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लोकपाल विधेयक पारित होना ऐतिहासिक घटना

कभी-कभी हम इतिहास बनते देखते हैं। देश में लोकपाल को मूर्त रूप लेना अपने आप में ऐसा ही एक मौका है।

लोकपाल विधेयक पारित होना ऐतिहासिक घटना
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नई दिल्ली. कभी-कभी हम इतिहास बनते देखते हैं। देश में लोकपाल को मूर्त रूप लेना अपने आप में ऐसा ही एक मौका है, क्योंकि भारत के संसदीय इतिहास में यह पहला कानून है जिस पर देश में साढ़े चार दशक से बहस हो रही थी। जिस तरह से हर संस्था और विभाग में भ्रष्टाचार कैंसर के समान फैल गया है, उससे निपटने के लिए लंबे समय से देश में अलग से कानूनी संस्था (लोकपाल के रूप में) की मांग उठ रही थी।

1968 में पहली बार लोकपाल बिल को सदन में रखा गया था। तब से इसे सदन में आठ बार लाया जा चुका था, लेकिन हर बार किसी न किसी वजह से यह लंबित होता रहा। अब भी सपा, राजद और जदयू इसकी सार्वजनिक रूप से आलोचना कर रहे हैं। हालांकि सपा को छोड़कर सभी दलों ने इसका समर्थन किया है, लेकिन उनकी नीयत से लगता है कि उनके मन में खौफ है। इसी भय की वजह से ये लोग लोकपाल बिल को लगातार टाल रहे थे।

आज देश में भ्रष्टाचार बड़ा मुद्दा है। शायद ही कोई व्यक्ति होगा, जिसने कभी भ्रष्टाचार का सामना न किया हो। इसने हमारी संस्थाओं और सिस्टम को सबसे ज्यादा प्रभावित किया है, लेकिन न तो इससे लड़ने के लिए कोई कारगर कानून था, ना ही कोई संस्था, जहां शिकायत की जा सके। इसी जरूरत को देखते हुए लोकपाल बनाने की मांग उठी थी। पूर्व आईपीएस अधिकारी किरण बेदी ने कहा हैकि भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए देश को एक तरह का ‘सुप्रीम कोर्ट’मिला है।

दरअसल, लोकपाल केवल भ्रष्टाचार के मामलों को ही देखेगा। करीब ढ़ाई साल पूर्व अण्णा हजारे और अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर जनआंदोलन किया था, उसके बाद देश में इसके पक्ष में माहौल बना। उसी दौरान दिल्ली के रामलीला मैदान में अण्णा हजारे ने 12 दिनों का ऐतिहासिक उपवास किया था। संसद ने अण्णा को एक आवाज में लोकपाल पास करने का भरोसा भी दिया था, लेकिन राज्यसभा में पारित नहीं हो पाया था।

इस बीच पुराने बिल में कईसंशोधन हुए। उसके बाद अण्णा आंदोलन भी बिखर गया। उनके सहयोगी अरविंद केजरीवाल ने नईपार्टी बना ली। मौजूदा शीत सत्र शुरू होने के बाद अण्णा अपनी मांग को लेकर एक बार फिर अनशन पर बैठ गए। रही सही कसर चार राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजों ने पूरी कर दी। अपनी दुर्गाति को देख कांग्रेस का रुख बदला, जिसमें मुख्य विपक्षी पार्टी ने उसे पूरा सहयोग दिया और बुधवार को देश को अंतत: एक लोकपाल मिल गया।

हालांकि अण्णा के पुराने साथी इसे कमजोर बता आलोचना कर रहे हैं पर उन्हें नहीं भूलना चाहिए कि कम से कम देश को एक लोकपाल मिला तो सही। अभी तक तो था ही नहीं और कोई भी कानून आदर्श नहीं होता, उसमें अनुभव के आधार पर सुधार किये जाते हैं। यह भी उतना ही सही हैकि केवल कानून बन जाने से ही सुधार नहीं हो जाते है, जब तक उनका उचित क्रियान्वयन नहीं होगा, उससे कुछ हासिल नहीं होगा। लिहाजा लोकपाल बिल पर अंतिम रूप से राष्ट्रपति की मुहर लग जाने के बाद जब यह कानून का शक्ल ले लेगा, उसके बाद यह भी सुनिश्चित की जानी चाहिए कि इसको धरातल पर बेहतर तरीके से अमल में लाया जा सके।

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