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गागर में सागर है ''आजकल'' पत्रिका

हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए 1945 से निकलती पत्रिका आजकल अपनी निरंतरता के लिए जानी जाती है।

गागर में सागर है
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आजकल
हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए 1945 से निकलती पत्रिका आजकल अपनी निरंतरता के लिए जानी जाती है। इधर इसके कई संग्रहणीय अंक सामने आए हैं। इसी क्रम में पत्रिका का वर्तमान अगस्त अंक अप्रतिम कथाशिल्पी अमृतलाल नागर पर केंद्रित है। उनके जन्म शतवार्षिकी को हिंदी समाज उत्सव की तरह मना रहा है। मूल्यांकन के अंतर्गत देवेंद्र चौबे का लेख बेहद महत्त्वपूर्ण है। उनके प्रसिद्ध उपन्यास ‘मानस का हंस’ पर वरिष्ठ आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी ने अपने मंतव्य रखे हैं। उनके परिजनों के संस्मरणात्मक लेख इस अंक के भाव-संसार को एक पूर्णता प्रदान करता है। नागर जी के लिखे-पढ़े की एक सूची अगर दो पृष्ठों में समाहित कर दी जाती तो यह अंक और बेहतर होता। पृष्ठों की निर्धारित सीमा में संपादक ने गागर में सागर भरने का सफल प्रयास किया है।
पत्रिका- आजकल (अगस्त 2016)
वरिष्ठ संपादक- राकेश रेणु
संपादक- फरहत परवीन
मूल्य-22 रुपए
प्रकाशक- प्रकाशन विभाग, नई दिल्ली
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