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सियासत : मध्य प्रदेश में अस्तित्व खो रही कांग्रेस

ज्योतिरादित्य के हाथ का साथ छोड़ने के बाद सवाल उठना लाजिमी है कि क्या अब मध्य प्रदेश कांग्रेस के होलिका दहन की शुरूआत हो गई है? सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या मध्य प्रदेश में कांग्रेस इस झटके से उबर पाएगी? फिलहाल इन सवालों का जवाब हां में ही दिखने लगा है। कांग्रेस के 22 विधायकों ने पार्टी छोड़ दी है। इनमें से छह कमलनाथ सरकार में मंत्री रहे।

सियासत : मध्य प्रदेश में अस्तित्व खो रही कांग्रेसमुख्यमंत्री कमलनाथ और शिवराज सिंह चौहान (फाइल फोटो)

फा गुनी पूनम का चांद जब अपनी पूरी कलाओं के साथ उग रहा होता है, होलिका दहन का मुहूर्त अक्सर वही होता है। इस बार भी फागुनी पूर्णिमा को चांद अपने पूरी कलाओं के साथ उगा, बेशक कोरोना ने अगले दिन आने वाली होली का उत्साह थोड़ा ठंडा कर दिया, लेकिन मध्य प्रदेश कांग्रेस में सिर्फ कोरोना के ही चलते होली का उत्साह ठंडा नहीं था। चांद की तरह उभर रहे ज्योतिरादित्य सिंधिया के कांग्रेस की होलिका दहन की खबर फिजां में तैर रही थी। ऐसे में तनाव होना स्वाभाविक ही था। कांग्रेस को उम्मीद थी कि मराठा रियासत का यह चश्म-ओ-चिराग देश की सबसे पुरानी पार्टी के साथ गुजरे लंबे वक्त का शायद लिहाज रख ले और अपना मन बदल ले, लेकिन ऐसा हो नहीं सका। कांग्रेस के साथ अठारह साल की अपनी यात्रा को रंगों के दिन ज्योतिरादित्य ने खत्म कर दिया।

ज्योतिरादित्य के हाथ का साथ छोड़ने के बाद सवाल उठना लाजिमी है कि क्या अब मध्य प्रदेश कांग्रेस के होलिका दहन की शुरूआत हो गई है? सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या मध्य प्रदेश में कांग्रेस इस झटके से उबर पाएगी? फिलहाल इन सवालों का जवाब हां में ही दिखने लगा है। कांग्रेस के 22 विधायकों ने पार्टी छोड़ दी है। इनमें से छह कमलनाथ सरकार में मंत्री रहे। ज्योतिरादित्य के साथ इन विधायकों द्वारा भी देर-सवेर भारतीय जनता पार्टी का दामन थामना तय है। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक कांग्रेस के इन विधायकों को फिर से जोड़ने की कोशिश दिग्विजय सिंह और जीतू पटवारी कर चुके हैं। विधायकों ने उनसे मिलने से इनकार कर दिया। सब कोशिशें भनाकाम रहीं।

नरेंद्र मोदी के चरम उभार के दौर में जब साल 2018 के नवंबर महीने में मध्य प्रदेश में कांग्रेस को जीत मिली तो यह मानने वालों की कमी नहीं थी कि अब राष्ट्रीय राजनीति से भारतीय जनता पार्टी का सूरज डूबने जा रहा है। क्योंकि इसी के साथ राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भी भाजपा को अपनी सरकारें खोनी पड़ी थीं। इन तीनों राज्यों में भारतीय जनता पार्टी को सबसे ज्यादा मजबूत मध्य प्रदेश में ही माना जा रहा था। शिवराज सिंह चौहान की अगुआई में मध्य प्रदेश की कृषि विकास दर लगातार दस फीसदी से ज्यादा रही। किसान ज्यादा खुशहाल माने जा रहे थे। फिर शिवराज की छवि जमीनी नेता की रही। चुनाव नतीजों ने भारतीय जनता पार्टी को चौंकने के लिए मजबूर कर दिया। दिलचस्प यह रहा कि राज्य में कांग्रेस के मुकाबले भारतीय जनता पार्टी को 47 हजार 827 ज्यादा वोट मिले, लेकिन उसे सीटें कम यानी 107 मिलीं, जबकि कांग्रेस को कम वोट मिले, लेकिन उसे 114 सीटें मिलीं। चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक बीजेपी को 41 प्रतिशत वोट मिले, जबकि कांग्रेस को 40.9 प्रतिशत। यानी दोनों के वोटों के बीच सिर्फ0.1 प्रतिशत का अंतर रहा।

बेशक कांग्रेस की यह जीत बहुत प्रभावशाली नहीं रही, लेकिन एक अर्थ में वह प्रभावशाली इसलिए भी थी, क्योंकि पूरे पंद्रह साल बाद कांग्रेस भाजपा को हराने में कामयाब रही। इस जीत के लिए मीडिया और राजनीतिक समीक्षकों ने कांग्रेस की एकता की बजाय ज्योतिरादित्य सिंधिया की मेहनत को दिया। चुनाव प्रचार अभियान के दौरान ज्योतिरादित्य ने पूरा जोर लगा दिया था। फिर वे तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के नजदीकी भी रहे। राहुल से उनकी नजदीकी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब ज्योतिरादित्य ने कांग्रेस का दामन छोड़ा तो राहुल ने कहा कि ज्योतिरादित्य से उनका रिश्ता ऐसा रहा है कि वे कभी-भी उनके घर आ सकते थे। वैसे ज्योतिरादित्य के पिता माधव राव सिंधिया पहले राहुल गांधी की दादी इंदिरा गांधी और उनके चाचा संजय गांधी के नजदीकी रहे। दोनों के देहांत के बाद वे राजीव गांधी और सोनिया गांधी के करीबी रहे। शायद रिश्तों की यह डोर ही थी कि ज्योतिरादित्य को उम्मीद थी कि अगर मध्य प्रदेश में कांग्रेस को जीत मिली तो उन्हें राज्य की सत्ता की कमान दी जा सकती है, लेकिन वे भूल गए कि जिस मध्य प्रदेश से वे आते हैं, वहीं से कांग्रेस में ही दिग्विजय सिंह और कमलनाथ जैसे घाघ नेता भी हैं। कांग्रेस को जब सत्ता मिली तो दिग्विजय सिंह ने ज्योतिरादित्य को नौसिखिया बताते हुए ऐसा दांव चला कि सत्ता कमलनाथ के हाथ चली गई। तर्क यह दिया गया कि घाघ नौकरशाही को ज्योतिरादित्य संभाल नहीं पाएंगे।

मध्य प्रदेश में कांग्रेस की जीत का श्रेय भले ही ज्योतिरादित्य सिंधिया को दिया गया, लेकिन सूत्रों का कहना है कि उन्हें मुख्यमंत्री बनाने को लेकर विचार भी नहीं हुआ था। वैसे कांग्रेस से जुड़े सूत्र बताते हैं कि कांग्रेस में कमलनाथ को लेकर भी कोई एक राय नहीं थी। कमलनाथ को मुख्यमंत्री पद इसलिए मिला, क्योंकि कुछ ही महीने लोकसभा का चुनाव होना था और कांग्रेस को चुनाव लड़ने के लिए पैसे की जरूरत थी। कांग्रेस में तर्क दिया गया कि कमलनाथ अपने संपर्कों के जरिए कांग्रेस को पैसे मुहैया करा सकते हैं?

मध्य प्रदेश में कांग्रेस के बुरे दिन भले ही शुरू हो गए हैं। लेकिन कांग्रेस के राष्ट्रीय स्तर पर भी हालत कोई अच्छी नहीं है। कांग्रेस की इस बुरी गत के लिए कुछ कांग्रेसी नेता भी दबी जुबान से मानते हैं कि इसके लिए कहीं न कहीं दिग्विजय सिंह भी जिम्मेदार हैं। दिग्विजय सिंह को तो अब कांग्रेसी भी मानने लगे हैं कि कांग्रेस में वे भारतीय जनता पार्टी के एजेंट हैं। मध्य प्रदेश कांग्रेस की दिक्कत यह है कि उसके पास पूरी पार्टी को एकजुट रखने वाला कोई नेता ही नहीं है। कमलनाथ पर आरोप है कि वे छिंदवाड़ा से बाहर कुछ नहीं सोचते। इतना ही नहीं, कुछ लोगों का मानना है कि कमलनाथ पार्टी विधायकों को तवज्जो देने की बजाय अपने ओएसडी प्रवीण कक्कड़ और अपने सहयोगी राजेंद्र मिगलानी के जरिए शासन चला रहे हैं।

वैसे दिग्विजय सिंह जहां अपनी विरासत अपने बेटे जयवर्धन सिंह को देने की तैयारी में हैं, वहीं कमलनाथ अपने बेटे नकुलनाथ को आगे बढ़ा रहे हैं। इसके बावजूद दोनों ही मध्य प्रदेश की राजनीति में अपनी मजबूत पकड़ बना नहीं पा रहे हैं। जबकि उनकी तुलना में युवा ज्योतिरादित्य कहीं ज्यादा प्रभावशाली रहे हैं। दिग्विजय और कमलनाथ को पता था कि जब तक ज्योतिरादित्य कांग्रेस में रहेंगे, उनके घर के चिरागों को जलने के पर्याप्त राजनीतिक ऑक्सीजन नहीं मिल पाएगा। मध्य प्रदेश कांग्रेस से जुड़े सूत्र मानते हैं कि इसलिए भी दिग्विजय और कमलनाथ ने मिलकर ज्योतिरादित्य को किनारे लगाया।

लेकिन अब माना जा रहा है कि ज्योतिरादित्य के कांग्रेस से बाहर जाने के बाद कांग्रेस का युवा आधार का दरकना तय है। ज्योतिरादित्य युवाओं के बीच लोकप्रिय हैं। चूंकि ज्योतिरादित्य अब अपनी दादी और बुआ की पार्टी के साथ आ गए हैं, लिहाजा चंबल प्रभाग में भाजपा का मजबूत होना तय है। जिसका असर कांग्रेस पर पड़ना लाजिमी है। राजनीति ऐसा कर्म है, जिसमें प्रतिबद्ध कार्यकर्ताओं की भूमिका अहम होती है। सोशल मीडिया और संचार साधनों के दौर में कार्यकर्ता अब पहले की तरह नहीं रहा। वह भी तथ्यों को समझने लगा है। उसे भी पता है कि दिग्विजय सिंह, कमलनाथ या फिर दूसरे नेता क्या कर रहे हैं? उसे यह भी पता है कि ज्योतिरादित्य के साथ क्या हुआ है? ऐसे में अगर कांग्रेस का आधार दरकने लगे तो हैरत नहीं होनी चाहिए।

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