Top
Hari bhoomi hindi news chhattisgarh
Breaking

बच्चों की रचनात्मकता एवं दीवार पत्रिका : डॉ. केवलानन्द काण्डपाल

बच्चे अपने ज्ञान की संरचना स्वयं करते हैं ’ यह शिक्षक जगत में आम प्रचलित अभिमुखीकरण बनता जा रहा है

बच्चों की रचनात्मकता एवं दीवार पत्रिका : डॉ. केवलानन्द काण्डपाल

श्री महेश पुनेठा जी से मेरा परिचय वर्श 2006 से है जब श्री पुनेठा उत्तराखण्ड राज्य की उच्च प्राथमिक कक्षाओं हेतु सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तकों में लेखकीय योगदान के क्रम में डायट भीमताल में थे और संयोगवश में भी प्राथमिक कक्षा हेतु परिवेशीय अध्ययन से संबंधित पुस्तकें हमारे आस-पास के लेखन से जुड़ा था। बाद में सामाजिक विज्ञान की पुस्तकों के संपादन के क्रम में यह परिचय गहरा हुआ और उपको जानने-समझनें का अवसर मिला।

दीवार पत्रिका एवं रचनात्मकता पुस्तक के आमुख में श्री राजेश उत्साही जी में सटीक कहा है ’’इसमें कोई शक नहीं है कि महेश पुनेठा धुन के पक्के हैं।’’ इसमें इतना और जोड़ने की अनुमति चाहता हूं कि बच्चों की शिक्षण अधिगम प्रक्रिया को लेकर इनका एक स्पस्ट नजरिया है और इसको व्यवहार में लानें के लिए अकादमिक बेचैनी को उनकी संगत में रहकर बखूबी महसूस किया जा सकता है।
इस पुस्तक में बड़ी साफगोई से इसका उल्लेख भी है। शिक्षकों कर्म में किसी नवाचार को अमल में लानें तथा व्यावहारिक अनुभवों के आधार पर सिद्धान्त गढ़ने के लिए दृढ़ निश्चय के साथ-साथ अतिरिक्त साधना की आवश्यकता होती है।
यह पुस्तक सरोकारों के प्रति प्रतिबद्धता का प्रतिफलन है। ’बच्चे अपने ज्ञान की संरचना स्वयं करते हैं ’ यह शिक्षक जगत में आम प्रचलित अभिमुखीकरण बनता जा रहा है परन्तु इसे विद्यालयी पाठ्यचर्या में किस प्रकार से अमल में लाया जाय, इसको लेकर वैचाहिक असमंजस दिखलायी पड़ते हैं।
इस पुस्तक के गहन अध्ययन से इस असमंजस से उबरने में काफी हद तक मदद मिल सकता है। दीवार पत्रिका के विकासक्रम में अपनायी गयी प्रक्रिया बच्चों को ज्ञान निर्माण की दिशा में ले जा रही होती है। पुस्तक में समाहित बच्चों, बाल संपादकों, शिक्श क साथियों के अनुभव इस बात को पुख्ता करते हैं। रेखा चमोली, उत्तरकाशी, चिन्तामणि जोशी, पिथौरागढ़, प्रमोद दीक्षित ’मलय’, नरैनी, बांदा, राजीव जोशी, नाचनी पिथौरागढ़ के अनुभवों इस पुस्तक में शिमिल करके श्री पुनेठा जी ने अकादमिक उदारता का उदाहरण प्रस्तुत किया है, इससे पुस्तक समृद्ध हो गयी है।

चुनौतीपूर्ण हो गया है आज के दौर में कविता लिखना : मदन कश्यप

आज के युग में आत्मश्लाघा एक रोग की शक्ल ले चुका है, विशेश कर अकादमिक क्षेत्र में। ऐसे में इस पुस्तक में दीवार पत्रिका अभियान को वरीयता देने का प्रयास प्रशंसनीय है, बच्चों, बाल संपादकों, शिक्षक साथियों के विचारों एवं अनुभवों को शामिल करना बहुत उपयोगी है। पुस्तक परिचय सहित छह अध्यायों में विभक्त है। प्रथम अध्याय-दीवार पत्रिका के साथ मेरा अनुभव- दीवार पत्रिका के विचार प्रवर्तन एवं इसके उद्विकास की प्रसव वेदना एवं यात्रा का गहन विवरण प्रस्तुत करती है। नवाचार की प्रक्रिया में इन अनुभवों से गुजरना लाजिमी है। द्वितीय अध्याय- दीवार पत्रिका निर्माण कार्यशाला- है।
इस अध्याय में बच्चों द्वारा दीवार पत्रिका के विकास से पूर्व बच्चों का इस विधा से अभिमुखीकरण करने का आवश्यकता को रेखांकित करता है। बच्चों के साथ मिलकर दीवार पत्रिका का विकास एवं निर्माण किस प्रकार किया जाय, बच्चों में सामूहिकता की भावना का विकास एवं उभरते नेतृत्व को समर्थन किस प्रकार दिया जा सकता है ? इसका व्यवहारिक तरीका बतलाया गया है।
एक अन्य रेखांकित करने योग्य तथ्य उभरकर आता है कि बच्चों की टीम को सदैव अध्यापक के मार्गदर्श न का मोहताज बनाये रखने के बजाय उनमें आवश्यक क्षमता का विकास करके स्वायत्ता देने की बात कही गया है। संकेत स्पस्ट हैं कि अध्यापक वातावरण निर्माण एवं सुगमकत्र्ता के रूप में मौजूद रहें और बच्चों में स्वतंत्र निर्णय लेने, खोज-बीन करने, जांचने-परखने, सामूहिक निर्णय तक पहुंचने का कौश ल विकसित करें।
जिससे बच्चे ज्ञान निर्माण के मार्ग में स्वायत्त रूप से आगे बढ़ते जायें। आगामी तीन अध्याय क्रमश: दीवार पत्रिका के साथ बच्चों के अनुभव, दीवार पत्रिका के (बाल) संपादकों से बातचीत एवं दीवार पत्रिका के शिक्षक साथियों के अनुभव शीर्षकों र्शकों में विभाजित हैं। ये अध्याय दीवार पत्रिका के विकास क्रम में बच्चों, बाल संपादकों, शिक्षक कों एवं समुदाय की भूमिका, भागीदारी एवं पारस्परिक संवाद के तौर-तरीकों एवं उपागमों को सहजता से अभिव्यक्त किया गया है।
पुस्तक के पृश्ठ संख्या 85 से 96 में श्री प्रमोद दीक्षित ’मलय’ के अनुभवों को स्थान देते हुए बाल अखबार से दीवार पत्रिका तक की यात्रा, दीवार पत्रिका में क्या है ? उसमें क्या हो, क्यों और कैसे हो ? जैसे पहलुओं पर अनुभव सिद्ध विचारों का प्रस्तुतीकरण रोचक है। वस्तुतः में दीक्षित जी बेबाकी से स्वीकार भी करते हैं कि श्री पुनेठा जी से संवाद से दीवार पत्रिका के बारे वैचारिक स्पश्टता बनी। दीक्षित जी का यह अकादमिक साहस प्ररित करता है। इसी प्रकार अन्य शिक्श क साथियों के विचारों का लाभ पाठकों तक पहुचाने का प्रयास सराहनीय है।
पुस्तक शिक्षक कों एवं शिक्षक-कर्म से जुड़े अभ्यासकत्र्ताओं के लिए श्रोत पुस्तक के रूप में मार्गदर्श न करनें में सक्श म प्रतीत होती है जो दीवार पत्रिका को विद्यालयी पाठ्यचर्या को आगे बढ़ाने के एक उपकरण के रूप में अपनाने को उत्सुक हैं। श्री महेश पुनेठा इसे अभियान के रूप में ठीक ही निरूपित करते हैं। जब तक दीवार पत्रिका हमारी विद्यालयी पाठ्यचर्या का सहज एवं स्वाभाविक उपक्रम नहीं बन जाता जब तक इसे अभियान के रूप में, आग्रह के रूप में आगे बढ़ाना जरूरी भी है।
पुस्तक समाहित अनुभव इस बारे में मार्गदर्श न करते हें कि बच्चे, शक्ति एवं समुदाय की सहभागिता से यह उपक्रम किस प्रकार आरम्भ किया जा सकता है ? आगे बढ़ाया जा सकता है ओर जारी रखा जा सकता है। ऐसा होता हुआ दिखायी भी दे रहा है। जनपद एवं राज्य ही नहीं वरन् देश एवं उसके बाहर दीवार पत्रिका के विकास के बारे में पुश्ट खबरें हैं। इसमें भी अधिकांश शिक्षक साथियों ने पुनेठा जी से सम्पर्क, आपसी संवाद से इस दिशा में आगे बढ़ने की बात स्वीकारी भी है। यकीनन स्वप्रेरित शक्ति-कर्मी के प्रयास भी इस दिशा में आगे बढ़ रहे होगें परन्तु इसे एक शिक्षक अभियान की ठोस शक्ल देने का श्रेय श्री पुनेठा जी को दिया ही जाना चाहिए।
अब, जबकि यह पुस्तक मार्गदर्श न की स्पस्टता के साथ उपलब्ध है तो शिक्षक कए विद्यालयों शिक्षक-कर्म से जुड़े चेतनशील व्यक्तियों/व्यक्ति समूहों के लिए यह एक आवश्यक पुस्तक प्रतीत होती है। प्रत्येक विद्यालय के पुस्तकालय में इसे शामिल करना समीचीन होगा जिससे बच्चे इसका अध्ययन कर सकें, शिक्षककों एवं समुदाय में पहल ले सकें। पुस्तक में ’दीवार पत्रिका के साथ बच्चों के अनुभव’ एवं ’दीवार पत्रिका के संपादकों से बातचीत’ बचचों को जरूर पढ़ने चाहिए। वस्तुतः सम्पूर्ण पुस्तक को पढ़ना भी बच्चों के लिए दीवार पत्रिका के समग्र परिप्रेक्ष्य को समझने के लिए बेहतर अनुभव साबित होगा।
राज्य के सेवारत शिक्षक क प्रशिक्षण में इस पुस्तक को सहयोगी संसाधन के रूप में शामिल किया जाना चाहिए, आखिर यह एक ऐसा नवाचार है जिसमें पहले व्यावहारिक प्रयोग करने के बाद वैचारिक दृश्टिकोण विकसित किए गये हैं अन्यथा इसका विपर्यय ही अधिक नजर आता है। यदि मुझे अति उत्साही न समझा जाये तो मैं तो सेवारत शिक्षक प्रशिक्षणों में एक पूरा दिन इस विचार की आवश्यकता , दर्शन, प्रक्रिया एवं अनुभवों को साझा करने के अवसर मिल सकें।
इस पुस्तक में श्री प्रमोद दीक्षित ने अपने अनुभवों को साझा करते हुए लिखा है ’’ दीवार पत्रिका को मैने इस पर काम करने वाले बच्चों में लेखन क्श मता, कल्पना एवं चिन्तन श क्ति, कलात्मक अभिरूचि, सामूहिकता, सामग्री चयन के संपादकीय कौश ल के विकास के साथ-साथ उनमें एक अच्छे नागरिक के रूप में बढ़ने-गढ़ने के अवसरों के रूप में देखा है।’’ (पृश्ठ 85-86)
श्री पुनेठा जी के अथक प्रयासों से एक उम्दा पुस्तक हमारे बीच है। दीवार पत्रिका के विद्यालयों में अभी तक जो भी संस्करण देखने सुनने में आ रहे हैं, उनमें हिन्दी भाशा से संबंधित मुद्दों को ही बहुलता में संबोधित किया गया है। कुछ दीवार पत्रिकाऐं आंग्ल भाशा में निकलनें की खबरें भी हैं।
लोक-संस्कृति, लोक-कथा, लोक-गीत आदि भी इसका हिस्सा बन रहीं हैं। परिवेशीय अध्ययन के कुछ पहलुओं को स्पर्श किया जाने लगा है परन्तु इस संदर्भ में व्यापक संभावनाऐं हैं मसलन, बच्चों द्वारा समुदाय एवं गांव से संबंधित प्रोजेक्ट, सर्वेक्षण, भ्रमण, सामाजिक अन्तःक्रिया के अनुभवों को भी दीवार पत्रिका में स्थान मिलना चाहिए। इसके अतिरिक्त गांव का इतिहास, पुरातत्व, शिल्प, निर्माण शैली, वास्तु आदि इस पत्रिका के दायरे में लाने की आवश्यकता है, जिससे स्थानीय ज्ञान विद्यालयी पाठ्यचर्या को आगे बढ़ाने में आधार भूमि निर्मित कर सकेगी।
स्थानीय ज्ञान के बहुत से पहलू वैज्ञानिक मूल्य भी रखते हैं। विद्यालयों में विज्ञान विशय की पाठ्यचर्या के शुरूआती संसाधनों के रूप में बाल मन में विज्ञान के प्रति रूचि विकसित करने में बहुत मदद मिल सकती है। अतः स्थानीय कृशि, डेयरी, फल संरक्श ण, कृशि उपकरण, रोगोपचार एवं औशधीय पादपों के उपयोग का पारम्परिक ज्ञान-विज्ञान जहां एक ओर दीवार पत्रिका को समृद्ध बनाऐंगे वही दूसरी ओर दूसरी ओर विद्यालय इनके संरक्श ण में अहम् भूमिका निर्वहन कर रहे होंगे, विज्ञान विशय की पाठ्यचर्या ठोस आधारों पर आगे बढ़ सकेगी।
स्थानीय कलाऐं, निर्माण, पैर्टन, रंगोली, अल्पना आदि कला विशय को बच्चे के अभिारूचि के अनुसार दीवार पत्रिका के दायरे में लाया जाय। कार्य शिक्षण विद्यालयी पाठ्यचर्या में अलग विशय के रूप में तो स्थापित नहीं है परन्तु इसे विद्यालय के पाठ्य सहगामी क्रियाकलापों के द्वारा सम्पन्न होने की कल्पना कर ली जाती है। श्रमिक, कृशक एवं ग्रामीण तहिला की दिनचर्या पर बच्चों की बातचीत एवं अवलोकनों को लंखबद्ध करके दीवार पत्रिका समाहित करने से दीवार पत्रिका समृद्ध तो होगी ही, वहीं दूसरी ओर बच्चों में श्रम के प्रति सम्मान का मूल्य विकसित हो सकेगा। ग्रामीण क्षेत्रों में सामूहिक काम-काज के बहुत सारे अवसर उपलब्ध रहते हैं, जैसे- रोपाई, सामूहिक गुड़ाई, भवन की छत पर पत्थर बिछाने का काम, समारोह एवं विवाहोत्सव आदि। इनके अवलोकन के अवसर बच्चों को मिलें, जिससे सामूहिकत, परस्पर सहयोग के मूल्यों को जानने-समझने के मौके मिल सकें। यह अनुभव दीवार पत्रिका का भाग बन सकते हैं।
दीवार पत्रिका के विकास क्रम में बच्चों में विशयवार ( भाशा, गणित, विज्ञान, सामाजिक विज्ञान, कला एवं परिवेशीय अध्ययन) बच्चे के प्रदर्श न का सतत् आधार पर आंकलन किया जा सकता है। इसी दौरान बच्चों को दिया गया फीडबैक बच्चों को सीखन, जानने, समझने एवं ज्ञान निर्माण में मदद कर सकेगां। दरअसल सतत् मूल्यांकन का मंतव्य भी यही है। दीवार पत्रिका के उपक्रम में सतत् एवं व्यापक आकंलन हेतु ठोस साक्ष्य सामने आते हैं बश र्ते कि अध्यापक इस प्रक्रिया में सुगमकर्ता एवं अवलोकनकत्र्ता की दोनो भूमिकाएं संवेदनशीलता के साथ निभा सकें और इस प्रक्रिया के सहभागी एवं साक्ष्य, दोनो ही बनने का हुनर साध सकें।
दीवार पत्रिका में बच्चे के योगदान, पारस्परिकता, टीम भावना, अनुशासन, मिलजुलकर काम करना, नेतृत्व आदि लोकतंत्र के उपयुक्त मूल्यों के विकास के अवसर होते हैं। अतः दीवार पत्रिका के विकास क्रम में गहन अवलोकन के द्वारा अध्यापक बच्चे के व्यक्तित्व के व्यापक पहलुओं के बारे में साक्ष्य आधारित निर्णय ले सकते हैं। व्यापक मूल्यांकन का यही परिप्रेक्ष्य भी होता है।
डायट में अपने कार्य के दौरान शिक्षक प्रशिक्षकओं के बीच बाल अखबार एवं दीवार पत्रिका संबंधी विमर्श एवं बाल अखबार/दीवार पत्रिका के मॉडल विकास के अलावा विद्यालय में बच्चों के बीच इस प्रकार का व्यावहारिक अनुभव न होने की मेरी सीमा भी है। अवलोकन एवं बातचीत के अनुभवों के आलोक में पुस्तक को जानने एवं समझने का प्रयास किया गया है। व्यवहार में लागू करके प्राप्त अनुभवों एवं अन्र्तदृश्टि के आधार पर सिद्धान्त गढ़ना उपयोगी होता है, यह पुस्तक इसी मार्ग का अनुसरण करते हुए लिपिबद्ध हुई है। दीवार पत्रिका के सैद्धान्तिक, दार्श निक एवं व्यवहारिक पक्षों को जानने एवं समझने के लिए यह एक उपयोगी पुस्तक है।
पुस्तक-दीवार पत्रिका और रचनात्मकता
लेखक- महेश चन्द्र पुनेठा
प्रकाशक-लेखक मंच प्रकाशन, 433,नीतिखंड-3, इंदिरापुरम्,
गाजियाबाद-201014
मूल्य (अजिल्द)- 80 रूपये
(सजिल्द)- 150 रूपये
पहला संस्करण: 2015 , पृष्ठ संख्या-110
खबरों की अपडेट पाने के लिए लाइक करें हमारे इस फेसबुक पेज को फेसबुक हरिभूमि, हमें फॉलो करें ट्विटर और पिंटरेस्‍ट पर-
Next Story
Top