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महिलाओं का खतना: जानिए क्या है खतना और उसकी हकीकत

तीन तलाक के बाद अब भारत में ''महिलाओं का खतना'' प्रथा रोकने के लिए मुस्लिम महिलाएं आंदोलन कर रही हैं। इस आंदोलन की शुरुआत अगस्त 2017 से हुई, जब भारत के सर्वोच्च न्यायालय एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया।

महिलाओं का खतना: जानिए क्या है खतना और उसकी हकीकत

Mahilaon ka khatna kya hota hai

'महिलाओं का खतना' प्रथा रोकने के लिए मुस्लिम महिलाएं आंदोलन कर रही हैं। इस आंदोलन की शुरुआत अगस्त 2017 से हुई, जब भारत के सर्वोच्च न्यायालय एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया। इस फैसले ने इस्लाम में मौजूद 1400 साल पुरानी परंपरा को तोड़ा। मुस्लिम महिलाओं के पक्ष में फैसला करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने तीन तलाक की प्रथा को गैर-कानूनी घोषित किया।

इसके साथ ही केंद्र सरकार को तीन तलाक पर कानून बनाने का आदेश दिया। सरकार ने इस तीन तलाक बिल भी बनाया लेकिन उसे कानून का रूप देने में अभी तक असमर्थ हुई। इस असमर्थता का कारण राज्यसभा में इस बिल का पास न हो पाना था। हालांकि मुस्लिम महिलाओं ने मोदी सरकार और इस बिल का समर्थन किया और इस बिल को मुस्लिम महिलाओं का उत्पीड़न रोकने वाला बताया।

ये है महिला खतना की प्रक्रिया

  • महिला योनि के एक हिस्से क्लिटोरिस को रेजर ब्लेड से काट कर खतना किया जाता है। वहीं कुछ जगहों पर क्लिटोरिस और योनि की अंदरूनी स्किन को भी थोड़ा सा हटा दिया जाता है।
  • खतना की इस परंपरा के पीछे यह माना जाता है कि महिला यौनिकता पितृसत्ता के लिए खतरा है, साथ ही महिलाओं को यौन संबंध का लुत्फ उठाने का कोई अधिकार नहीं है।
  • ऐसी मान्यता है कि जिस भी लड़की का खतना हुआ है, वह अपने पति के लिए ज्यादा वफादार साबित होगी।
  • संयुक्त राष्ट्र की संस्था विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, खतना 4 तरीके का हो सकता है- पूरी क्लिटोरिस को काट देना, योनी की सिलाई, छेदना या बींधना, क्लिटोरिस का कुछ हिस्सा काटना।

खतना कुप्रथा

लेकिन इस्लाम में अब भी कई कुप्रथाएं हैं जिसमें मुस्लिम महिलाओं का शारीरिक और मानसिक शोषण होता है। 'महिलाओं का खतना' या 'खफ्ज प्रथा' इस्लाम में एक पीड़ादायिक कुप्रथा है। जिसे संज्ञान में लाई एक मुस्लिम महिला। इस महिला का नाम है मासूमा रानाल्वी। मासूमा रानाल्वी बोहरा समुदाय से आती है और शिया मुस्लिम महिला हैं।

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जब सरकार तीन तलाक पर कानूनी मसौदा तैयार कर ही रही थी तभी मासूमा ने देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम एक खुला खत लिखा। महिला ने प्रधानमंत्री को लिखा, "ट्रिपल तलाक अन्याय है, पर इस देश की औरतों की सिर्फ यही एक समस्या नहीं है। मैं आपको "फिमेल जेनिटल मुटिलेशन" (एफजीएम) या खतना प्रथा के बारे में बताना चाहती हूं, मैं इस खत के द्वारा आपका ध्यान इस भयानक प्रथा की तरफ खींचना चाहती हूं।

खतना से जुड़ी दर्दनाक यादें

उन्होंने आगे लिखा कि बोहरा समुदाय में सालों से ‘खतना प्रथा’ या ‘खफ्ज प्रथा’ का माना जा रहा है। महिलाओं का खतना एक ऐसी कुप्रथा है, जिससे न सिर्फ महिलाएं अपना मानसिक संतुलन खो देती हैं, बल्कि उनके शरीर को बेहद नुकसान भी पहुंचता है। जो लड़कियां बच भी जाती हैं, इस कुप्रथा से जुड़ी दर्दनाक यादें ताउम्र उनके साथ रहती है। बोहरा, शिया मुस्लिम हैं, जिनकी संख्या लगभग 2 मिलियन है और ये महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश और राजस्थान में बसे हैं।मैं बताती हूं कि मेरे समुदाय में आज भी छोटी बच्चियों के साथ क्या होता है।"

खतना के अगेंस्ट कैंपेन

मासूमा ने जब इस मुद्दे को उठाया कई महिला संगठनों इस मुद्दे पर आवाज उठाई और कैंपेन चलाया। 2015 में बोहरा समुदाय की कुछ महिलाओं ने एकजुट होकर 'WeSpeakOut On FGM' नाम से एक कैंपेन शुरू किया। महिलाओं ने Change.org पर भी एक कैंपेन की शुरुआत की थी। दुनिया भर के कई समुदाय इस कुप्रथा को सदियों से करते आ रहे हैं। लेकिन अब इस कुप्रथा को रोकने के लिए कुछ महिलाओं से मोर्चा खोल दिया है और इसके खिलाफ एक जुट होकर लड़ रही हैं।

खतना कराने की उम्र

मासूमा आगे लिखती हैं, जैसे ही कोई बच्ची 7 साल की हो जाती है, उसकी मां या दादी उसे एक दाई या लोकल डॉक्टर के पास ले जाती हैं। बच्ची को ये भी नहीं बताया जाता कि उसे कहां ले जाया जा रहा है या उसके साथ क्या होने वाला है। दाई या आया या वो डॉक्टर उसके क्लिटोरि को काट देते हैं। इस प्रथा का दर्द ताउम्र के लिए उस बच्ची के साथ रह जाता है। इस प्रथा का एकमात्र उद्देश्य है, बच्ची या महिला की कामुक इच्छाओं को दबाना।

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खतना कानून

एफजीएम अफ्रीका के कई हिस्सों और मध्य एशिया में सदियों से जारी है लेकिन भारत, पाकिस्तान और श्रीलंका में इसके बारे में ज़्यादा सुनने को नहीं मिलता है। फिलहाल भारत में खतना को लेकर कोई भी कानून नहीं है लेकिन बोहरा समुदाय अब भी खतना या महिला सुन्नत का पालन करता है। यहां सिर्फ दाऊदी बोहरा समुदाय में ये परंपरा पाई जाती है। यमन के शिया मुसलमानों का एक हिस्सा रहे बोहरा 16वीं सदी में भारत आए थे। आज वह मुख्य रूप से गुजरात और महाराष्ट्र में रहते हैं। दाऊदी बोहरा देश में सबसे पढ़े-लिखे समुदायों में से हैं। भारत में इसे मानने वाले दाऊदी बोहरा मजबूत व्यापारी मुस्लिम समुदाय है। करीब 10 लाख लोग मुंबई और आसपास के इलाकों में रहते हैं।

2030 तक खत्म होगा एफजीएम (खतना)

यूएन ने साल 2030 तक एफजीएम को खत्म करने का लक्ष्य रखा है। दुनियाभर में हर साल करीब 20 करोड़ बच्चियों या लड़कियों का खतना होता है। इनमें से आधे से ज्यादा सिर्फ तीन देशों में हैं, मिस्र, इथियोपिया और इंडोनेशिया। बहुत से देशों ने इस पर प्रतिबंध भी लगा दिया है। लेकिन भारत में ऐसा कोई क़ानून नहीं है और बोहरा अब भी इस परंपरा का पालन करते हैं- जिसे यहां खतना या महिला सुन्नत कहते हैं। इस परंपरा की कुरान में इजाज़त नहीं है। अगर होती तो भारत में सभी मुसलमान इसका पालन करते। बोहरा समुदाय में यह इसलिए चल रही है क्योंकि कोई इस पर सवाल नहीं उठाता।

एफजीएम महिलाओं और लड़कियों के मानवाधिकार का हनन है। महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव का ये सबसे बड़ा उदाहरण है। बच्चों के साथ ये अक्सर होता है और ये उनके अधिकारों का भी हनन है। इस प्रथा से व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर पड़ता है।

खतना के नुकसान

  • एक ही ब्लेड से कई महिलाओं का खतना किया जाता है, जिससे उन्हें योनी संक्रमण के अलावा बांझपन जैसी बीमारियां होने का खतरा होता है।
  • खतने के दौरान ज्यादा खून बहने से कई बार लड़की की मौत भी हो जाती है और दर्द सहन न कर पाने पर कई लड़कियां कोमा में भी चली जाती हैं।

खतना से जुड़े आंकड़े

  • यूनिसेफ के आंकड़ों के अनुसार, दुनियाभर में हर साल बीस करोड़ से ज्यादा महिलाओं का खतना होता है।
  • इनमें से आधी महिलाएं सिर्फ इथियोपिया, मिस्र और इंडोनेशिया की होती हैं।
  • खतना होने वाली इन 20 करोड़ लड़कियों में से करीब 4.5 करोड़ बच्चियां 14 साल से कम उम्र की होती हैं।
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