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नरेंद्र सिंह तोमर का लेख : आस्था का महापर्व

वाल्मीकि रामायण से लेकर स्कंद पुराण तक में अयोध्या नगरी के अस्तित्व (Existence) और श्रीराम के वहां जन्म लेने का वर्णन है। यहां तक कि अकबर के शासन काल के दौरान अबुल फजल द्वारा लिखी गई आईने अकबरी में भी अवध का वर्णन करते हुए लिखा गया है कि त्रेता युग में इस पवित्र नगरी में राजा रामचंद्र रहते थे, लेकिन दुखद विषय यह है कि देश में राजनीतिक उद्देश्यों और तुष्टिवाद के कारण राम जन्मभूमि पर राम मंदिर (Ram temple) के निर्माण की राह में कई वर्षों तक रोड़े अटकाए गए।

नरेंद्र सिंह तोमर का लेख : आस्था का महापर्व
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भगवान श्रीराम का जन्म अयोध्या में उसी स्थान पर हुआ था, जहां राम मंदिर था। बाद में उसे तोड़कर (Break) बाबरी ढांचा बना दिया गया। इसके ऐतिहासिक और पौराणिक साक्ष्य मौजूद हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की खुदाई और राम मंदिर पर आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने इसे और भी तथ्यात्मक बना दिया है।

अब पूरी दुनिया इस बात से सहमत है कि भगवान राम वहीं जन्मे थे, जहां भव्य मंदिर बनने जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने राम मंदिर मामले में अपने 1045 पृष्ठ के ऐतिहासिक फैसले में कई पुस्तकों, ग्रथों और दस्तावेजों का जिक्र किया है। उच्चतम न्यायालय (Supreme court) के फैसले में वृहत धर्मोत्तर पुराण का जिक्र है, जिसके अनुसार अयोध्या, सात पवित्र नगरियों में से एक है। इसमें उल्लेख है-

अयोध्या, मथुरा, माया, काशी, कांचि, अवन्तिका।

पुरी द्वारावती चौव सप्तैता मोक्षदायिकार:।।

इसी तरह वाल्मीकि रामायण से लेकर स्कंद पुराण तक में अयोध्या नगरी के अस्तित्व और श्रीराम के वहां जन्म लेने का वर्णन है। यहां तक कि अकबर के शासन काल के दौरान अबुल फजल द्वारा लिखी गई आईने अकबरी में भी अवध का वर्णन करते हुए लिखा गया है कि त्रेता युग में इस पवित्र नगरी में राजा रामचंद्र रहते थे, लेकिन दुखद विषय यह है कि देश में राजनीतिक उद्देश्यों और तुष्टिवाद के कारण राम जन्मभूमि पर राम मंदिर के निर्माण की राह में कई वर्षों तक रोड़े अटकाए गए।

1853 में नवाब वाजिद अली शाह के शासन काल से रामलला की जन्मभूमि पर पूजा पर रोक लगाने का सिलसिला कई दशकों तक चला। 25 सितंबर 1990 को गुजरात के सोमनाथ से माननीय लाल कृष्ण आडवाणी जी के नेतृत्व में शुरू हुई रथयात्रा और राम जन्मभूमि आंदोलन, राम लला के मंदिर निर्माण का एक ऐतिहासिक आंदोलन तो था ही, एक ऐसा दृढ़ संकल्प भी था, जो माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में अब राम मंदिर के शिलान्यास के रूप में साकार होने जा रहा है।

भारतीय संविधान की मूल प्रति में भगवान श्रीराम का चित्र अंकित है। संविधान में जहां नागरिकों के मौलिक अधिकारों का जिक्र है, वहां रावण वध के बाद श्रीराम, माता सीता और श्री लक्ष्मण के लंका से अयोध्या लौटने का चित्र है। यह हमारे संविधान में राम राज्य की भावना को चित्रित करता है। श्री रामचरित मानस में कहा गया है कि

दैहिक दैविक भौतिक तापा।

राम राज नहिं काहुहि ब्यापा॥

सब नर करहिं परस्पर प्रीती।

चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती॥

इसी भावना के आधार पर भारतीय संविधान में नागरिकों को मौलिक अधिकार प्रदान किए गए हैं। प्रधानमंत्री के नेतृत्व में केंद्र की वर्तमान सरकार ने पिछले छह वर्षों में ऐसे कई निर्णय लिए हैं जिन्हें देश को राम राज्य की अवधारणा की ओर ले जाने की दिशा में ऐतिहासिक और साहसिक कदम माना जा सकता है।

यूं तो अयोध्या में श्री राम मंदिर से जुड़ा मुद्दा केवल धार्मिक ही था, लेकिन तथाकथित धर्मनिरपेक्ष कहे जाने वाले विभिन्न राजनीतिक दलों ने इसे राजनीतिक रंग देकर इसका भरपूर लाभ उठाने की कोशिश की। खुद को धर्म निरपेक्ष बताने वाले राजनीतिक दलों ने इस मुद्दे पर कानूनी विवाद के दौरान दो समुदायों के बीच आग में घी डालने का काम किया।

ऐसे तथाकथित धर्म निरपेक्ष दलों के कई प्रमुख नेता और उनके समर्थक यह अच्छी तरह जानते थे कि विभिन्न सबूतों और दस्तावेजों के आधार पर विवादित स्थल, राम जन्म भूमि ही है और वहां राम मंदिर का निर्माण न्यायोचित है, लेकिन राजनीतिक स्वार्थों और निहित उद्देश्यों के कारण उन्होंने कभी मुंह खोलने की हिम्मत नहीं की। अगर वे ऐसा करते, तो इस मुद्दे के आधार पर राजनीतिक रोटियाँ सेंकने में उन्हें बड़ी दिक्कतें आ जातीं।

अगर हम इतिहास के पन्नों में झांक कर देखें तो 17/21/6 फुट ऊंचा राम चबूतरा भगवान राम के जन्म का मुख्य स्थान माना जाता है। इसी राम चबूतरे पर नागा वैरागी एक मंदिर का निर्माण करना चाहते थे, लेकिन उनकी कोशिश विफल हो गई, क्योंकि तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने बाबरी मस्जिद परिसर में किसी भी निर्माण कार्य पर रोक लगा दी थी।

अयोध्या मामले पर अनेक पुस्तकों के लेखक धीरेन्द्र झा का कहना है कि यह मामला शुरू से ही साफ तौर पर राजनीतिक था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिन्दू परिषद् और भारतीय जनता पार्टी ने मिलकर देश की धार्मिक अस्मिता की रक्षा का दृढ़ संकल्प लिया और राम जन्म भूमि पर भव्य मंदिर के निर्माण की दिशा में जी-तोड़ प्रयास किए।

राम जन्मभूमि एक ऐसा आंदोलन था, जिसने देशवासियों को प्रेरणा दी कि हमें अपनी संस्कृति और सभ्यता की रक्षा के लिए एकजुट प्रयास करने होंगे। हमारे देश का बच्चा-बच्चा जानता है कि भाजपा ही एक अकेली ऐसी राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टी थी, जो जन्मभूमि स्थल पर राम मंदिर निर्माण का खुले तौर पर समर्थन कर रही थी, जबकि उसे मालूम था कि तत्कालीन परिस्थितियों में तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दलों की अवसरवादी राजनीति के कारण उसे इसकी बड़ी राजनीतिक कीमत चुकानी पड़ सकती है।

अन्य अधिकांश राजनीतिक दल अपने वोट बैंक की खातिर राम मंदिर निर्माण का विरोध कर रहे थे। राम मंदिर को लेकर भले ही कुछ राजनीतिक ताकतें साम्प्रदायिकता के नारे लगाती रही हों, लेकिन इतिहास इस बात का सदैव साक्षी रहेगा कि जब सुप्रीम कोर्ट ने राम मंदिर निर्माण का अपना बहुप्रतीक्षित फैसला सुनाया, तो पूरे राष्ट्र ने मोदी जी की अपील को स्वीकार करते हुए सौहार्द और भाईचारे की भारतीय संस्कृति की अनूठी मिसाल पेश की।

सौभाग्य है कि अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण का पहले असंभव सा लगने वाला कार्य, एक बड़ी हकीकत बनने जा रहा है। 5 अगस्त को प्रधानमंत्री श्री मोदी जी की उपस्थिति में रामलला के मंदिर की पहली ईंट रखी जाएगी। अभिजीत मुहूर्त में हो रहा ये शिलान्यास राष्ट्र और धर्म के गौरव का प्रतीक होगा।


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