मेरी हद से पार हो गई तो मैंने डर के बीच हंसते हंसाने की कोशिश करते उससे पूछा, यार! क्या बात है। हमें तो छोड़ माना, शब्दकोश में छपा प्रसन्नता शब्द तक इन दिनों उदास चल रहा है। ऐसे में जो अब तुम भी प्रसन्नता की ओर से हिम्मत हार गए तो मैं किसके सहारे दिन काटूंगा? तुम्हारी मालकिन तो लॉकडाउन के दूसरे दिन से ही काटने को पड़ने लगी है। आखिर तुम इतने उदास क्यों हो डियर! पूछ मैंने उसे पुचकारने को ज्यों ही आगे हाथ बढ़ाया तो वह मुझसे एक मीटर के बदले दो मीटर की दूरी बनाता बोला, मालिक! बुरा मत मानना। हूं तो कुत्ता, इजाजत दीजिए! मैं क्वारंटीन होना चाहता हूं, डेजी परमिशन के लिए मेरा मुंह ताकने लगा तो मैं परेशान!

हद है यार! इस कोरोना ने कुत्ते तक इतने संवदेशील कर दिए? और इधर आदमी होने के बाद भी हम आदमी हैं कि समझते नहीं। क्या मतलब तुम्हारा? क्या फील कर रहे हो तुम? क्या तुम्हें भी खांसी हो रही है? पर मैंने तुम्हें कभी खांसते हुए देखा तो नहीं। मैंने अपनी खांसी छुपाते उससे आगे पूछा, दिमाग में बुखार तो तुम्हारे खाक होगा। नहीं मालिक! ऐसा कुछ नहीं जैसा, मैं तुममें देख रहा हूं। कई दिनों से नोट कर रहा हूं कि तुम जब भी मेरे सामने आते हो अपनी खांसी रोकने की असफल कोशिश करते हो। तुम्हारी जुबान भी कई दिनों से मैं भारी-भारी महसूस कर रहा हूं। सो, सोच रहा हूं जो आप बुरा न मानों तो एहतियात के तौर पर मैं खुद को खुद ही क्वारंटीन कर लूं, अपनी आपकी सेफ्टी के लिए। मालिक कहते हैं कि न, जान है तो जहान है। ऐसा वैसा कुछ नहीं यार! ये खांसी तो आजकल ज्यादा तला, खट्टा खाने से है। पर यार! तुमने इतनी अक्ल कहां से पाई? मैं तो इतना अक्ल वाला हूं नहीं, सोसाइटी में भी तुम्हें जाने नहीं देता। इधर आदमी अपने समाज का सबसे बड़ा खैरख्वाह बनने के ढोंग के बाद अपने को समाज के लिए सबसे खतरनाक मानने को कतई तैयार नहीं और तुम उधर जिनको बचने बचाने के लिए क्वारंटीन किया जा रहा है, वे वहां से भागकर समाज को तबाह करने पर जुटे हैं।

आदमी और जानवर में यही तो एक अंतर होता है मालिक। सच पूछो तो पहले जब हम आपसे दूर थे, हमें कुछ पता नहीं था, न झूठ का, न लूट का, न मक्कारी का, न दुनियादारी का। हम तो शब्दों के वही अर्थ लेते थे, जो उनके वास्तव अर्थ होते थे। हमारे लिए निष्ठा निष्ठी थी, प्रतिबद्धता प्रतिबद्धता। छल रहित, स्वार्थ रहित। प्रतिबद्धता, निष्ठा का अर्थ स्वार्थ ही होता है, यह हमने आपके शब्दकोश में ही देखा। आपका साथ पाने से पहले हम बिना दिमाग के शरीफ जानवर जो थे। तब हम सियार हो कर भी सियार न थे, गीदड़ होकर भी गीदड़ न थे, सांप होकर भी सांप न थे। जबसे हम आपके संपर्क में आए हैं, तबसे हम सही मायनों में गीदड़, सियार, लोमड़, सांप गिरगिट और भी पता नहीं क्या क्या हो गए हैं। उसने आदमी से अधिक समझदारी वाली बात की तो मेरा पुनर्जन्म में एकबार फिर विश्वास मजबूत हुआ। हो न हो, डेजी पिछले जन्म में जरूर गुणीजन रहा होगा, वह भी उम्दा किस्म का। पर यार! तुम भी क्वारंटीन हो गए तो सारा दिन मैं सबके घर में होते हुए भी बोर नहीं हो जाऊंगा क्या? मैं एक बार और स्वार्थी हुआ। मालिक! आप आदमियों को अपने समाज से कोई सरोकार हो या न पर हमें तो आपसे बहुत सरोकार हैं। मैं नहीं चाहता कि, परिवार के होते हुए भी आपके अकेलेपन का दर्द मैं बहुत खूब समझता हूं मालिक, पर दो हफ्तों भर की ही तो बात है। आगे कुछ कहने के बदले उसने अपने पंजों से कमरे का दरवाजा बंद किया तो मुझे तब पहली बार अपने आदमी होने पर शर्म महसूस हुई। वर्ना, अभी से कुछ देर पहले तक तो मैं अपने आदमियत के अहंकार में अपनी हर बेशर्मियत को तर्क देकर जायज ठहराता रहा था। आदमी की सबसे बड़ी फितरत भी यही है। वह जानबूझ कर लाख गुनाह करने के बाद भी अपने को जायज ठहराने की अंतिम सांस तक कोशिश करता है। आदमी कहीं का!

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