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Lok Sabha Elections Vs Vidhan Sabha Elections : एक साथ चुनाव पर क्या कहता है संविधान?

एक राष्ट्र एक चुनाव पर बहस जरूरी है। 1952 में जब पहला आम चुनाव हुआ था, उस वक्त समूचे देश में एक साथ चुनाव हुए थे। कुछ सालों के बाद ही राज्यों में सरकार गिरने-गिराने के कांग्रेस के राजनीतिक खेल के चलते लोकसभा के साथ विधानसभा चुनावों के तालमेल बेमेल होते गए। नब्बे के दशक के बाद लोकसभा और विधानसभा के चुनाव पूर्णत: अलग हो गए।

Lok Sabha Elections Vs Vidhan Sabha Elections : एक साथ चुनाव पर क्या कहता है संविधान?

एक राष्ट्र एक चुनाव पर बहस जरूरी है। 1952 में जब पहला आम चुनाव हुआ था, उस वक्त समूचे देश में एक साथ चुनाव हुए थे। कुछ सालों के बाद ही राज्यों में सरकार गिरने-गिराने के कांग्रेस के राजनीतिक खेल के चलते लोकसभा के साथ विधानसभा चुनावों के तालमेल बेमेल होते गए। नब्बे के दशक के बाद लोकसभा और विधानसभा के चुनाव पूर्णत: अलग हो गए।

राज्यों के विधानसभा के चुनाव भी अलग होते गए। आज स्थिति यह है कि हर साल या साल में दो बार विधानसभाओं के चुनाव हो रहे हैं। इससे लगता है देश हमेशा चुनावी मोड में है। अक्सर चुनावी माहौल रहने से देश में राजनीतिक कटुता बढ़ती गई है। राजनीति के चलते समाज में जातिगत, समुदायगत, वर्गगत, लिंगगत और संप्रदायगत विभाजन बढ़े हैं।

एकता, एकजुटता, सदभाव, सौहार्द, भाईचारे दरकने लगे हैं। देर-सवेर इन सबका असर देश की अखंडता और शांति पर पड़ सकता है। भारत जैसे विशाल देश के लिए शांति, सदभाव, भाईचारा और एकजुटता जरूरी है। अलग-अलग चुनाव होने से चुनाव खर्च के रूप में सरकारी खजाने पर भी अतिरिक्त बोझ पड़ता है। चुनाव आचार संहिता के चलते सरकारी कामकाज भी प्रभावित होता है।

इसलिए अगर लोकसभा और विधानसभा चुनाव एकसाथ हो तो यह देश के लिए बेहतर होगा। भाजपा ने वन नेशन वन इलेक्शन का प्रस्ताव देश के सामने रखा है। केंद्रीय कानून आयोग इस विषय पर सभी राष्ट्रीय व राज्यों की मान्यता प्राप्त दलों की राय जानने के लिए दो दिन की बैठक की। जिसमें समाजवादी पार्टी, जनता दल यूनाइटेड, तेलंगाना राष्ट्र समिति, तेलुगु देशम पार्टी ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया है,

जबकि एनडीए का घटक गोवा फॉरवर्ड पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, डीएमके ने इस विचार का विरोध किया है। राष्ट्रीय जनता दल पहले से इस प्रस्ताव का विरोध कर रहा है। एक देश एक चुनाव का विरोध करने वाले दल इस प्रस्ताव को संविधान के बुनियादी सिद्धांतों के खिलाफ बताया है। कांग्रेस ने अपने पत्ते नहीं खोले हैं, हालांकि कुछ कांग्रेस नेता ने इस प्रस्ताव को अव्यवहारिक कहा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक देश एक चुनाव के विचार का शुरू से ही समर्थन किया है। केंद्रीय चुनाव आयोग ने भी कहा था कि अगर लोकसभा और विधानसभा चुनाव साथ होते हैं तो वह कराने के लिए तैयार है, उसे कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन यह फैसला केंद्र सरकार को करना है। दरअसल साथ चुनाव कराने के लिए करीब दस राज्यों के विधानसभाओं को भंग करना होगा और इसके लिए संसद की मंजूरी जरूरी होगी।

राज्यसभा में विपक्ष का पलड़ा भारी है। सरकार इसलिए इस प्रस्ताव पर सभी दलों के साथ रायशुमारी कर रही है, ताकि बहुमत बनाया जा सके। यदि बहुमत प्रस्ताव के पक्ष में आया तो सरकार को फैसला करने में आसानी होगी। लोकसभा के चुनाव से छह माह पूर्व व छह माह बाद करीब नौ राज्यों के विधानसभा चुनाव होने हैं। इसलिए ये चुनाव साथ कराने में दिक्कत नहीं होगी।

बाकी 10-11 राज्यों के विस चुनावों में एक से तीन साल की देरी है। सबसे अधिक समय जम्मू-कश्मीर, यूपी, कर्नाटक, त्रिपुरा आदि राज्यों में है। एक देश एक चुनाव से निश्चित ही देश को आर्थिक व राजनीतिक रूप से फायदा है। राजनीतिक दलों का समय भी बचेगा और सरकार भी फोकस होकर काम करेगी। चुनाव के हिसाब से लोकलुभावन फैसले नहीं होंगे।

प्रधानमंत्री-केंद्रीय मंत्री फोकस होकर काम कर सकेंगे। यह बात विरोध कर रहे सभी दलों को समझना होगा। देशहित में सत्ता के लालच का त्याग करना होगा। केवल राजनीतिक विरोध के चलते इस प्रस्ताव का विरोध नहीं किया जाना चाहिए।

हालांकि एक देश एक चुनाव के प्रस्ताव पर और बहस होनी चाहिए, मीडिया में भी चर्चा होनी चाहिए। 2019 से 2024 तक देश में लोकसभा व विधानसभाओं के चुनाव एक साथ शुरू हो जाना चाहिए।

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