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तुमसे कोई नहीं सयाना है ''गोरक्षक''

गांधी जी ने एक सभा में कहा था कि बकरीद पर भी बहुत गोसंहार होता रहा।

तुमसे कोई नहीं सयाना है
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1915 में भारत लौटे गांधी की 1917 के चंपारण में नील सत्याग्रह से देशव्यापी शोहरत हो गई। बेतिया और मुजफ्फरपुर वगैरह की सभाओं में गांधी ने यह भी बताया रोज तीस हजार गाय बछड़े अंगरेजों के हिंसक पेट के लिए कटते हैं।

ज़्यादातर कसाई मुसलमान होते थे। बकरीद पर भी बहुत गोसंहार होता रहा। गांधी ने एक समानांतर तर्क किया। उन्होंने माना अधिकतर हिन्दू गाय को नहीं मारते। लेकिन गोवंश का भरपूर शोषण करते हड्डियां तक खरोंच कर लावारिस छोड़ देते हैं।

भरपेट चारा दाना तक नहीं खिलाते। गोवंश की रक्षा देश के बुनियादी मकसदों में शामिल हो तब ही उनका जीवन बचेगा। 1919 में खिलाफत आंदोलन में गांधी को सुझाव मिला कि गोरक्षा के लिए स्वदेशी आंदोलन स्थगित करें।

आंदोलन में मुसलमानों को सशर्त समर्थन दे दिया कि वे गोहत्या नहीं करेंगे। गांधी ने दोनों अनुरोध ठुकरा दिए। कहा हिन्दुओं में गाय को बे मन से माता कहने से अलग मां की सेवा करने का जज्बा और व्यवहार जागना चाहिए।

आसफ अली को 25 जनवरी 1920 को लिखा। पशुओं का जन्म इसलिए नहीं हुआ है कि इंसान उनके लिए दरिन्दा बने। पशु जीवन को नष्ट करने का किसी को अधिकार नहीं है। बकरों, मुर्गियों, चिड़ियों और मछलियों को खाने वालों के लिए गोहत्या का समर्थन नहीं कर सकता।

1921 में हिन्दी ‘नवजीवन‘ में लिखकर गांधी ने ताज्जुब किया। देश अंगरेज़ों के गोमांस खाने की हिमाकत का पुरजोर विरोध कोई नहीं करता। अलबत्ता बकरीद पर खानपान की परम्परा के खिलाफ क्रोधित प्रदर्शन और विरोध करता है।

सामाजिक विद्वेश की कीमत पर गाय की रक्षा को गांधी ने तरजीह नहीं दी। आज तो गाय के कंधे चढ़कर यही हो रहा है। गांधी ने गोरक्षा सम्मेलनों, गोशाला, पिंजरापोल और कई सहकारी समितियों के कार्यक्रमों में अपनी रणनीति का बार बार खुलासा किया।

उनकी अगुवाई में अखिल भारतीय गोसंरक्षण सभा ने अपना संविधान लिखना भी शुरू किया। गांधी को अपनी लाचारी का ऐलान करने में भी संकोच नहीं हुआ। उन्हें हिन्दू धर्म ग्रंथों, वैचारिकताओं, सिद्धांतों और वितंडतावाद की भी गहरी जानकारी और अध्ययन था।

उनके विचारों की पूरी गाय थीसिस छप सकती है। गांधी आज शौचालय के प्रहरी हैं। वे दरअसल हर उपेक्षित प्रश्न के अनाथालय हैं। भारतीय जीवन के लिए कुतुबनुमा हैं। कर्नाटक की एक सभा में गांधी ने भैंस बनाम गाय का दिलचस्प विवाद खड़ा किया कहा शहर में तीन सौ भैंसों के मुकाबले केवल तीन गायें हैं।

गाय के दूध को वैज्ञानिक आधार पर बेहतर बताते ज़िरह की कि ज़्यादा दूध की लालच में भैंसों की गायों के ऊपर तरज़ीह है। इससे तो गोमाता का संबोधन भी निरर्थक है। गांधी दूध कारोबार के फैलाव और भैंस के दूध की खपत के भविष्य से परिचित नहीं थे।

आज होते तो शायद विचार बदले होते। गाय के मुकाबले भैंस ने ज्यादा कमाई की। किफायती भी सिद्ध हुई है। गांधी ने कहा था पशु प्रेम की बुनियाद तलवार के बिना गोवंश की रक्षा करने में कारगर हो सकती है। मौजूदा केन्द्र सरकार ने नए आदेश और नियम जारी किए हैं।

उनका आपसी सरफुटौव्वल का ज्यादा कानूनी महत्व है। संविधान हर व्यक्ति को अपनी मर्ज़ी से खाने का अधिकार देता है। राज्य कानून व्यवस्था, धार्मिक परम्पराओं, जातीय समरसता और सामाजिक विषमताओं को भी ध्यान में रखकर असरकारी संवैधानिक प्रतिबंध लगा सकता है।

पशु पक्षियों के प्रति इंसानी क्रूरता को रोकने कई अधिनियम पहले से ही बने हैं। बाघ जैसे हिंसक पशु की रक्षा के लिए भी कानून वैध तरीके से बनाए ही गए हैं। अपनी कालजयी किताब 'हिन्द स्वराज' में 39 वर्ष के बैरिस्टर गांधी 1909 में ही लिखते हैंः ‘‘मैं खुद गाय को पूजता हूं यानी मान देता हूं।.......लेकिन जैसे मैं गाय को पूजता हूं वैसे मैं मनुष्य को भी पूजता हूं।......

तब क्या गाय को बचाने के लिए मैं मुसलमान से लड़ूंगा? क्या उसे मैं मारूंगा?.....गाय की रक्षा करने का एक यही उपाय है कि मुझे अपने मुसलमान भाई के सामने हाथ जोड़ने चाहिये और उसे देश के खातिर अगर वह न समझे तो मुझे गाय को मरने देना चाहिये, क्योंकि वह मेरे बस की बात नहीं।

अगर मुझे गाय पर अत्यंत दया आती हो तो अपनी जान दे देनी चाहिये, लेकिन मुसलमान की जान नहीं लेनी चाहिये। यही धार्मिक कानून है, ऐसा मैं तो मानता हूं।.....

मेरा भाई गाय को मारने दौड़े, तो मैं उसके साथ कैसा बरताव करूंगा? उसे मारूंगा या उसके पैरों को पड़ूंगा? अगर आप कहें कि मुझे उसके पांव पड़ना चाहिये, तो मुझे मुसलमान भाई के भी पांव पड़ना चाहिये। जो हिन्दू गाय की औलाद को पैना (आरी) भोंकता है, उस हिन्दू को कौन समझाता है?‘‘

गांधी के साथ विवेकानंद के कथन का छौंका लगाने से तर्क तीखे होने लगते हैं। स्वामी जी ने बार बार लिखा। कभी ऐसा भी था। जो ब्राह्मण गोमांस नहीं खाता था। उसे ब्राह्मण नहीं समझा जाता था।

धीरे धीरे यह कुप्रथा खत्म होती गई। विवेकानंद के भी अनुसार गोमांस नहीं खाने का सामाजिक आग्रह जड़ जमाता गया। 1920 में एक मौलवी और पंडित कुचक्र रचकर अहमदाबाद में पहले समझाइश और बाद में धमकी देते बूचड़खाने तक पहुंचे।

वहां कहा गांधी का संदेश है बकरों को काटना बंद कर दिया जाए। उससे हिन्दू मुसलमान दंगा होते होते बचा। गांधी को इसकी जानकारी हुई। उन्होंने अहमदाबाद की जनसभा में गोवंश की रक्षा का अपना सिद्धांत फिर समझाया।

लगातार कई जनसभाओं में गांधी अपने तयशुदा विचारों और कार्यक्रम के सहारे सभी समुदायों से गोमांस खाना छोड़ गायों की रक्षा करने का आग्रह करते रहे। उनकी समझाइश की मुख्य धारा यही थी।

जो गाय का दूध पीता है बैलों को खेत में हल जोतने के काम में लाता है। उसका धर्म है कि गोवंश की ऐसी हिफाजत करे कि उनके कटने की जरूरत ही नहीं पैदा हो। उन्होंने समझाया आज़ादी के लिए हिन्दू मुसलमान के बीच अहिंसा का भाव भी जरूरी है। धार्मिक सामाजिक सद्भाव रखकर ही गोवंश की रक्षा की जा सकती है।

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