Hari bhoomi hindi news chhattisgarh

पी.के. आर्य का लेख : पुनरुत्थान का महायज्ञ

योध्यापुरी में दिव्य शिलान्यास से भारतीय गौरव और अस्मिता के पुनरुत्थान का महायज्ञ प्रारंभ हो गया है। सदियों से मुस्लिम आक्रांताओं के अत्याचार से सिसक रही भारतीय धरोहरें अपने सम्मान के स्वर्ण शिखरों को निहारते देख अभिभूत हैं। कृतज्ञ राष्ट्र नियंताओं के ये प्रयास भारतीय स्वर्णयुग के नूतन अध्यायों के रूप में उद्धृत किए जाते रहेंगे। श्रीराम के मंदिर निर्माण के पुनरोदय ने समूचे विश्व में भारतीय शक्ति, संकल्प और संघर्ष को एक नया आयाम प्रदान किया है। अयोध्या की पुण्यभूमि से पांच अगस्त को धर्म की मर्यादाओं के पुनरुत्थान का जो शंखनाद हुआ है, वह मोदी को अस्तित्व के कालखंड पर दो भागों में विभक्त कर देगा, मोदी पूर्व का भारत और मोदी के पश्चात का भारत।

Ram Mandir Bhoomi Pujan: कोरोना काल के इस समय में पीएम मोदी से सीखे ये तीन चीजें
X
प्रधानमंत्री माेदी

पी.के. आर्य

भारत की अतिप्रतिष्ठित सप्तपुरियों में प्रथम अयोध्यापुरी में दिव्य शिलान्यास से भारतीय गौरव और अस्मिता के पुनरुत्थान का महायज्ञ प्रारंभ हो गया है। सदियों से मुस्लिम आक्रांताओं के अत्याचार से सिसक रही भारतीय धरोहरें अपने सम्मान के स्वर्ण शिखरों को निहारते देख अभिभूत हैं। कृतज्ञ राष्ट्र नियंताओं के ये प्रयास भारतीय स्वर्णयुग के नूतन अध्यायों के रूप में उद्धृत किए जाते रहेंगे। श्रीराम के मंदिर निर्माण के पुनरोदय ने समूचे विश्व में भारतीय शक्ति, संकल्प और संघर्ष को एक नया आयाम प्रदान किया है।

विदेशी लुटेरे बाबर ने भारत में साढ़े पांच सौ वर्ष पूर्व अनेक मंदिरों को ध्वस्त किया और वहां रखे सोने-चांदी के भंडार को अपने देश भेजा। बाबर से पहले और बाद में जितने भी मुस्लिम लुटेरों ने भारत में लूटपाट की, उन सभी का मुख्य लक्ष्य मंदिर ही रहे। इसकी एक वजह यह भी थी कि भारत के मंदिर स्वर्ण, रजत और बहुमूल्य हीरे रत्नों के विपुल भंडार थे। मंदिरों के ध्वस्त करने का एक मुख्य कारण यह भी रहा कि भारत के धर्मप्राण हिन्दुओं की आस्था और निष्ठा को छिन्न भिन्न करके उन्हें मानसिक और सांस्कृतिक रूप से कमजोर बनाया जा सके, उसके बाद धर्मांतरण की प्रक्रिया सहज हो जाती है। यही होता भी रहा। इसी के साथ जिन धर्म स्थलों को क्षत-विक्षत किया गया, वहां विजय के प्रतीक स्वरूप में बाबरी मस्जिद अथवा ऐसे ही किसी न किसी इस्लामी चिन्ह की स्थापना कर दी गई, जो उनके अहंकार की पुष्टि तो करता ही था, साथ ही इस बात को भी दर्शाता था कि देखो तुम और तुम्हारे देवी देवता कितने असहाय हैं। यह एक तरह से मनोवैज्ञानिक पराभव का औजार सिद्ध हुआ। जिसकी परिणति में लाखों हिंदुओं को उनके धर्म से पतित करके इस्लाम अंगीकार करने के लिए विवश किया जाता रहा।

औरंगजेब ने अपने सगे भाई दाराशिकोह को इसलिए जेल में यातनाएं देकर मार डाला कि उसका हिंदुत्व दर्शन के प्रति विशेष झुकाव था। उल्लेखनीय है कि विदेशों तक हमारे उपनिषद और वेदों के फारसी अनुवाद पहुंचाने का श्रेय भी दाराशिकोह को ही जाता है, फारसी से पुनः जर्मनी और अंग्रेजी में अनुवाद होकर हमारे धर्म ग्रंथ यूरोप और अन्य देशों तक पहुंचे। पश्चिम के देशों के विद्वान भारतीय धर्म दर्शन के अलौकिक प्रभुत्त्व को देखकर हतप्रभ रह गए।

भारत में अब सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय से मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त हो गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के उद्बोधनों से उसी आहत भारतीय संस्कृति और धार्मिक मूल्यों के पुनर्जीवन के संकल्प की झलक मिलती है। नरेंद्र मोदी ने अपने उद्बोधन में अनेक बातों की ओर स्पष्ट संकेत भी किया। उन्होंने जब देश की स्वतंत्रता के संदर्भ को इस अवसर पर संबद्ध किया तो मानो वे यही कहना चाह रहे थे कि देश की राजनीतिक स्वतंत्रता और लोकतंत्र की स्वतंत्रता तो हमे मिल ही गई है लेकिन संस्कारिक और धार्मिक स्वतंत्रता के लिए गुलामी के उन सभी निशानों को मिटाने का महायज्ञ अब प्रारंभ हुआ है जिससे एक सशक्त और स्वाभिमानी राष्ट्र के रूप में भारत को एक नई पहचान प्राप्त होगी।

उन्होंने रामचरित मानस के एक दोहे भय बिन प्रीत नाहिं का उल्लेख करते हुए इसी बात की ओर संकेत भी किया कि आज का भारत वह भारत नहीं है, जिसे प्रताड़ित करके विदेशी ताकतें अपने मंसूबे पूरे करती रही हैं। उन्होंने यह भी कहा कि शक्ति ही शांति स्थापना का मूल तत्त्व है। ये सभी बातें उनके दृढ़ निश्चय और स्पष्ट मंतव्य की ओर संकेत करती हैं। भूमि पूजन की अधिस्थापना के समय मुख्य पुरोहित द्वारा अत्यंत संवेदित तरीके से दक्षिणा स्वरूप उनसे बनारस और मथुरा को भी विदेशी दासता के चिन्हों से मुक्ति की और संकेत कर दिया गया।

मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के चरित्र से प्रेरणा लेने का इससे जीवंत उदाहरण और भला क्या होगा कि सदियों बाद मुक्त हुए जन्मस्थल की खुशी मनाने के लिए दिए जलाने में भी हिंदुओं को दस महीने लग गए। लोकतंत्र की मर्यादाओं के साथ ही वैश्विक सम्मान और परस्पर सम्बन्ध सशक्त रह सकते हैं, यह तथ्य मोदी भली भांति जानते हैं इसीलिए वे आंतरिक और बाह्य दोनों स्वरूपों में भारत को सुदृढ़ करने में जुटे हैं। शास्त्र हो या शस्त्र विचार हो या वस्त्र सभी के चयन में मोदी अनन्य सिद्ध हो रहे हैं। विचारों की अभिव्यक्ति में शास्त्रीय श्लोकों और मंगलाचरण का उद्धरण और व्यवस्था में शस्त्रों का सशक्तिकरण उनके समग्र विकास और उत्थान के मन्तव्यों का परिचय देता है।

कोई भी सच्चा सेवक भला श्रीराम का कार्य करते समय प्रबल पुरुषार्थ के महत्त्व को कैसे नजर अंदाज कर सकता है। श्री राम का पूरा जीवन मर्यादाओं और पुरुषार्थों का प्रबल पुंज ही तो है। जब त्रेता युग में मुनि, सुरपति इंद्र और समस्त मनुष्य रावण के अत्याचारों से हाहाकार उठते हैं तब प्रभु स्वर उद्घोषित होता है।

जनि डरपहु मुनि सिद्ध सुरेसा।

तुम्हहि लागि धरिहउं नर बेसा।।

हरिहउँ सकल भूमि गरुआई।

निर्भय होहु देव समुदाई।।

भगवत गीता' में भी भगवान श्री कृष्ण अपने अवतरण का प्रयोजन स्पष्ट करते हुए कहते हैं -

यदा-यदा हि धर्मस्य ग्लानिः भवति भारत।

अभ्युत्थानम्ा् अधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।

धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे।

यह भगवान श्री राम के अवतरण के प्रयोजन को तुलसीदास रामचरित मानस' में और भी स्पष्ट करते हैं -

असुर मारि थापहिं सुरन्ह

राखहिं निज श्रुति सेतु।

जग बिस्तारहिं बिसद जस,

राम जन्म कर हेतु।।

यहां स्वयं स्पष्ट होता है कि भगवान श्रीराम का अवतरण आदि वैदिक परंपरा की पुनः स्थापना और सनातन धर्म के समग्र यश का विश्व में विस्तार करने के लिए ही होता है। इसके लिए राक्षसों का, विशेषकर राक्षसी और पैशाचिक अत्याचार करने वाले शासकों और उनके सैनिकों का वध करना तथा देवशक्तियों की प्रतिष्ठा करना आवश्यक है। क्योंकि इसके बिना धर्म का उत्कर्ष असंभव है।

अयोध्या की पुण्यभूमि से पांच अगस्त को धर्म की मर्यादाओं के पुनरुत्थान का जो शंखनाद हुआ है, वह मोदी को अस्तित्त्व के कालखंड पर दो भागों में विभक्त कर देगा, मोदी पूर्व का भारत और मोदी के पश्चात का भारत।

Next Story