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अलका आर्य का लेख : भारत को बनाएं कुपाेषण मुक्त

नेशनल फेमिली हेल्थ सर्वे (एनएफएचएस-5, 2019-21) के अनुसार पांच साल से कम आयु के 4 करोड़ 70 लाख भारतीय यानी 36 फीसदी बच्चे नाटे हैं। एनएफएचएस सर्वे 5 के आंकड़ें बताते हैं कि देश में पांच साल से कम आयु वर्ग के 2 करोड़ 20 लाख यानी 19 फीसदी बच्चे दुबले हैं। इसमें 88 लाख बच्चे भी शमिल हैं जो अति दुबले हैं। इसी सर्वे से पता चलता है कि पांच साल से कम आयुवर्ग के 67 फीसदी बच्चे व 52 फीसदी गर्भवती महिलाएं एनीमिक हैं। कुपोषण से निपटना बहुत जरूरी है। पौष्टिक आहार व टीकाकरण बच्चे के विकास के लिए सुरक्षा कवच का काम करते हैं। कुपोषण मुक्त भारत के लिए कई र्मोचों पर तेजी से काम करने की दरकार है।

अलका आर्य का लेख : भारत को बनाएं कुपाेषण मुक्त
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अलका आर्य

मुल्क में सितंबर माह से त्योहारों का माहौल शुरू हो जाता है। बच्चों से लेकर बड़े उत्सवी मोड का प्रक्रिया में देखे जा सकते हैं, लेकिन इन पारंपरिक पर्वों के साथ ही भारत में वर्ष 2018 से, सितंबर माह को पोषण माह के तौर पर भी मनाया जा रहा है। पोषण माह हर साल सितंबर महीने के दौरान समुदायों के साथ जुड़ने और पोषण जागरूकता पैदा करने के लिए मनाया जाता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 28 अगस्त को अपने मासिक मन की बात कार्यक्रम में पोषण माह के महत्व को रेखांकित भी किया था। दरअसल भारत आबादी के संदर्भ में इस समय दुनिया में दूसरे नंबर पर है। मुल्क की 1.4 अरब आबादी में महिलाओं व बच्चों की संख्या करीब 67.7 प्रतिशत है। मुल्क की आर्थिक तरक्की व सामाजिक बदलाव के लिए जरूरी है कि महिलाएं व बच्चे स्वस्थ हों, सशक्त हों और सुरक्षित माहौल में उनका सकारात्मक विकास हो।

बेशक हाल ही में भारत ब्रिटेन को पछाड़ विश्व की पांचवी अर्थवयवस्था बन गया है, लेकिन मुल्क की महिलाओं (15-49 आयुवर्ग) व पांच साल से कम आयु के बच्चों में पोषण का स्तर चिंता पैदा करता है। नेशनल फेमिली हेल्थ सर्वे (एनएफएचएस-5, 2019-21) के अनुसार पांच साल से कम आयु के 4 करोड़ 70 लाख भारतीय यानी 36 फीसदी बच्चे नाटे हैं। एनएफएचएस सर्वे 5 के आंकड़ें बताते हैं कि देश में पांच साल से कम आयु वर्ग के 2 करोड़ 20 लाख यानी 19 फीसदी बच्चे दुबले हैं। इसमें 88 लाख बच्चे भी शमिल हैं जो अति दुबले हैं। इसी सर्वे से पता चलता है कि पांच साल से कम आयुवर्ग के 67 फीसदी बच्चे व 52 फीसदी गर्भवती महिलाएं एनीमिक हैं। गौरतलब है कि मुल्क में कुपोषण एक बहुत बड़ी चुनौती है। कुपोषण पोषण की ऐसी स्थिति कहलाती है जब इंसान को उसकी जरूरत से कम पोषक तत्व मिले या जरूरत से अधिक पोषक तत्व मिले। कुपोषण में अल्प पोषण और अत्याधिक पोषण दोनों आते हैं। इसमें सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी, अधिक वजन और मोटापा भी शमिल हैं। अल्प पोषण कुपोषण की ऐसी स्थिति कहलाती है जिसमें पोषक तत्व गुण व मात्रा में शरीर के लिए काफी नहीं होते यानी एक या एक से अधिक पोषक तत्वों की कमी पाई जाती है। इस औरभी ध्यान देने की जरूरत है कि मुल्क में अधिक वजन और मोटापा जनस्वास्थ्य समस्या के तौर पर उभर रहा है। एनएफएचएस-5 इस पर भी रोशनी डालता है कि मुल्क में पांच साल से कम आयुवर्ग के 3 फीसदी बच्चों का वजन अधिक है, जबकि एनएफएचएस-4 (2015-16) में यह आंकड़ा 2 प्रतिशत था। एनएफएचएस-5 (2019-21)के अनुसार 24 फीसदी महिलाओं का वजन अधिक था या मोटी थी। अधिक वजन गैरसंचारी और हृदय संबधित रोगों जैसे मधुमेह, उच्च रक्तचाप, किडनी रोगों को बढ़ाता है और गर्भवास्था के दौरान समस्याएं भी पैदा कर सकता है। इस तथ्य को भी नजरअंदाज नहीं कर सकते कि कुपोषण अपने सभी प्रकारों में ( अल्पपोषण, सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी, अधिक वजन और मोटापा) भारत में 68 प्रतिशत बाल मृत्युदर से जुड़ा हुआ है। यूनिसेफ इंडिया के उप प्रतिनिधित्व व पोषण प्रमुख अर्जुन देवग्ट का कहना है-यूनिसेफ का मानना है कि अच्छा पोषण बच्चे को जीवित रखने और विकास का आधार है। अच्छी तरह से पोषित बच्चों की वृद्वि बेहतर होती है,वे बेहतर सीखते हैं, खेलते हैं और अपने-अपने समुदायों में हिस्सा भी लेते हैं, लेकिन भारत के संदर्भ में कुपोषित बच्चों को इस दायरे से बाहर निकालना एक बहुत बड़ी चुनौती है।

दरअसल कुपोषण चाहे वे बच्चों में हो या महिलाओं में, उससे निपटना बहुत जरूरी है। इससे मुल्क की अर्थयवस्था भी प्रभावित होती है। अध्ययन बताते हैं कि बाल कुपोषण के कारण भारत को अपनी जीडीपी का 4 प्रतिशत नुकसान होता है। बच्चों में नाटापन यानी उम्र के अनुपात में कम लंबाई की प्रमुख वजह कुपोषण है। नाटापन बच्चों की शारीरिक व ज्ञान संबंधी विकास को प्रभावित करता है, उनकी सीखने की क्षमता को सीमित कर देता है। बाद में बड़े होकर जब ये बच्चे काम करना शुरू करते हैं तो उनकी कार्यक्षमता भी प्रभावित होती है और नतीजतन वे स्वस्थ बच्चों की तुलना में कम कमा पाते हैं। महिलाओं में भी नाटापन है तो उससे उनके कोख में पल रहे भ्रूण व नवजात शिशु पर भी प्रभाव पड़ सकता है। इस कारण से मरा हुआ शिशु पैदा हो सकता है, या जन्म के समय शिशु का वजन कम हो सकता है, उसके विकास में भी देरी हो सकती है। इसी तरह बच्चों में दुबलापन बच्चों को कई तरह के जोखिम में धकेल देता है। दुबले बच्चों की बीमारियों व मौत की गिरफ्त में आने की आशंका अधिक रहती है। स्वस्थ शिशु को जन्म देने के लिए महिला का स्वस्थ होना बहुत जरूरी है। मां बनने वाली महिला का पोषण स्तर मानकों के अनुरूप नहीं होगा तो स्वस्थ शिशु के पैदा होने के बारे में कैसे सोचा जा सकता है। गर्भवती महिला अगर पौष्टिक खुराक नहीं ले रही है तो उसके गर्भ में पल रहे शिशु तक भी पर्याप्त पौष्टिक तत्व नहीं पहंुचते, इससे उसकी कोख में वृद्धि पर असर पड़ता है। ऐसे बच्चों के बाद के वर्षों में नाटा होने व दुबले होने की संभावना अधिक रहती है। कुपोषण मुक्त भारत की दिशा में प्रधानमंत्री मोदी प्रयासरत हैं। 8 मार्च 2018 को प्रधानमंत्री मोदी ने राजस्थान के झुंझुनू से राष्ट्रीय पोषण मिशन को लाॅन्च किया था। यह मिशन बच्चों, गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली मांओं के लिए पोषण संबंधी परिणामों में सुधार करने के वास्ते भारत सरकार का एक महत्वाकांक्षी कार्यक्रम है। इसके तहत मिशन मोड में कुपोषण की समस्या को हल करना है। बच्चों में नाटापन, दुबलापन, कुपोषण, खून की कमी और जन्म के समय कम वजन के बच्चों की संख्या को कम करनेपर बल दिया गया है। इसके साथ ही किशोर लड़कियों, गर्भवती महिलाओं, दुग्धपान कराने वाली माताओं के स्वास्थ्य में सुधार पर भी फोकस है। सरकार की कोशिश इस तरह समग्र रूप से कुपोषण को रोकने व कुपोषण मुक्त भारत बनाने की है। अच्छा पोषण बाल अधिकार भी है और इस अधिकार को पूरा करने की जिम्मेदारी केंद्र व राज्य सरकार दोनों की है।

इसी तरह बाल टीकाकरण की सेवाओं को भी सुगम बनाने के लिए कई तरह के प्रयास किए जा रहे हैं। बच्चों को पौष्टिक आहार मिलना चाहिए व उस आहार में विविधता भी होनी चाहिए। पौष्टिक आहार व टीकाकरण बच्चे के विकास के लिए सुरक्षा कवच का काम करते हैं। अगर बच्चा कुपोषित है तो टीकाकरण भी उस स्थिति में अधिक अहम भूमिका नहीं निभा पाते। सच्चाई यह है कि मुल्क में अधिकतर बच्चों को वो पोषण नहीं मिल पाता जिसकी उन्हें जरूरत है और लिहाजा वे नाटे रह जाते हैं, दुबले बन जाते हैं ओर अधिक वजन वाले हो जाते हैं। ध्यान देने वाली बात यह है कि यह सबसे गरीब और संवेदनशील बच्चों के बारे में सच है। कुपोषण मुक्त भारत के लिए कई र्मोचों पर तेजी से काम करने की दरकार है।

(ये लेखक अलका आर्य के अपने विचार हैं।)

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