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चुनौतीपूर्ण हो गया है आज के दौर में कविता लिखना : मदन कश्यप

ऐसे में यह उन लोगों के लिए तो बहुत आसान है, जो कविता की रूढ़ियों को बनाए रखते हैं और यथार्थ का ही सरलीकरण कर देते हैं

चुनौतीपूर्ण हो गया है आज के दौर में कविता लिखना : मदन कश्यप
आज के दौर में कविता लिखना क्या बहुत दुष्कर हो गया है? क्या आज की कविता बाजारीकरण से टकराती है? इस बारे में अपने विचार व्यक्त कर रहे हैं, वरिष्ठ कवि मदन कश्यप। हालांकि सभी विधाएं अपने आप में कठिन ही हैं, अगर हम उसकी चुनौतियों को ठीक से स्वीकार करते हैं, तब।
कविता इसलिए अधिक चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि उसका फॉरमेट आज के जटिल और संश्लिष्ट यथार्थ को व्यक्त करने के अनुकूल नहीं है। दूसरी तरफ यह सबसे पुरानी विधा है और इसकी जितनी विशेषताएं हैं, उतनी ही रूढ़ियां हैं। ऐसे में यह उन लोगों के लिए तो बहुत आसान है, जो कविता की रूढ़ियों को बनाए रखते हैं और यथार्थ का ही सरलीकरण कर देते हैं और उनके लिए भी जो यथार्थ की जटिलता को ऐसा त्रिआयामी बनाते हैं कि कविता ही खत्म हो जाती है।
परंतु जो दोतरफा चुनौतियों को स्वीकार करता है, उसके लिए आज के जमाने में कविकर्म सचमुच कठिन है।जहां तक आज के दौर में बाजारीकरण से कविता के टकराने का सवाल है, तो मुझे लगता है कि यह टकराहट है भी और नहीं । अभी समाज का एक बड़ा हिस्सा बाजारीकरण के पक्ष में है। उसका लाभ उठा रहा है।
एक तबका ऐसा भी है, जो लाभ नहीं उठा पाने के कारण बेचैन है।परंतु सबसे बड़ा और निचला हिस्सा इस लूट के दुष्परिणामों को वस्तुगत रहा है। उसका जीवन आज सबसे ज्यादा संकट में है। उसमें शामिल हैं- किसान, खेत-मजदूर, जो ज्यादातर पिछड़े हैं और आदिवासी। इन तबकों के दुख-दर्द को समझने वाली कविताएं ही बाजारीकरण और भूमंडलीकरण के विरुद्ध हैं, सच्चे अर्थों में। अन्यथा नकली विरोधी तेवर वाली कविताएं खूब लिखी जा रही हैं।
लेकिन जरा-सी उनकी निर्मिति को तोड़िए तो उसके पीछे छिपा लोभ-लालच सामने आ जाएगा। ये छद्म वामपंथी तेवर, उन लेखकों से कहीं ज्यादा खतरनाक है, जो सीधे बाजार और भूमंडलीकरण के पक्ष में बोलते और लिखते ह
प्रस्तुति: पल्लव
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